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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

अन्नदाता

गुरुर धधक रहा सीने  में ,
 पगड़ी पहन स्वाभिमान की, 
अंगारों पर चलता हूँ। 
आग़ोश  में मोहब्बत , 
आँचल में उम्मीद समेटे, 
निश्छल नित्य आगमन करता हूँ। 
ख़ुशियों का मोहताज़ नहीं ,
ग़मों  से बातें  करता 
 फ़सलों संग इठलाता  हूँ। 
सूरज-चाँद-सितारे,साथी  मेरे ,
 जीवन  के  राग
 मोहब्बत  का  गान  सुनता  हूँ। 
मेहनत  करना काम मेरा, 
 मेहनत  ही  रहा  ईमान  मेरा
 मेहनत की रोटी खाता हूँ। 
आन-बान-शान, 
मान जीवन के साथी
  सीने से इन्हें लगाता, 
किसान   हूँ, 
अन्नदाता  कहलाता हूँ। 

@अनीता सैनी 
                           

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (22-11-2020) को  "अन्नदाता हूँ मेहनत की  रोटी खाता हूँ"   (चर्चा अंक-3893)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  2. बेहतरीन रचना सखी।

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anitasaini.poetry@gmail.com