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मंगलवार, 31 जुलाई 2018

बदला परिवेश ....

  मिल जाता मकाम
मज़िल  क़दमों  में  होती 
अपनों   के  साथ   चलने   की    कशिश ,
और न  मुहब्बत  होती  ,
न जाने हर कोई  हर बार यही कहता  ।


आसां   होता  अकेले  चलना ,
न पैरों  की उलझन ,
न  कोई सताता  ,


हो  जाता  है  मायूस  ,
जब न मिले  ख़ुशियों का  हिस्सेदार, 
मिले  न कोई  ग़मों  को  पहरेदार  । 


बदल रहा परिवेश, हो रहा है  क्लेश  ,
बिक गये रिश्ते, हो रहा   निवेश । 

बेशुमार  दिखावा  ,
उमड़   रहा  सैलाब   मुहब्बत  का   

हर कोई   बह रहा  !!
न डूब रहा , और न बच रहा कोई  

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