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सोमवार, 27 मई 2019

विधाता



नवल   धरा   के   उपवन   को 
ऋतुओं   ने   हर   बार   सजाया 
महक   प्रीत   की    महकी 
 पक्षियों  ने  मधुर  गान   सुनाया 

रचा  ऐसा   संसार   विधाता  
उस  क़लम  के  दरस  करा  दे 
लिखा  उद्गार  मानव  हृदय  का 
अपने  हृदय  का  मरहम  बता  दे 

 कर्म  काया  के साथी  सुख - दुःख 
बहा   करुण  नयनों   से   नीर 
प्रेम  भाव  से   सींचे   मन  को 
जली  प्रिय  प्रीत  में   पीर 

अंतर्वेदना   चित   की  सारी 
कल्पनाओं  का सजा  जीवन  काल 
खेल  विधाता   खेला    ऐसा 
  मोह - माया  का   गूँथा   जाल 

भाग्य - विधाता  भाग्य   बदल  दे 
अन्नदाता  का  जीवन  ख़ुशियों  से  भर  दे 
दीन - दुखियों  का   दर्द  मिटा दे 
महके  जीवन , हृदय में ऐसा  दीप जला दे 

 - अनीता सैनी 

24 टिप्‍पणियां:

  1. अंतर्वेदना चित की सारी
    कल्पनाओं का सजा जीवन काल
    खेल विधाता खेला ऐसा
    बिछा मोह माया का जाल

    जिसने मोह दिया, उसे ही वह कर दे, इसे समर्पण..

    सुंदर भावपूर्ण, प्रणाम

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  2. भाग्य विधाता भाग्य बदल दे
    अन्नदाता का जीवन खुशियों से भर दे
    दीन दुखियों का दर्द मिटा दे
    महके जीवन , हृदय में ऐसा दीप जला दे
    बहुत सुंदर.... . सखी

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    1. सस्नेह आभार प्रिय कामिनी बहन
      सादर

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  3. सर्वे भवन्तु सुखिनः की विराट कामना एवं संसार की भलाई के लिये प्रार्थना उत्तम विचार।

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  4. अति उत्तम। बेहतरीन सृजन मैम।

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  5. उत्तर
    1. सस्नेह आभार प्रिय उर्मिला दी जी
      सादर

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  6. अंतर के शुभ्रतम भावों से महकती सुंदर सरस प्रस्तुति।

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    उत्तर
    1. तहे दिल से आभार प्रिय कुसुम दी जी
      सादर

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (29-05-2019) को "बन्दनवार सजाना होगा" (चर्चा अंक- 3350) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चा में स्थान देने के लिए
      सादर

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  8. वाह!!बहुत सुंदर रचना ,सखी अनीता जी ।
    सबका मंगल होय रे.......।

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    1. सस्नेह आभार प्रिय सखी शुभा जी
      सादर स्नेह

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  9. सुंदर भावपूर्ण रचना

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आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,