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बुधवार, जुलाई 25

कर्म....

ख़ुशियों  के  सैलाब  की चाह
मंसूबे  सिरफिरे   हुए 

छूटी   कर्म  की  डोर
बहा मनु   विनाश  की  ओर

डूबा  ज़िंदगी  के रस  में
उलझा  उलझनों  के भँवर में
कब बच पाया अपने कर्मों से
साया  रहा  कर्म  जीवन  के 

मुस्कान   का   मुखौटा 
दरियादिल   की  चादर
अपनेपन  का  दिखावा
पहन,  करता  रहा  छलावा 

ईश्वर  की  अनमोल  कृति
हुई   बेमोल
गुणों  को  दरकिनार  कर
अवगुण   रहा  तौल।

मानव   मूल्यों   का हरास 
दिखावा   रहा   ख़ास
खोखली   परिपाटी   से
हुआ मनुष्य का  सर्वनाश |


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