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बुधवार, 2 जनवरी 2019

वक़्त का वार

                                           

वक़्त बे-वक़्त,वक़्त ने किया वक़्त पर वार,

ज़ख़्म  गहरें,ख़ामोशी से वक़्त ने किया प्रहार |



  ख़ंजर कर्मों का,वक़्त  का रहा प्रहार ,

 बे-ख़बर मन  मेरा न  कर सका  तक़रार |



वक़्त का  प्रहार  महफ़िल में  हुस्न-ए-यार, 

वक़्त-ए-बेताबी-ए-ख़ामोशी में सिसक  रहा  प्यार |



जज़्ब-ए-ग़म का मशविरा सुन रहे, हुस्न-ए-प्यार , 

ख़ामोश हुस्न,इंतज़ार  में प्यार,वक़्त  की रही मार |



अपनी नजरों  का  वार,फेंक   बढ़  जाता   उस पार , 

 मैं वक़्त की शो-केस में खड़ी,देख रही वक़्त का प्रहार |


                                  - अनीता सैनी 


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