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रविवार, जनवरी 4

उस ओर


उस ओर 

✍️ अनीता सैनी

……

अगर तुम 
ले जा सकते हो,
तो
ले चलो 
उस शोर के पार
जहाँ दुनिया
अपने जूतों की आवाज़
दरवाज़े पर उतार देती है,
और पत्तों की ओट से
धूप
धीरे-धीरे
मन को छू जाती है।

ले चलो 
उस ऊँचाई पर
जहाँ स्त्री
एक प्रश्न नहीं,
एक उत्तर लगती है।
उन रास्तों पर ले चलो 
जहाँ हर सरसराहट
कोई कथा नहीं रचती है,
केवल
एक स्वीकार बनकर
मन में उतर जाती है।

ले चलो 
वहाँ
जहाँ पहली बारिश
धरती को
उसके नाम से पुकारती है,
और मिट्टी
अपनी स्मृति में
सुगंध भर लेती है,
जहाँ आशा
हल की मूठ थामे
फिर से खड़ी हो जाती है।

ले चलो 
उस साँझ के द्वार जो देहरी पर
थकान रखवा देती है,
जहाँ स्पर्श ही भाषा है,
 शब्द
थककर चुप हो जाएँ
और चुप्पी
सबकी साझा भाषा बन जाए।

गुरुवार, जनवरी 1

आत्मा का दर्द


आत्मा का दर्द / 
✍️ अनीता सैनी
…..

मैं
दिन और रात
दोनों करवटों का साक्षी हूँ।

नींद
मेरे भीतर
रास्ता खोजती है,
पर
दर्द
हर दरवाज़े पर
जागता मिलता है।

तभी
अंदर की सबसे गहरी परत में,
बिछा
और वहीं
सबसे ज़्यादा जागता हूँ।

अँधेरे की दरारों में छिपा,
हर साँस के साथ
पहर गिनता
देह के भीतर
एक और मौन
रख देता हूँ।

मेरे न सोने से
चुप्पी जन्म लेती है—
रक्त में घुलती है
धीरे, बहुत धीरे,
जैसे
कोई रंग
जिसे किसी ने देख तो लिया
पर नाम नहीं दिया।

आह!
थकान देह तक आते-आते
मुड़ जाती है।
नींद
मुझे
पहचानने से
इन्कार कर देती है
और
रक्त में
जो मीठा था,
धीरे-धीरे
उतर जाता है।