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मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

आखिर क्यों ?



                                               
                                                        
विचारों का प्रलय  हृदय  को क्षुब्ध,
 मार्मिक  समय मन को स्तब्धता,
के  घनघोर  भंवर  में  डुबो बैठा,
गुरुर के  हिलोरे  मार  रहा मन,
स्वाभिमान दौड़ रहा  रग रग में,
 झलकी  न आँखों  से  लाचारी,
 न   जिंदगी  ने  भरा  दम,
 न लङखङाये   क़दम।

अकेलेपन के माँझे में उलझी
 जिंदगी  से   करती  तक़रार
नहीं  वह  लाचार, 
समाज  के  साथ  चलने   का,
हुनर  तरासती  शमशीर  रही।

देश   ऋणी   उसका,
हर रिस्ते की क़दरदान   रही  वह,
उठते   मंज़र  को  सांसों  में  पिरोया,
हर बला  को  सीने   से  लगाया,
न त्याग  में   कटौती, न  मांगी
खुशियों  की  हिस्सेदारी,
फिर क्यों    कहता  समाज,
शहीद  की  पत्नी   को ,
बेवा   और   बेचारी ?
सराबोर क्यों न करें,
उस ख़िताब से,
जिसकी  वह  हकदार ?

    -अनीता सैनी




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