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मंगलवार, 31 जुलाई 2018

अकिंचन ...

समय  की  मार  से,
अपनों  के  प्रहार  ने,
कुछ   देने  की  चाह,
भविष्य  की  मुस्कान  ने,
नोच  लिया  आज,        
कल के  ताक़  पर।

आज  के बाशिंदे,   
कल समय के  गुलाम,
खुश  रखने  की  चाह ने,
नोच   लिया  बचपन ।
  
दिखावे   की  मार  ने,
संस्कारों  की  आड़  में,
बचपन  गिरवी   रखा ,
अकिंचन  बना  दिया,
न  जी  सका    आज ,
रही  कल  की  प्यास |

  #अनीता  सैनी 

सोमवार, 30 जुलाई 2018

बदला परिवेश ....

  मिल जाता मकाम
मज़िल  क़दमों  में  होती 
अपनों   के  साथ   चलने   की    कशिश ,
और न  मुहब्बत  होती  ,
न जाने हर कोई  हर बार यही कहता  ।


आसां   होता  अकेले  चलना ,
न पैरों  की उलझन ,
न  कोई सताता  ,


हो  जाता  है  मायूस  ,
जब न मिले  ख़ुशियों का  हिस्सेदार, 
मिले  न कोई  ग़मों  को  पहरेदार  । 


बदल रहा परिवेश, हो रहा है  क्लेश  ,
बिक गये रिश्ते, हो रहा   निवेश । 

बेशुमार  दिखावा  ,
उमड़   रहा  सैलाब   मुहब्बत  का   

हर कोई   बह रहा  !!
न डूब रहा , और न बच रहा कोई  

रविवार, 29 जुलाई 2018

बैरी सावन



दोहे 

बैरी   सावन  माह  बना , पिया  बसे   प्रदेश
मैं   विरहणी  रोती  फिरूँ, नैन निर  नहीं शेष ।

शब्द प्यार में अल्प है ,गहरे लेना भाव।
प्रेम मेरा स्वीकार हो,दिल पर करो न घाव।

नजरों से दूर हो,भेजा है पैगाम।
साजन राह निहारती,गोरी सुबह शाम।

राह निहारें गोरड़ी ,लेकर साजन नाम।
कब आओगे  पीवजी,हुई सुबह से शाम।

बैरी मन लागे नहीं,पिया बसे परदेश।
जिवङो तरसे दिन रेन, नयनन जोए बाट।

दर्पण देख गोरड़ी ,फिर फिर कर सिंगार
रूठ न जावें  पीवजी,सोचे यह हर बार।

पल-पल राह निहारती,घड़ी - घड़ी  बैचैन।
साजन तेरी याद में,बरसे नित ही नैन। 

-अनीता सैनी 

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

मेरी ज़िंदगी मेरी बहन

     

रब  से माँगू यही  दुआ,मिले ख़ुशियों का जहां  ,
न  हो  आँख में  आँसू, हो न कभी मेरे दिल से ज़ुदा।

फूल-सी  कोमल  पारस-सी  पाक,
यह   वजूद   रहा   उसकी   साख।

तारों  की  झिलमिलाती  रोशनी,
   चाँद-सी  चमक  रही   वह ,
धड़कन   सीने  में  दिल, धड़कन   रही  वह ।

मेरी  चाहत  मेरा  मक़ाम  रही   वह ,
झाँकती  हूँ  आईने   में  परछाई   रही   वह  ।

मासूम   चेहरा ,  नादानी   का   पहरा,
दिल  बहुत  साफ़ , ज़ख़्म    बहुत   गहरा।

मुहब्बत   बहुत  है  किनारा  करना  पड़ा ,
डगर   कठिन  है    जीना   सिखाना   पड़ा ।
                                     - अनीता सैनी

बुधवार, 25 जुलाई 2018

एक पन्ना डायरी का

मुहब्बत  का फ़रमान, अपनेपन का एहसास
 समा लेता  दर्द-ए-गम , जताता न कोई अहसान ।।

प्यार  का  अफ़साना, दर्दभरी  कहानी
सहेज  लेता  दिल  में, उसी  की  ज़ुबानी ।।

झूठ  को  बढ़ाता  न  सच   को  छिपाता,
 दिल  बहुत साफ़, जताकर देखो हर बात।

छूट जाते  हर रिश्ते , दफ़्न  हो  जाते  अरमान
डायरी का वह पन्ना,  दोहराता  वही  पहचान ।

- अनीता सैनी 










मंगलवार, 24 जुलाई 2018

कर्म....

ख़ुशियों  के  सैलाब  की चाह
मंसूबे  सिरफिरे   हुए 

छूटी   कर्म  की  डोर
बहा मनु   विनाश  की  ओर

डूबा  ज़िंदगी  के रस  में
उलझा  उलझनों  के भँवर में
कब बच पाया अपने कर्मों से
साया  रहा  कर्म  जीवन  के 

मुस्कान   का   मुखौटा 
दरियादिल   की  चादर
अपनेपन  का  दिखावा
पहन,  करता  रहा  छलावा 

ईश्वर  की  अनमोल  कृति
हुई   बेमोल
गुणों  को  दरकिनार  कर
अवगुण   रहा  तौल।

मानव   मूल्यों   का हरास 
दिखावा   रहा   ख़ास
खोखली   परिपाटी   से
हुआ मनुष्य का  सर्वनाश |


रविवार, 22 जुलाई 2018

आशियाना ...


सुकून से जीने की तलब 
पल-पल  बुन  रहा
भुला  जीने  का सबब

बसर किया जीवन
तिनका-तिनका बटोर 
ग़ुम  हुई  मुस्कुराहट     
उसे    सजाने    में

मनुष्य  का   यह  हाल  
जीवन  उसका  बेहाल  
रही तृष्णा  ज़हन में सवार
खोजता  रहा जीवन में अपनों का प्यार। 

जीवन  जीना गया   भूल  
समय  यूँ  ही गया  धुल  
आशियाना बना  मन का जंजाल
यही रही काल की चाल |

- अनीता सैनी 




गुरुवार, 5 जुलाई 2018

उम्मीद

           "उम्मीद "
आलम ही एसा बना कि,
 तिनका-तिनका बिखर गये,
आँधी न तूफ़ान का अंदेशा,
 कहाँ से भूचाल आ गया।
कुछ हवाओं संग हुए ,
 बचे  पानी में बह गया ।
हताश हुआ न  निराश
बस  देखता    रह गया ।
कुछ   दिन  तरसा  ,
बेहाल मन का हाल फिर दौड़ा,
बुनियाद इस क़दर ठोस की,
आलम देखो  फिर न बरसा ।
निराशा ने दामन छोड़ा,
समय का घोड़ा फिर दौड़ा ।
उम्मीद को  रखा  जकड़े ,
 कर्म का साथ न छोड़ा ।



ज़िंदगी

"ज़िंदगी   "

चली जा रही  ज़िंदगी वह   ,
  हवाओं से भी तेज़,
ठहरी  न एक पल ,
 होश  भी गुमराह  हुए,
गुरुर-सूरुर का पहन  चोला ,
मगरुर हुई  जा रही है।
ज़िंदगी   है  वह,
  तन्हा   चली जा रही है |
तुम नहीं थे साथ में, 
लिये अश्क जा रही।
लोटे हो तुम देखो! 
आलम न पूछो ,
खिलखिलाती आ रही वह  ।।

 #अनीता सैनी

सफ़र


कभी हमारी मुलाक़ात होगी 
अनजानी अनचाही होगी 
ज़िंदगी  की  एक नई शुरुवात होगी 
 दर्द-ए-ग़म  कम न होगें 
फिर  भी खुशियाँ कम  न होंगीं  
अब मैं, मैं नहीं हम होगें 

-अनीता सैनी