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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

अनुभूति


                                           
अक़्सर वो बेचैन मन से पुकारती ,
 किन्तु  कुछ कहने की सामर्थता न जुटा पाई,
उस की उत्सुकता भरी निगाहें ,
 कपकपाते  होंठ, 
 स्थिर मन , 
डगमगाती   बेचैनी,
  देख  मन  तिलमिलाने  लगा ,
उस का उत्सुकता भरी निगाहों से मिलना, 
उसी  बेचैनी को दिल में समेटे   लौट जाना, 
  देख  कौतुहल  मन  की  दीवारों से झाकंने  लगा, 
समय  के दोनों  छोर  कुरेदती, 
दो कप चाय,
बेचैन आँखों  के  सिवा  कुछ न मिला, 
वक़्त का पड़ाव अपनी करवट ले ही रहा था की , 
जिसे मैं भुला चुकी आज फिर वो मेरी  दहलीज़  पर थी,
 हाथ  में  लकड़ी का सहारा  थामे, 
बारिश  में  कपकपाता  बदन, 
पैरों  की  क्षीण  गति, 
मन में उम्मीद का पुष्प, 
 देख  मन  सिहर उठा, 
उम्र  के ढलते पड़ाव  में उस की   बेचैनी से, 
फिर मन को कौतुहल  का विषय  मिल गया , 
 एक कप चाय जैसे ही उनके के गले से उतरी,
दानवीर कर्ण की भांति   पूछ ही बैठी, 
अम्मा जी कुछ चाहिए क्या ?
वो एक टक  मुझे ताकती  रही,
 मैं गुनहगार की भांति  सर झुकाये  बैठी  रही, 
 धीरे  - धीरे   शब्द  सफ़र पर निकले....
" बेटी  तुम्हारे  घर  में  सुख समृद्धि  का जो पौधा  है
   वैसा  एक मुझे भी दे दो  बरसात के दिन  है पनप जायेगा "
बरसात की तेज बौछारों के साथ ,
मन में विश्वास के बादल गड़गड़ने लगे, 
किस पौधे से बाँधु विश्वास की डोरी ?
बरसात की  बूंदों  में  बह रहा वात्सल्य मेरी  आँखों में झलक गया ||

4 टिप्‍पणियां:

  1. भावपूर्ण अभिव्यक्ति, बहुत खूब

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  2. किस पौधे से बाँधु विश्वास की डोरी ?
    बरसात की बूंदों में बह रहा वात्सल्य मेरी आँखों में झलक गया ||
    बेहतरीन मनोभावों को संजोया है आपने। मानवीय संवेदनाओं से अधिक कुछ भी नहीँ है। शुभकामनाएं ।

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आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,