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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

बेनक़ाब मन


   
                                            
                                    
ग़मों का  जलजला  ख़ूब  लिखा ,  खुशियों  का दरवाज़ा खटखटाते है ,
 रूठने  मनाने  का  सिलसीला छोड़ ,   कुछ    बड़प्पन    दिखते   है 
  

ग़मों  की  चारदिवारी  लगे मन को भारी , खुशियों  को आग़ोश में भरते है ,
लौट  चले  फिर  बचपन में ,मिट्टी  के घरोंदे  मुस्कान सच्ची  ले  आते  है, 

 बहुत   हुआ  किस्मत  का  रोना,    मेहनत  की   रोटी  पकाते  है, 
 झूठ -मूठ के ठाठ -बाठ से सुकून  का जीवन,  मिलकर  सभी  बिताते है, 

  नक़ाब   पर  नक़ाब   ख़ूब   रखे ,  मन   को   बेनक़ाब   करते   है, 
   ठिठुर     रही      धूप    को    फिर   से   दुल्हन   बनाते  है, 
  
   ग़मों    की    दावत   ठुकराते   ,  खुशियों    के    चावल    पकाते  है, 
  मोहब्बत  के   नगमे   गुनगुनाते,    ग़मों  की  दास्ताँ   दफ़नाते  है |


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