समर्थक/Followers

बुधवार, 9 मई 2018

आँखें




रुसवा   हो या रुख़सत  
बयां  कर   देती   हैं 
लफ़्ज़  ख़ामोश हो ज़ालिम 
रूबरू   हो  जाती 
आँखें आईना हैं  
हाल -ए -दिल 
बयां  कर  देती  हैं 

..............


राह 

अँधेरों  को  दिखा  रहे   राह 
मात    उजाले   दे  गये 

बाँट  रहे  वो  मुहब्बत 
मोहताज   सुकूं   के  हो  गये 

बदनसीब  है  ये  ज़माना 
नसीब  में  सितम  लिख  रहा 

पारस    को    ठुकरा 
सीने  से  कंकड़  लगा रहा 

डोर   देश  के  भविष्य  की 
पतंग  समझ आकाश में लहरा रहा |

- अनीता सैनी 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,