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गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

वज़ह


                                                       
                                           


एक  अरसा  गुजर  गया  तुम्हें  मुस्कुराये    हुये, 
महफ़िल  में   ख़ामोशी   की  क्या  थी  वज़ह  |

मायूसी  का   लिबास  लपेट  लिया   बदन  से ,
ख़ुमारी चढ़ी  मन  में  सादगी  की  क्या थी वज़ह |

मुक्क़दर  में  नहीं  हम,  बहला  कर  ठुकरा  दिया, 
आज    पहलू  में   बैठने   की  क्या  थी   वज़ह |


तुम   मांझी   मैं   पतवार,   ज़िंदगी   थी   नैया, 
बीच  मझधार  में   छोड़  चले  क्या  थी   वज़ह |

दफ़न   कर  दिया  यादों  के  मंज़र  को  यूँ  ही ताबूत में, 
 सिसक  रहा  दिल  तरसती  आँखों  की  क्या  थी  वज़ह |

                        -अनीता सैनी 

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