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गुरुवार, नवंबर 29

आवाज़ मन की


       सुलग रहा यादों का जंगल, 
 तन्हा और बेजान, 
  आवाज़ उर में धड़क रही,
 बन मीठा-सा गान, 
ह्रदय प्रीत में  सुलग रहा, 
  सुमरुँ  पिया का नाम ,
  नीर नयन  का  सूख  गया, 
 बन  मीठी   मुस्कान,  
 लौट आएँगे  माही  मेरे, 
मन  में था यही भान, 
   पदचिह्नों  को दिल से लगाया, 
  बन  बैठे  श्रीराम, 
सीता उसकी राह तके, 
 रुठ  गये   मेरे  राम  ,
 मन बैरी बौराया  माही, 
धड़कन  हुई   बेचैन,
वहम से नाता जोड़ रही, 
  मूक वेदना की यही तान, 
लौट आयेंगे  माही  मेरे, 
 मन में था यही  गान, 
 प्रीत में उलझी मन की डोरी, 
हाथ  हुए  बेजान ,
 यादें  उर में  सुलग  रहीं ,
 तन्हा और बेजान, 
 माही मेरे  मन  में  बैठे,
पुकारुँ   मैं   दिन-रैन,
 लौट  आयेंगे  माही मेरे, 
मन  में था यही  गुमान।
 
@अनीता सैनी 
 
                          

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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (11-11-2020) को   "आवाज़ मन की"  (चर्चा अंक- 3882)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  2. वास्तव में एक बहुत अच्छी रचना |

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  3. सुन्दर प्रस्तुति

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