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सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

क्षितिज



पेङो की फुनगी पर  बैठी,
आज सुनहरी शाम,
हर्षित मन, नयन
उम्मीद के द्वार।

विचलित  मन,
तरसती आँखें, बेचैनी
सी  दिल  के  पार,

धीरे धीरे क़दम बढ़ाती,
मायूसी से करती तक़रार,
पहुँची निशा अपने द्वार ।

अरमानों की बरसी बदरी,
गोधुली की बेला छिटकी,
हुई  आहट  द्वार  पर,
चित्र भानु मिलने पहुंचा,
अब धरा  के  द्वार,

पेङो की फुनगी पर  बैठी,
आज सुनहरी शाम,
हर्षित  मन, नयन
उम्मीद  के  द्वार।

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