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सोमवार, 26 नवंबर 2018

वो दो आँखें......


                                      
ख़ामोशी से एक टक ताकना,
उत्सुकता भरी निगाहें ,
अपनेपन से  धड़कती, 
 धड़कनों की  पुकार,
ओर कह रही  कुछ पल मेरे पास   बैठ  !!
 एक कप चाय का बहाना ही क्यों न हो,
कुछ पल सुकून से उस के पास बैठना, 
उसकी जिंदगी का अनमोल पल बन जाता, 
 उसका अकेलापन समझ कर भी  नहीं समझ पाई !!
उसकी वो आँखें तरसती रही ,
धड़कन धड़कती  रही, 
ख़ामोश शब्द बार -बार पुकार रहे, 
मैं व्यस्त थी !!
या एक दिखावा ,
  बड़प्पन के लिए,
 व्यस्तता का दिखावा लाज़मी था !!
क्या मांगती  है माँ ? 
चंद शब्द  प्यार के, 
 दो वक़्त  खाना,
जिंदगी में लुटाई मुहब्बत का कुछ हिस्सा  !!
उसकी जिंदगी के इस और उस,
दोनों छोर पर हम है, 
और हमारी  ....
वो कही नहीं.......
हमारी जिंदगी में हर वस्तु का अभाव.....
प्यार  कर नहीं पाते.. ..
पैसे होते नहीं.. ....
और मकान छोटा लगता.....
और माँ. ......
एक चारपाई  पर पूरा परिवार समेट लेती है !!


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