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मंगलवार, 16 जुलाई 2019

श्री गुरुवै नमः



आशा का दीपक जला, गुरु का करना ध्यान।
तब ही होगी ज्ञान की, राह बहुत आसान।।
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कठिन राह में जो हमें, चलना दे सिखलाय।
गुरु की भक्ति से यहाँ, सब सम्भव हो जाय।।
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गुरु की महिमा का करें, कैसे शब्द बखान।
जाकर के गुरुधाम में, मिलता हमको ज्ञान।।
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मन की कोटर में रखो, हरदम गुरु का रूप।
गूँगे को मिलते जहाँ, शब्द-रूप अनुरूप।। 
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गुरु की अनुकम्पा अदृश, करो गुरू का मान।
आगे बढ़ने को लिए, सीख गुरू से ज्ञान।।

 - अनीता सैनी

रविवार, 14 जुलाई 2019

द्वंद्व




हृदय  की  अगन  से  आहत  न होना,  
उस पल को थाम मुठ्ठी में तुम  ज़िक्र मेरा करना,
उभरेगा  अक्स  आँखों  में,
 नीर  बना  उसे  ना  बहाना,  
वक़्त को थमा अँगुली, 
 हिम्मत उठा कंधों पर,डग जीवन के भरना |

बहता  बहुत जुनून  साँसों में, 
 प्रति पल यही एहसास सजाना,  
भरसक भ्रम भरा है भारी मन में,
 तू इससे पार उतरना,
चित की चेतना पर मर्म मायूसी का, 
मकरंद ! तुम मन मलिन  न करना |

मिलूँगी जीवन के हर मोड़ पर,
बन शीतल जल की प्याऊ,
उस एहसास को तुम,साँसों में समा लेना, 
स्नेह से सींचा है वृक्ष वक़्त  का, 
ठंडे  झोंकों को आग़ोश में भर,
जीवन नैया  को पार तुम लगाना |

अंतरमन में उठेगी झंकारे,
तुम ख़ामोशी से सुनना,
निशा नयनों में भर देगी  ज्योति,
तुम चेतना के चित्त पर मकां अपना बनाना |

- अनीता सैनी 

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

सुनो ! सावन तुम फिर लौट आना



 सुनो ! सावन तुम फिर लौट आना,

फिर महकाना मिट्टी को,

डाल-डाल पर पात सजाना, 

फिर बरसाना, बरखा  रानी  को |



पी  प्रीत  में  पूछूँ  प्रति  पल ,

अधर-विश्वास  न  देना  तुम ,

हँसी  अधरों  पर  लेते  आना ,

न  मायूसी  से  मिलना  तुम |



 चंचला  की  चमक  से, 

घटाएँ  गगन  पर  फिर  फैलाना,

इंद्रधनुष  के  रंगों  से , 

आँचल साँझ  का तुम  चमकाना  |


सुनो ! सावन तुम साथ निभाना, 

 लौट आना  तुम  पी  के  साथ, 

आँगन  फूलों  से  फिर  भर  देना, 

 जब  हों   चौखट पर  मेरे  नाथ |


कोयल की मीठी कूक ले आना, 

साथ पवन के अल्हड़ झोंकों को,

राह  निहारु  पल-पल तेरी ,

भूल न जाना आने को |

- अनीता सैनी 

बुधवार, 10 जुलाई 2019

कल्पित कविता कल्पनालोक ने



हृदय सरगम के निर्मल तारों से , 

अंतरात्मा ने किया भावों को व्यक्त ,

कल्पित कविता कल्पनालोक ने ,

कहीं अनुराग कहीं विरक्त |


कहीं  बिछोह  में  भटकी दर-दर ,

कहीं   अपनों   ने   दुत्कारा ,

नीर  नयन  का  सुख  गया ,

जब उर  ने  उर  को  दुलारा |


करुण  चित्त  का  कल्लोल ,

कल्पना  ने  कल्पा  संयोग ,

शब्द  साँसों  में  सिहर  उठे ,

 जब अंतरमन  से  उलझा वियोग  |


कभी  झाँकती  खिड़की से,

कभी निश्छल प्रेम ने पुकारा,

 कह  अल्हड़  हृदय  का उद्गार, 

जब  जग  ने  दिया  सहारा |


अकेलेपन की अलख से आहत,

ओढ़ा  आवरण  न्यारा ,

 पहनी   पगड़ी   खुद्दारी   की,

  जब कवि ने कविता  को  संवारा |


 - अनीता सैनी

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

ज़िंदगी की किताब



वक़्त  ने   लिखे  अल्फ़ाज़,

ज़िंदगी  की नज़्म  बन  गयी, 

सीने में दबा, साँसों ने लिया संभाल, 

अनुभवों  की  किताब  बन गयी  |


होठों की मुस्कान, 

न भीगे  नम आँखों से,ख़ुशी का आवरण गढ़ गयी,

शब्दों को सींचा स्नेह से,

दर्द में डूबी मोहब्बत,अल्फ़ाज़ में सिमट गयी |


गुज़रे   वक़्त   को, 

आँखों  में किया बंद, लफ़्ज़ ज़िंदगी पढ़ती गयी , 

मिली  मंज़िल  मनचाही, 

हिम्मत  साँसों  में  ढलती गयी  |


 संघर्ष  के  पन्नों  पर, 

अमिट उम्मीद की मसी  फैल  गयी , 

सुख  खिला  संतोष  में,

इंसानियत  की  नींव  रखती   गयी  |


न हृदय को पड़ी,  मैं की  मार, 

न अंहकार से  हुई  तक़रार,

मिली चंद साँसें  उसी  को  जीवन वार,

ज़िंदगी अल्फ़ाज़  में  सिमटी  किताब  बन  गयी |

                

            -  अनीता सैनी 

बुधवार, 3 जुलाई 2019

हृदय का उद्वेग




 हृदय का उद्वेग, 

भावों के उच्च शिखर की,

सीमा को लाँघकर,

त्रासदी बनता हुआ,

गंतव्य की ओर बढ़ता है,

अंतरमन के शब्दों को,

भावनात्मक वेग प्रदानकर,

ध्वनियों से अवतरित अंतरनाद की  मधुर लालिमा में समाहित,

प्रपंचों से दूर,

अधोमुखी स्वरुप में सिमटा हुआ,

 प्रतिपल भावों के वेग को,

तीव्र करता हुआ ,

अंतरात्मा की आवाज़ को इंसानियत के  ओर नज़दीककर,

शब्दों को मुखर रूप प्रदानकर,

अपना अस्तित्व तराशने की,

 चित  में  प्रेरणा का प्रवाहकर

वाणी को मधुरता प्रदानकर,

सृष्टि ने सुशोभित किया,

अंतरात्मा की आवाज़ को |

जबकि मानव लूट रहा,

लुभावने प्रपंचों से,

क्षीणता के कगार पर बैठ,

खंडित कर रहा,

अंतरध्वनि, हृदयपटल पर,

सच कहने और सहने की,

क्षमता से दूर,

गढ़ रहा ढकोसले का मलिन आवरण |


         - अनीता सैनी
 

शुक्रवार, 28 जून 2019

मैं कर्कश संसार में जीना चाहती थी

                   
                                                      
फैला ममता का दामन ,
धर रूप  स्नेह  का,
वात्सल्य भाव  से  बरसना,
संघर्ष  सजा ललाट पर ,
मैं कर्कश संसार  में  जीना चाहती थी |

करोगे  कब तक जीना दुश्वार, 
जो दोष नहीं था मेरा 
 करोगे  कब तक उससे  श्रृंगार,
 मर-मरकर जीने  की राह  चुन,
 मैं कर्कश  संसार में जीना चाहती थी |

जब-जब लगी चाहत से गले ज़िंदगी,
तब-तब अँकुरित हुई कुबुद्धि समाज में, 
गूँथी अनचाहे अपशब्दों की सतत श्रृंखला ,
कर कंठ पर धारण, मैं  कर्कश संसार में जीना चाहती थी |

भावों का विकार सहज सरल,
निर्मल मन को द्रवितकर कुंठा से किया मलिन,
जग ने कह मनोरोगी  किया तिरस्कार,
सब्र टूटा कब मेरा,प्रवाह उम्मीद लिये 
मैं कर्कश  संसार  में  जीना चाहती थी |

अंतर्मन में जग ने जलाया पल-पल ,
क्रोध से भरा अवमानना का दीप,
वक़्त ने  किया  ग़ुमराह,
भाग्य  ने जकड़ी मोम-सी मासूम साँसें, 
मैं कर्कश  संसार में  जीना चाहती थी |

 न  बढ़ाया  मौत  ने  क़दम, 
किया अग्रसर  मेरे अपनों  ने 
नैराश्य  की  पूड़ी  खिला  सानिध्य में, 
भावुक मन अबला का साँसों  से खेल गया, 
मैं  कर्कश  संसार  में  जीना चाहती थी |

                   - अनीता सैनी 



सोमवार, 24 जून 2019

पश्चिमी पथ का कर परित्याग



हे ! मानव 
 पश्चिमी  पथ   का
  कर  परित्याग,
दिखावा  प्रगति  का 
वह  प्रलय  की  पुकार !

 हनन  मानवीय मूल्यों  का 
हारती इंसानियत,
हर तरफ़ हाहाकार
 उजड़ता हसरतों का बाज़ार |

तृष्णा के तेज़ से  बढ़े 
तन  की  तपिश 
देख तड़पता  अंतर्मन !
घनघोर भँवर  में  उलझा  मानव 
 सुने  त्राहि-त्राहि  की  पुकार !

वर्तमान का  विनाशी चेहरा 
प्रतिपल  भविष्य पर  प्रहार, 
देख  कोयल  के कोमल  कंठ  करें   
 करुण  क्रंदन  की  बौछार |

 - अनीता सैनी 

शनिवार, 22 जून 2019

अमृता एक औषधि



भटक  रही, दर-दर  देखो !
 स्नेह  भाव  से  बोल  रही, 
 अमृत  पात्र  लिये  हाथों  में,
सृष्टि, चौखट-चौखट  डोल  रही|

विशिष्ट औषधि, जीवनदात्री,
सर्वगुणों  का  श्रृंगार   किये 
अमृता  कहो   या  गिलोय, 
संजीवनी  का  अवतार  लिये  |

आयुर्वेद  ने  अर्जित  की,
अमूल्य  औषधि  पुराणों  से,
महका, मानव  उपवन  अपना,
अमृता  की  झंकारों  से |

चेत  मानव  चित   को  अपने ,
न  खेल बच्चों की  किलकारी से,
हाथ में औषधि लिये खड़ी,
प्रकृति  जीवन पथ की पहरेदारी  में  |

- अनीता सैनी