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बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

दास्तान पिता की

                                         
तमाम  ख़्वाहिशें  सीने में  दफ़न  किये  बैठा
न  जाने  क्यों  वो  अरमान   जलाये   बैठा ?

आज को  गुमराह  कर  कल  को  महफ़ूज किये बैठा
दिल  जला   शमा   बुझाये    बैठा

 गणित  जिंदगी की   दोहराता  रहा   चारों   पहर
उसके   आकङे   फरेबी  नहीं    यही   वो  विचार

न  जाने  कब  तू   दरवाजे  पर दस्तक दे
इसी   बहाने  कुंडी   हटाये    बैठा

बातें  करता  तेरे  जाने  पर  सुकून  से  जीने  की
यादों  को  सीने  से  लगा, अश्क़ों   में  डूबा बैठा

उसके  फलसफ़े   का  कारण  भी  यहीं
कि  वो  जिंदगी   से ज्यादा  तुझसे मुहब्बत कर बैठा |

                     -अनीता सैनी 

2 टिप्‍पणियां:

  1. मेरा दर्द लिख दिया आपने तो बिटिया अनिता मुकेश सैनी

    उत्तर देंहटाएं
  2. तमाम ख़्वाहिशें सीने में दफ़न किये बैठा
    न जाने क्यों वो अरमान जलाये बैठा ?

    आज को गुमराह कर कल को महफ़ूज किये बैठा
    दिल जला शमा बुझाये बैठा

    गणित जिंदगी की दोहराता रहा चारों पहर
    उसके आकङे फरेबी नहीं यही वो विचार

    न जाने कब तू दरवाजे पर दस्तक दे
    इसी बहाने कुंडी हटाये बैठा

    बातें करता तेरे जाने पर सुकून से जीने की
    यादों को सीने से लगा, अश्क़ों में डूबा बैठा

    उसके फलसफ़े का कारण भी यहीं
    कि वो जिंदगी से ज्यादा तुझसे मुहब्बत कर बैठा |....
    एक पिता के दर्द को खूब आपने इस रचना में अपने सब्दों में पिरोया है।
    बेहतरीन जी।

    उत्तर देंहटाएं

आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,