उस ओर
✍️ अनीता सैनी
……
अगर तुम
ले जा सकते हो,
तो
ले चलो
उस शोर के पार
जहाँ दुनिया
अपने जूतों की आवाज़
दरवाज़े पर उतार देती है,
और पत्तों की ओट से
धूप
धीरे-धीरे
मन को छू जाती है।
ले चलो
उस ऊँचाई पर
जहाँ स्त्री
एक प्रश्न नहीं,
एक उत्तर लगती है।
उन रास्तों पर ले चलो
जहाँ हर सरसराहट
कोई कथा नहीं रचती है,
केवल
एक स्वीकार बनकर
मन में उतर जाती है।
ले चलो
वहाँ
जहाँ पहली बारिश
धरती को
उसके नाम से पुकारती है,
और मिट्टी
अपनी स्मृति में
सुगंध भर लेती है,
जहाँ आशा
हल की मूठ थामे
फिर से खड़ी हो जाती है।
ले चलो
उस साँझ के द्वार जो देहरी पर
थकान रखवा देती है,
जहाँ स्पर्श ही भाषा है,
शब्द
थककर चुप हो जाएँ
और चुप्पी
सबकी साझा भाषा बन जाए।
