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शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

उम्मीद

           "उम्मीद "
आलम ही एसा बना कि,
 तिनका-तिनका बिखर गये,
आँधी न तूफ़ान का अंदेशा,
 कहाँ से भूचाल आ गया।
कुछ हवाओं संग हुए ,
 बचे  पानी में बह गया ।
हताश हुआ न  निराश
बस  देखता    रह गया ।
कुछ   दिन  तरसा  ,
बेहाल मन का हाल फिर दौड़ा,
बुनियाद इस क़दर ठोस की,
आलम देखो  फिर न बरसा ।
निराशा ने दामन छोड़ा,
समय का घोड़ा फिर दौड़ा ।
उम्मीद को  रखा  जकड़े ,
 कर्म का साथ न छोड़ा ।



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