शुक्रवार, अप्रैल 29

मरुस्थल


तुम्हें पता है?

मरुस्थल डकार मारता

नंगे पाँव दौड़ता

चाँद की ओर कूच कर रहा है।

साँप की लकीरें नहीं

 इच्छाएँ दौड़ती हैं

 देह पर उसकी!

पैर नहीं जलते लिप्सा के ?

तुम्हें पता है क्यों?

घूरना बंद करो!

मुझे नहीं पता क्यों?


पेड़-पौधों पर चलाते हो 

वैसे रेगिस्तान पर आरियाँ 

कुल्हाड़ियाँ क्यों नहीं चलाते हो ?

इसकी भी शाख क्यों नहीं काटते हो ?

चलो जड़ें उखाड़ते हैं!

मौन क्यों साधे हो?

कुछ तो कहो ?

चलो आँधियों का व्यपार करते हैं!

उठते बवंडर को मटके में ढकते हैं!

धरती का आँगन उजाड़ा 

उस पर किताब ही लिखते हैं!

घूर क्यों रहे हो?

चलो तुम्हारी ही जी-हुजूरी करते हैं

क्यों?

तुम्हें नहीं पता क्यों?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, अप्रैल 22

कैसा करतब है साहेब?



प्रयोगशाला की 

परखनली में गर्माती राजनीति

अब गलियों के नुक्कड़ पर 

घुलने लगी है साहेब!

दो वक़्त रोटी की फ़िक्र में 

भटकती देह 

हथियारों के ज़िक्र में

सूखने लगी है 

इंसानियत नहीं साहेब!

कूटनीति फूट-फूटकर

करतब दिखाती 

ताड़ के पेड़-सी सर उठने  लगी है 

 बुद्धि को लगने लगा है 

 वो धरती घुमाने लगी है

तराजू में तुलती मानवता 

 ईमान-धर्म टूट-टूटकर बिखरने लगा है 

 माया का रचाया तूने कैसा खेल?

 पाषाण उचक-उचककर खेलने लगें हैं 

जगह बताते रिश्तों की 

समझदार हो गए बच्चे साहेब!

अँगुली पकड़कर चलने वाले 

 बूढ़े माँ-बाप को अब 

दुनियादारी समझाने लगे हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


सोमवार, अप्रैल 18

उल्लास अधरों पर टाँगते हैं


सम्मोहन नश्वर नहीं प्रभात का

रचा-रचाया इन्द्रजाल है रात का

देखो!सहर सँवर आई चौखट पर 

उठो! पथ पर फूल बिछाते हैं

सूरज ढलने का बहाना छिपाते हैं।


जीवन ललाट पर भोर बिखेरते हैं 

टनियों से छनती धूप को हेरते हैं 

पाखी कलरव से झरते भाव  

प्रीत फल हृदय को पुगाते हैं

चलो!उजास के वृक्ष उगाते हैं।


अनमने से खोये-खोये न बैठो तुम

उफनते भाव-हिलोरों को न ऐंठो तुम 

पहर पखवाड़े में सिमटती ज़िंदगी के 

चलो! उल्लास अधरों पर टाँगते हैं 

यों निढाल न बनो स्वप्न हाँकते हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अप्रैल 9

आडावाळी



मरू देश री आडावाळी 

विधणा री हिळकोरी है।।

दादी बणके भाग जगायो

काळजड़े री लोरी है।।


प्रीत पाठ पाषाण पढ़ावे 

आभौ बोव हिवड़ा माण।

जुगा-जुगा री काणी कहवे 

बाँह पसार लुटाव जाण।

छटा सोवणी बादळ चूमे

टेम-टेम री जोरी है।।


पिढ्या तक रो गौरव गाडो

माथ टिकलो सोह रह्या।

धनधान्या से भरा आँगणा 

राजस्थान रो मोह रह्या।

दुर्ग-किला री करे रखवाळी 

चाँद सूरज री छोरी है।।


साखी लूणी जीवण सरवर

गळियाँ पाणी री थेथर।

ठंडा झोंका लू रा थपेड़ा

गोदी माह खेल्य खेचर।

भाग बळी रो बाळू बरगो 

लेरा आँधी होरी है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, अप्रैल 6

हे कवि!



बगुला-भक्तों की मनमानी

कब विधाता की लेखनी ने जानी?

गौण होती भविष्य की रूपरेखा

हे कवि! तुमने कुछ नहीं देखा?


जन जीवन के, हृदय के फफोले 

भक्तों ने पैर रख-रखकर टटोले।

दबे कुचलों की मासूम चीखें

हे कवि! निष्पक्ष होकर लिखें।


बच्चों के हाथों से छीनते रोटी

जात-पात की फेंकते गोटी।

ग़रीबों का उजड़ता देख चूल्हा 

हे कवि! तुम्हारा पेट नहीं फूला?


कैसा मनचाहा खेल रचा?

ख़ुदा बनने का यही रास्ता बचा?

शक्तिमान बनने का कैसा जुनून?

हे कवि! क्यों नहीं टोकता क़ानून?


तुम भाव प्रकृति के पढ़ते हो

भावनाओं को शब्दों में गढ़ते हो?

वर्तमान देख भविष्य लिखते हो

हे कवि!  तुम कैसे दिखते हो?


दर्द लिखते हो? या दर्द  जैसा ही कुछ

अंतरमन में अपने झाँक कर पूछ।

सरहद-सी बोलती लकीर का खींचना

हे कवि! कर्कश होता है युद्ध का चीख़ना।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'