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शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

विचार बुनते है ज़िंदगी



मन में  उड़ती विचारों  की  धूल,
करती है ख़्वाहिशों  को स्थूल , 
 तत्परता के  साथ समझौता करती है ज़िंदगी |
  बटेर-सी पुकारती  आत्मा की आवाज़,
खेजड़ी की छाँव में बिठाकर ढाढ़स बँधाने का,
 ढकोसला ख़ूबसूरती से सजाती है ज़िंदगी |

वक़्त की झिल्ली पर फिसलती  ख़्वाहिशें देख,
 झिलमिलाहट की चादर ओढ़ा देती है ज़िंदगी  |
 सपनों  के थान में सुकून से लिपटकर ,  
हृदय में  फिर फुसफुसाती  है ज़िंदगी  |

दृश्य-अदृश्य का खेल-खेलती,
जुगनू-सी  चमकती है ज़िंदगी |
हवा में  फैला सुकूँ का आँचल,
 मन के एक कोने में  महकने लगती है ज़िंदगी  |

बटोरने लगती है  बेसब्री से स्वप्न ,
मन की सुराही में,
 हाथों से छूट फिर बखर जाती है ज़िंदगी  |
 कुछ उलझें  कुछ बिन गूँथें , 
धड़कनों  से  रिसते  ख़्वाब ,
वक़्त की दहलीज़ पर बैठ ,
  अनचाहे आकार में ढलती है ज़िंदगी  |

रुठी  नज़्म ज़िंदगी की,
बारिश की बौछारों  से फिर महकाने  लगती है ज़िंदगी |
कागज़ की कश्ती पर सवार कुछ  ख़्वाबों को  ,
अपनत्व के भाव से फिर पुकारने लगती है ज़िंदगी |

 ऊँघते चित्त पर  वक़्त का मरहम, 
 मेहंदी के लेप-सा सुकूँ पहुँचाती  है ज़िंदगी  |
विचारों से निकली  उजली  धूप,
 रंग प्रीत का सपनों में भर फिर मुस्कुराने लगती  है ज़िंदगी |
पदचिह्नों को गहरा करने का पाठ,
ज़िंदगी को बख़ूबी पढ़ाती  है ज़िंदगी  |

-अनीता सैनी 

25 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 03 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया दी जी मुझे स्थान देने के लिए
      सादर

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  3. कश्मकश होती ही है ज़िन्दगी को नये अर्थ प्रदान करने के लिये. ज़िन्दगी का अंतर्द्वंद्व एक अनवरत प्रक्रिया है जिसमें कभी ख़ूबसूरत रंग नज़र आते हैं तो कभी धूमिल उदासियों के रंगहीन साये.
    पाठक को ऊँची-नीची घाटियों की सैर कराती अभिव्यक्ति.
    सुन्दर रचना.

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    1. सुन्दर समीक्षा के लिए तहे दिल से आभार सर
      सादर

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  4. दृश्य-अदृश्य का खेल-खेलती,
    जुगनू-सी चमकती है ज़िंदगी |
    हवा में फैला सुकूँ का आँचल,
    मन के एक कोने को महकाने लगती है ज़िंदगी... बहुत सुंदर रचना सखी 👌👌

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  5. रुठी नज़्म ज़िंदगी की,
    बारिश की बौछारों से फिर महकाने लगती है ज़िंदगी |
    कागज़ की कश्ती पर सवार कुछ ख़्वाबों को ,
    अपनत्व के भाव से फिर पुकारने को कहती है ज़िंदगी |
    बहुत खूब प्रिय अनिता , जिन्दगी की कशमकश को बहुत सुंदर अभिव्यक्ति दी है तुमने | सस्नेह शुभकामनायें इस भावपूर्ण लेखन के लिए |

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  6. अत्यंत मनमोहक प्यारा चित्र जिसने संलग्न हो रचना को और भी मनभावन बना दिया है |

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  7. कागज़ की कश्ती पर सवार कुछ ख़्वाबों को ,
    अपनत्व के भाव से फिर पुकारने लगती है ज़िंदगी |
    - सुन्दर व्यंजना प्रस्तुत की है.

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (05-08-2019) को "नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार" (चर्चा अंक- 3418) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. सहृदय आभार सर चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए
      सादर

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  9. बहुत सुंदर रचना प्रिय अनु..ज़िंदगी कश्मकश में उलझी भावनाओं का सफ़र है।
    शब्दों का नवीन प्रयोग ध्यानाकर्षित कर रहा ..लिखते रहो क़दम दर क़दम बढ़ते रहो।
    तस्वीर बहुत प्यारी है।

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  10. "वक़्त की झिल्ली पर फिसलती ख़्वाहिशें देख,
    झिलमिलाहट की चादर ओढ़ा देती है ज़िंदगी |"
    अतुलनीय बिम्ब अनीता जी ... जीवन की सच्चाई और कल्पनाओं के बीच गति से झूला झुलाती रचना ...

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय सुन्दर समीक्षा के लिये
      सादर

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  11. एक फौजी की मासुम सी जीवन संगिनी जिंदगी को कितनी संजीदगी से परिभाषित करती है ।
    कल्पनातीत ।
    सांगोपांग।

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  12. ज़िन्दगी की कशमकश को कमाल के शब्दों में बयान किया है ...
    संजीदा रचना ...

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  13. अनीता जी बहुत सुन्दर रचना ////

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    उत्तर
    1. जी तहे दिल से आभार आप का अच्छा लगा आप ब्लॉग पर पधारे
      सादर स्नेह

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आदरणीय/आदरणीया, स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिये आपका हार्दिक धन्यवाद,