Powered By Blogger

शुक्रवार, दिसंबर 14

ऋतुराज शिशिर


                                                                                            
निशा   निश्छल   मुस्कुराये  प्रीत  से, 
विदा    हुई   जब   भोर   से। 


तन्मय   आँचल   फैलाये   प्रीत का , 
पवन  के   हल्के   झौकों    से। 


कोयल    ने   मीठी    कूक  भरी, 
जब   निशा   मिली   थी   भोर   से। 


ऊषा     स्नेह    में    डूब    गई, 
जब   बरसी   बदरी   धूर   की। 


 प्रीत   धरा    की   मुग्ध   हुई ,
कुसुमों   ने   ताज  सजाया   है। 


गूँज    रही   पायल   प्रीत   की , 
शिशिर    के   नंगे    पाँव   की। 


सिहर    उठा   जनमानस   भी ,
शिशिर    की   शीतल    छाँव   से। 

              #अनीता सैनी 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर सृजन।
    अनीता जी, यदि आप अन्यथा न लें तो बहुत दिनों से एक त्रुटि के लिए कहना चाहती हूँ। जब आप किसी गद्य की भूमिका लगाएं तो कृपया काव्यांश के स्थान पर गद्यांश लिखें। आशा है कि आप इसे सकारात्मक रूप से लेंगी। बहुत प्यार आपको।

    जवाब देंहटाएं
  2. कृपया इसे स्पैम में डाल दें या हटा दें। किसी अन्य की नजर न पड़े।

    जवाब देंहटाएं