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गुरुवार, 3 जनवरी 2019

आशियाना

                                                     

हमक़दम के विषय आशियाना को आधार मानकर,

नारी जीवन की  कुछ  झलक  कविता  के माध्यम से...


 आँखें    पथराई    सी, 
बैठी   चौखट   के   पार , 
दर्द   के  धागें,  सुकूं   की  सिलाई,
तुरपन  रिश्तों   की    हर  बार , 
समय   में   गोते   खा  रही,
ढूढ़   रही   अपना   घर  - द्वार  ||


जग  ने  रीत  बनाई  ऐसी,
दो   आँगन   दो   द्वार, 
बच्चपन  दिल  में  समेट  लिया, 
भूल  मात - पिता, भाई - बहन   का  प्यार, 
समय   में   गोते   खा   रही , 
ढूढ़   रही   अपना   घर -द्वार ||



श्रद्धा    सुमन   से   सींच    रही ,
दो  आँगन,   दो  परिवार ,
सुख़    जीवन   में   त्याग    रही,
विश्वास    का   पोट  किया   तैयार ,
समय    में    गोते    खा   रही ,
ढूढ़   रही   अपना   घर -द्वार ||


सपनें    अपनों    के   बुन   रही, 
समय    से    कर   बैठी   तक़रार, 
जीवन   राह    में   राही    बनी,
बुन   आशियाने   के   नाजुक़  तार, 
समय   में    गोते    खा   रही,
ढूढ़    रही   अपना    घर - द्वार ||

     
              - अनीता 

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