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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

ग़रीबी



                                             

            हवा  ही  ऐसी  चली ज़माने की, कि  बदनाम हो गई 
               अमीरी  बनी  सरताज़,  गरीबी  मोहताज़   हो  गई 

            नशा  शोहरत का सर चढ़ गया  है  इस क़दर  
           ग़रीबी की  हिराकत देखो यहाँ  सरे आम हो गई 

             सदा  रौंदी   गई  कुचली गई अभावों के तले 
            ग़रीबी मिटाने की कोशिशें  भी नाक़ाम हो गई 

            ऐसा भी न था, कि जमाना मिटा न सका मेरी हस्ती 
 इत्तेफाक ही ऐसा था,कुछ समा गए मुझे में,किसी को मैं निगल गई |

                                   - अनीता सैनी 
     

22 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-03-2019) को "पैसेंजर रेल गाड़ी" (चर्चा अंक-3269) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चा में मुझे स्थान देने के लिए
      सादर

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  2. सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना !

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    1. सहृदय आभार आदरणीय उत्साहवर्धन टिप्णी के लिए
      सादर

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  3. सदा रौंदी गई कुचली गई अभावों के तले
    ग़रीबी मिटाने की कोशिशें भी नाक़ाम हो बेहतरीन प्रस्तुति सखी

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  4. सहृदय आभार आदरणीय
    प्रणाम
    सादर

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    ११ मार्च २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  6. अभिशाप है गरीबी अपने आप में ...
    मेरा मेरा का भाव ही है अब ... गरीब को नहीं सोचता ... सार्थक रचना ...

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  7. सदा रौंदी गई कुचली गई अभावों के तले
    ग़रीबी मिटाने की कोशिशें भी नाक़ाम हो गई
    बहुत सुन्दर ...सार्थक...सटीक....
    वाह!!!

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  8. बहुत सुन्दर बिटिया अनिता सैनी

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  9. सहृदय आभार चाचा जी
    तहे दिल से आभार उत्साहवर्धन टिप्णी के लिए
    सादर नमन

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  10. हवा ही ऐसी चली ज़माने की, कि बदनाम हो गई
    अमीरी बनी सरताज़, गरीबी मोहताज़ हो गई .....
    बहुत सुंदर अनिता जी।

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आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,