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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

आशियाना

                                                     

 आँखें    पथरायी-सी, 
बैठी   चौखट   के   पार , 
दर्द   के  धागे,  सुकून   की  सिलाई,
तुरपन  रिश्तों   की    हर  बार , 
समय   में   गोते   खा  रही,
ढूढ़   रही   अपना   घर-द्वार  |


जग  ने  रीत  बनायी  ऐसी,
दो   आँगन   दो   द्वार, 
बचपन दिल  में  समेट  लिया, 
भूल  मात-पिता, भाई-बहन   का  प्यार, 
समय   के भवँर  गोते   खा   रही , 
ढूढ़   रही   अपना   घर-द्वार |



श्रद्धा    सुमन   से   सींच    रही ,
दो  आँगन,   दो  परिवार ,
सुख    जीवन   में   त्याग    रही,
विश्वास    का  पात्र  किया   तैयार ,
समय    में    गोते    खा   रही ,
ढूढ़   रही   अपना   घर-द्वार |


सपने     अपनों    के   बुन   रही, 
समय    से    कर   बैठी   तक़रार, 
जीवन   राह    में   राही    बनी,
बुन   आशियाने   के   नाजुक   तार, 
समय   में    गोते    खा   रही,
ढूढ़    रही   अपना    घर-द्वार |

     
              - अनीता सैनी 

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