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बुधवार, 17 जुलाई 2019

समय के भँवर में उलझ गया मन



समय  के  भँवर  में उलझ गया  मन
जाने   क्यों   अकुलाई  मैं  ?  
चेतना  चित  की  चहक  उठी ,
जाने  क्यों  शरमाई  मैं ? 

 सुघड़  भाव  बँधे आँचल से,
लगी  प्रीत  की  गाँठ,
कैसे सजन सम्भालूँ मन  को ?
 मन  सिसके  पहर   आठ |

पी  प्रीत  में  हारी  मन  को, 
समझो  मन   की   बात, 
सुबह-शाम मन बींधे मन को,
उलाहना   देती   रात |

लाज-शर्म  में  डूब  गया   मन, 
 हुई  न  चौखट  पार, 
बढ़ते  क़दमों को रोक रहा मन,
खुले  न  मन  के  द्वार |

जीवन पथ पर हार गया मन ,
थामों  मन  का  हाथ, 
जरा-जरा सी बातों पर न रुठो,
न   छोड़ो  मन   का  साथ |

- अनीता सैनी 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-07-2019) को "नदारत है बारिश" (चर्चा अंक- 3406) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सहृदय आभार आदरणीय चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए
      सादर

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  2. सुघड़ भाव बँधे आँचल से,
    लगी प्रीत की गाँठ,
    कैसे सजन सम्भालूँ मन को ?
    मन सिसके पहर आठ |


    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुघड़ भाव बँधे आँचल से,
    लगी प्रीत की गाँठ,
    कैसे सजन सम्भालूँ मन को ?
    मन सिसके पहर आठ |
    बहुत खूब प्रिय अनीता 👌👌👌👌👌💐💐💐

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