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सोमवार, 16 सितंबर 2019

परछाइयों से कोई वास्ता नहीं


टाँग देते  हैं हम,  
समय में सिमटी साँसें, 
ज़िंदगी की अलगनी पर,  
कुछ बिन गूँथे ख़्वाब ख़्वाहिशों में सिमटे,   
वहीं तोड़ देती हैं दम, 
कुछ झुलस जाते हैं वक़्त की धूप से, 
कुछ रौंद देते हैं 
हम अपने ही क़दमों से, 
कुछ पनप जाती हैं रोहिड़ा-सी, 
चिलचिलाती धूप में पानी के अभाव में भी, 
स्नेह सानिध्य की हल्की नमी से, 
मुखर हो उठते हैं उसके सुन्दर फूल, 
 एहसास की छाँव में आत्मविश्वास के,  
 मोहक पुष्प लिबास ख़ुशियों का ओढ़े,  
वक़्त-बे-वक़्त बेसब्र  हो उठती  है 
उनकी  मोहक  महक,  
झरोखे से घर के अंदर, 
प्रभात की प्रथम किरण के साथ, 
प्रवेश को आतुर हो उठती है, 
कल्पनाओं का नैसर्गिक चित्रण, 
समाहित होता  है उनमें,  
   परछाई होती है, 
कुछ जानी-पहचानी अपनी-सी,  
 जिसे आँखें गढ़ने लगती  हैं,  
अपने ही आकार में,  
सम्मुख हो उठता है, 
वह वक़्त जब हम होते है राग द्वेष में,   
मसल देते हैं, 
अपने ही हाथों से ख़ूबसूरत लम्हात, 
नन्ही कली-से नाज़ुक जज़्बात, 
धूप से बनी दीवारों पर, 
अनगिनत परछाइयों से कोई रिश्ता नहीं, 
फिर भी न जाने क्यों, 
उनके चले जाने से दर्द उभर आता है, 
वे जीवित होती हैं कहीं अपने ही ब्रह्माण्ड में, 
 दिल धड़कता है उनका भी, 
उनकी साँसें भी पिरोती हैं ख़ूबसूरत स्वप्न, 
वे पाकीज़ा आँखें भी तलाशती हैं, 
प्रकृति का अनछुआ अकल्पित निर्मल प्रेम, 
न जाने क्यों वे ओझल हो जाती है, 
समेटे अपना सात्विक अस्तित्त्व अपनी ही 
जीवन रेखा की अलगनी पर, 
और उभर आती है, 
एक और परछाई हृदय की दीवार पर, 
 जिससे कोई वास्ता नहीं,
फिर भी वह अपनी-सी नज़र आती है |


- अनीता सैनी 

रविवार, 15 सितंबर 2019

अमृता एक औषधि




भटक  रही दर बदर  देखो !
 स्नेह  भाव  से  बोल  रही, 
 अमृत  पात्र  लिये  हाथों  में,
सृष्टि, चौखट-चौखट  डोल  रही|

विशिष्ट औषधि, जीवनदात्री,
सर्वगुणों  का  शृंगार    किये 
अमृता   कहो   या  गिलोय, 
संजीवनी  का  अवतार  लिये  |

आयुर्वेद  ने  अर्जित  की,
अमूल्य  औषधि  पुराणों  से,
महका, मानव  उपवन  अपना,
अमृता  की  झंकारों  से |

चेत  मानव  चित्त  को  अपने ,
न  खेल बच्चों की  किलकारी से,
हाथ में औषधि लिये खड़ी,
प्रकृति  जीवन पथ की पहरेदारी  में  |

- अनीता सैनी 

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

मातृत्व का मरहम है हिंदी




हिंद देश की हिंदी के मासूम मर्म का ग़ुबार, 
मानव मस्तिष्क सह न सका, 
क़दम-दर-क़दम धँसाता गया शब्दों को,  
बिखर गये भाव पैर पाताल को छूने-से लगे |

 अस्तित्त्व आहत हुआ हिंदी का, 
आह से आहतीत बिखरती-सी गयी, 
प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष  शब्दार्थ,  
शब्दों की क्लिष्टता में उलझी, 
सकुंचित हो  सिमटती-सी गयी |

पेड़ों के झुरमुट में सजाया उसने,  
अलबेले कोहरे से आशियाना आकाँक्षा का, 
हल्की धूप उमड़ी आकर्षक अंग्रेज़ी की, 
अनचाहा आवरण गढ़ हिंदी को ओझल-सी कर गयी |

सीप-सी तलब तलाशती  हिंदी हृदय में, 
स्वाति नक्षत्र में बरसती बूंदों-सा, 
इंतज़ार अधरों को रहा अनकहा, 
अनकहे शब्दों में तब्दील होती गयी, 
अंतस के सुशोभित भावों  में भटकी , 
  अथाह प्रेम काल का निगल-सा गया, 
सम्पूर्ण समर्पण का ग़ुबार लिये वक़्त, 
वक़्त-दर-वक़्त सह न सका, 
सवाल बनी  न जवाब मिला, 
समर्पण के भाव में  बिखरती-सी गयी |

मातृत्व का मरहम है  हिंदी अब, 
अंग्रेज़ी का टेस्टी टॉनिक बन गया, 
अथाह प्रेम शब्दों में भाव पवित्र  उसके, 
अंतरमन में ही उलझ-सी  गयी, 
संस्कृत, हिंदी का बदलता स्वरुप, 
उसी के शब्दों में सिमटता-सा गया |

       # अनीता सैनी

बुधवार, 11 सितंबर 2019

शतदल-सा संसार सलोना


                                     


हारे नहीं, 
हौंसले अर्थ-व्यवस्था के,    
प्रति पल  हुँकार भरेंगे,
 वे सजग हो  भारी,
 शतदल के सुनहरे दल बनकर, 
 उभरेंगे शक्तिपुंज से, 
जिस हाथ होगा हथौड़ा, 
जिनके हल चलेंगे , 
उसी पेट को रोटी मिलेंगी,  
उन्हीं खेतों में फल मिलेंगे,  
बरसेंगीं ख़ुशियाँ उसी आँगन में, 
 पेड़ हरे होंगे उसी बाग़ के, 
उसी के कर्म कुंदन बनेंगे, 
 उसी माथे पर बल उभरेंगे,
वक़्त के तराज़ू में, 
 समता के दृग दोनों तुलेंगे, 
तभी तपता गगन सुख-समृद्धि के, 
घन से घिरेगा |
सुंदर सुमन सुरसरी-सा होगा, 
 संसार सलोना,   
सहज सुलभ सफल होंगे,   
सब काज,  
 ऐसे  साज़ सजेंगे पथ पर, 
न तपेगा तन मन की तेज़ तपिश से, 
 सहेजेंगे  सानिध्य  सफ़र में, 
 ऐसे  सनातन जीवनसाथी होंगे,   
फ़ज़ा में न होगी वाक-भ्रान्ति,
 कर्म पर तभी गिरेगी प्रीत की गाज, 
बन्धुत्त्व की कोंपलों की बनेंगी कलंगी ,  
मानस  मुकुट सुमन-सा सुन्दर, 
 सजेगा  सीस पर,
  उन्हीं पौधों पर  प्रीत का,  
रस  झरेगा |
शतदल-सा होगा,  
संसार सलोना, 
हिम-गिरि-सा होगा, 
शीतल शाँत चित्त,  
पनपेगी  प्रीत पग-पग पर,  
हो जैसे जूही की कली खिली, 
भूतल पर न होगी  तक़रार,  
गगन के नयनों में न नमी बढ़ेगी ,  
 भाव बहेंगे पत्तों-सी पतवार पर, 
मुग्ध होगी, 
 मधुर धुन में  मानवता सारी, 
प्रयास प्रति पल महकेंगे, 
 पवन के झोंकों से, 
तब मुस्कुरायेगा, 
प्रति प्रभात का पावन चेहरा |

# अनीता सैनी 

रविवार, 8 सितंबर 2019

चंद्रयान -2 : हार नहीं मानना इसरो !



  धड़कनों ने बुना खुली आँखों से  देखा, 
           वह ख़्वाब निराला  है  |

तसव्वुर से तराशा तमाम ख़्वाहिशों में सिमटा, 
वह चंद्रयान-2 उर  की ज्वाला  है |

साँसों ने  सजाया  गौरव हृदय पर  , 
वह दर्द-ए-जिगर का रखवाला है |

इसरो में  उपजी इबादत मेहर मेहनत की,  
वह अरदास का प्याला है |

नासा ने नवाज़ा निहारिका कह ,
वह भारत का सपूत अलबेला है |

भारत की आसमानी हसरतों का पुँज 
 गुमराह हुआ चाँद पर भविष्य का वह उजाला है |

लेंडर विक्रम हुआ बेवफ़ा जाकर मंज़िल के क़रीब  !
प्रति पल सवेरा उम्मीद का धैर्य ने  खोज निकाला है |

ओझल हुआ  सेटेलाइट लिंक नयनों से, 
वह लौटेगा यह विश्वास सबल साँसों ने संभाला है |

  - अनीता सैनी 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

नये मोटर व्हीकल क़ानून का आख़िर विरोध क्यों ?


हम समझते हैं उन नियमों को, 
जिन्हें भारत सरकार ने जनहित में जारी किया, 
न ही हम किसी पार्टी विशेष को सपोर्ट  कर रहे,   
न ही  बग़ावत कर रहे  उन लोगों से जो,  
इस एक्ट का विरोध कर  रहे हैं,  
 नये मोटर व्हीकल क़ानून का आख़िर विरोध क्यों ?
कहाँ ख़ामी नज़र आयी हमें ? 
क्या  ट्रैफिक-पुलिस की 
रेड-लाइट जंप करना  ज़रुरी है ? 
क्या प्रतिबंधित क्षेत्र में गाड़ी पार्क करना? 
या सही तरीक़े  से गाड़ी पार्क नहीं करना,  
 टूवीलर ड्राइविंग के दौरान हेलमेट नहीं पहनना, 
कार ड्राइविंग के दौरान सीट बेल्ट नहीं लगाना, 
नंबर प्लेट नियमानुसार नहीं होने, 
बिना  लयसेंस गाड़ी चलाने, 
बिना रजिस्ट्रेशन गाड़ी चलाने, 
इंसोरेंस और प्रदूषण जाँच के दस्तावेज़  नहीं होने पर,  
या मोटर व्हीकल एक्ट में वाहन चालकों के लिये  
जारी अन्य मानक पूरा नहीं करने पर, 
वह चालान कर सकती है, 
क्या यह ग़लत है, 
अगर हम बिना ड्राइविंग लायसेंस,
रजिस्ट्रेशन और परमिट के वाहन चला रहे हैं,
उसी वक़्त  पुलिस हमारे  वाहन को मौक़े पर ज़ब्त,  करती, 
क्या यह ग़लत है ?
अगर हम  नशे में गाड़ी चला रहे हैं,
 मोबाइल पर बात करते हुए गाड़ी चला रहे हैं,
ओवर लोडिंग कर रहे हैं, 
या फिर रेड-लाइट जम्प करके भाग रहे हैं, 
तब पुलिस हमारे ड्राइविंग लायसेंस को सीज़ करती, 
क्या यह हमारे साथ ग़लत हो रहा है ?
क्या दुर्घटनाओं से हो रही हमारी रक्षा, 
या हमें  सभ्य नागरिक बनाने की सरकारी बाध्यता,  
क्या यह ग़लत है  ?
यातायात नियमों में अनुशासन आने से,  
दुर्घटनाएँ नियंत्रित होंगीं,  
किसी घर में बेवजह माँएं न रोंएँगीं, 
देश में सभ्य नागरिकों की संख्या में इज़ाफ़ा होगा, 
तब बुरी ख़बर का न कोई लिफ़ाफ़ा होगा, 
 क्या यह ग़लत है ? 

#अनीता सैनी 


मंगलवार, 3 सितंबर 2019

लीज़ पर रखवा दिये रिश्ते सभी



ख़ामोशी से बातें करता था 
न जाने  क्यों लाचारी है  
कि पसीने की बूँद की तरह 
टपक ही जाती थी 
अंतरमन में उठता द्वंद्व 
ललाट पर सलवटें  
आँखों में बेलौस बेचैनी
 छोड़ ही जाता था 
दूध में कभी पानी की मात्रा
 कभी दूध की मात्रा घटती-बढ़ती रहती थी  
आज पैसे हाथ में थमाते हुए मैंने कहा 
"पानी तो अच्छा डाला करो भैया 
बच्चे बीमार पड़ जायेंगे "
और वह फूट पड़ा 
क्या करें ?
बहन 
जी !
 मन मोह गये शब्द उसके 
बनाया हृदय का राजदुलारा 
छाया आँखों पर प्रीत रंग 
विश्वास का रंग चढ़ा था गहरा 
तेज़ तपन से तपाया तन को  
बारी-बारी से जले
 न उसको ग़लत ठहराया 
मुकुट पहना उसे शान का 
ख़िताब उसे राजा का थमाया 
उसने भी एक दहाड़ से 
कलेजा सहलाया 
न चोरी करुँगा न करने दूँगा 
पहरेदार बन 
पहरेदारी  में 
इन्हीं शब्दों को दोहराया
आत्मीयता में सिमटा 
 तभी सो गया मन मेरा 
क्योंकि दहाड़ में 
रौब जो था ठहरा  
वर्षों बाद कोई आया था ऐसा 
न देगा चोट न करेगा ज़ख़्म गहरा 
ना-उम्मीद में सो रही साँसों को 
उम्मीद की लौ  का दिया सहारा 
पलट जायेगा पूँजीवाद का तख़्त 
आँखों को  ख़्वाब दिखाये सुनहरे 
इंतज़ार में बैठे हैं 
आज भी दर्द हमारे 
लूट रहा है हमें टैक्स की 
बेरहम टक्कर से 
या खोलेगा कोई राहत का पिटारा
लीज़ पर रखवा दिये  रिश्ते सभी 
होल्ड पर रखी है ज़िंदगी हमारी |

#अनीता सैनी 

शनिवार, 31 अगस्त 2019

कविता मुझे नहीं मैं कविता को जीती हूँ


                                           
प्रति पल आँखें चुराती हूँ, 
 संयोग देखो ! उसका,  
सामने आ ही जाती है, 
कभी पायदान के नीचे,  
 जूतों की मिट्टी में,  
कभी उन जूतों में जो पिछले दो महीने से, 
 किसी के पैरों का इंतज़ार कर रहे हैं, 
उस वर्दी में जो बेड के किसी कोने में,  
दबी अपनी घुटन जता रही है, 
उसके लाखों सवालों में, 
 जो मेरी नाक़ामयाबी पर, 
 कभी कंठ से बाहर ही नहीं निकले, 
कभी-कभी छलक जाती है वह, 
 बच्चों में,उनके मासूम सवालों में, 
उनकी उस ख़ुशी में जो, 
वे संकोचवश  छिपा लेते हैं,  
 फिर कभी मुस्कुराने के वादे  के साथ, 
कभी झलकती है एहसास के गुँचे में, 
जो थमा गये थे वह मेरे हाथों में, 
आज फिर मिली मुझे  झाड़ू के नीचे,  
चीटियों के एक झुण्ड में, 
जो एक लय में चल रहीं थीं , 
 न सवाल न जवाब बस, 
मूक -पथिक-सी चल रही थी, 
कविता मुझे  नहीं, 
मैं कविता को जीती हूँ, 
कविता स्वयं की पीड़ा नहीं,  
मानव की पर-पीड़ा है, 
स्वयं की पीड़ा को परास्तकर, 
पर-पीड़ा को  हृदय पटल पर रखना, 
 मर्म का वह  मोहक मक़ाम है, 
जो  सभी के भाग्य में नहीं होता, 
चरमराती है अंतरचेतना  में वह, 
जब एक मज़दूर के हाथ, 
 छोड़ देते हैं उस का साथ, 
 पटक देता है वह पत्थरों से भरा तसला ,
झुँझला उठता है देख भाग्यविधाता का  ठेला, 
तब जी उठती हूँ  मैं, 
 एक और कविता उसी के केनवास पर, 
उसी के असीम दर्द के साथ |

      # अनीता सैनी 

सोमवार, 26 अगस्त 2019

मैं फिर लिखूँगी


                                           
क्षितिज पटल पर, 
लिखती रहूँगी, 
प्रतिदिन एक कविता,
धूसर रंगों से सजाती रहूँगी,  
उस पर तुम्हारा नाम 

तुम उसी वक़्त निहारना उसे, 
मुस्कुरा उठेगी वही ढ़लती शाम, 
और गटक जाना, 
यादों का एक  जाम 

मैं फिर लिखूँगी, 
घड़ी की सेकंड की सुई से, 
हर एक साँस पर, 
एक और कविता का, 
 झंकृत शब्द लिये  तुम्हारे नाम 

मा  जायेगी वह चिर चेतना में, 
ड़ेल हृदय में  स्वाभिमान, 
पुकारोगे अंजाने में जब उसका नाम, 
 आँखें   झलक जायेंगीं , 
 देख अश्कों  का लिखा  फ़रमान,  
जहाँ शब्द न बने तुम्हारे, 
 ख़ामोशी सुनायेगी उस पहर का पैग़ाम 


आँखों में गुज़ारा है तुमने, 
रात का हर पहर ,
ठुड्डी टिकाये रायफ़ल पर,  
निहारा है खुला आसमान, 
चाँद-सितारों से किया, 
 बखान अपना फ़साना गुमनाम 

कभी ज़मी पर लिखकर मेरा नाम, 
पैर से मिटाते, 
कभी मुठ्ठी में छिपाते, 
मंद-मंद मुस्कुराते, 
और सीने से लगा लेते, 
आँखों की नमी, 
रुधा कंठ सुना देता,   
तुम्हारा अनकहा पयाम 

उसी पल, 
वक़्त की मुठ्ठी में थमा देना, 
सपनों से सजा सुनहरा, 
मख़मली झिलमिलाता आसमान 
    # अनीता सैनी