गुरुवार, 18 जुलाई 2019

समय के भँवर में उलझ गया मन



समय  के  भँवर  में उलझा है मन
जाने   क्यों   अकुलाई  मैं  ?  
चेतना  चित  की  चहक  उठी ,
जाने  क्यों  शरमाई  मैं ? 

 सुघड़  भाव  बँधे आँचल से,
लगी  प्रीत  की  गाँठ,
कैसे सजन सम्भालूँ मन  को ?
 मन  सिसके  पहर   आठ |

पी  प्रीत  में  हारी  मन  को, 
समझो  मन   की   बात, 
सुबह-शाम मन बींधे मन को,
उलाहना   देती   रात |

लाज-शर्म  में  डूब  गया   मन, 
 हुई  न  चौखट  पार, 
बढ़ते  क़दमों को रोक रहा मन,
खुले  न  मन  की  गाँठ |

जीवन पथ पर हार गया मन ,
थामों  मन  का  हाथ, 
जरा-जरा सी बातों पर न रुठो,
न   छोड़ो  मन   का  साथ |

- अनीता सैनी 

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (24-07-2019) को "नदारत है बारिश" (चर्चा अंक- 3406) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

dr.zafar ने कहा…

सुघड़ भाव बँधे आँचल से,
लगी प्रीत की गाँठ,
कैसे सजन सम्भालूँ मन को ?
मन सिसके पहर आठ |


बहुत खूब

Jyoti khare ने कहा…

वाह बहुत सुंदरर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

सहृदय आभार आदरणीय
सादर

अनीता सैनी ने कहा…

बहुत बहुत शुक्रिया सर

रेणु ने कहा…

सुघड़ भाव बँधे आँचल से,
लगी प्रीत की गाँठ,
कैसे सजन सम्भालूँ मन को ?
मन सिसके पहर आठ |
बहुत खूब प्रिय अनीता 👌👌👌👌👌💐💐💐

अनीता सैनी ने कहा…

शुक्रिया दी जी
सादर स्नेह