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सोमवार, 17 सितंबर 2018

लौट आते तुम

   लौट आते तुम 
एहसास  के  समुंदर  में,
डूब  रहा  मन,
लौट आते   तुम,
अपनेपन की कश्ती पर।

ज़िंदगी  के भँवर  में,
उलझ न जायें, 
यही सोच फटकार रही  तुम्हें,
कलेजा तड़पता  रहा,
क़दमों को मंजिल मिले,
यही सोच दौड़ाती  रही   तुम्हें। 

वही  आँगन,
वही  द्वार,
पहूँची न  दिल तक,
एक माँ की पुकार,
शब्दों की रही  तक़रार,
दिल में  उफ़न रहा
 स्नेह का सागर  ,
समझ  न  पाया  बेटा,
एक माँ का प्यार। 

इंतज़ार  में  साँसें   छूटी,
यादें  वहीं  खूँटी   पर  टूटीं 
बेटे  के  इंतजार में 
माँ  भी  संसार से छूटी ।

# अनीता सैनी 

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