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शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

नारी...

महानता  पैर  पसारती,
हर पुरुष के द्वार,
नाम  लिखा जब नारी का,
बीलखति रही हर बार।


बदला  नज़रिया,
 दिलाशा   बड़ी  ,
पैरों  की  बेङियाँ,
आज  भी  वहीं ।

कल  बदला  न  आज,
विचार   में  खड़ी  ।
नारी   की  यह  दशा,
समाज   में    बढ़ी  ।

कहने   को  आजाद,
पिंजरे   में    खड़ी  है,
हाँथ   में   रही   चाबी,
ओर   सोच  में   पड़ी ।

डाँट से न फटकार से,
शिकार किया प्यार से,
बाँध  दिया  दहलीज़ पर,
 रिश्तों  की  दरकार   से।

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