गूँगी गुड़िया

अनीता सैनी

बुधवार, जनवरी 21

मौन का पड़ाव

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मौन का पड़ाव / अनीता सैनी ……. उसकी शिथिल पड़ती जुबान… पर तुम उस एकांत को छू नहीं सकते जहाँ देह नहीं, भाव आख़िरी साँस भरते हैं।...
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रविवार, जनवरी 4

उस ओर

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उस ओर  ✍️ अनीता सैनी …… अगर तुम  ले जा सकते हो, तो ले चलो  उस शोर के पार जहाँ दुनिया अपने जूतों की आवाज़ दरवाज़े पर उतार देती है...
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गुरुवार, जनवरी 1

आत्मा का दर्द

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आत्मा का दर्द /  ✍️ अनीता सैनी ….. मैं दिन और रात दोनों करवटों का साक्षी हूँ। नींद मेरे भीतर रास्ता खोजती है, पर दर्द हर दरवाज़े...
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सोमवार, दिसंबर 29

ओसरी में खड़ा गवाह

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ओसरी में खड़ा गवाह अनीता सैनी ……. उसे दिखाई देता है मोह का एक विशाल वृक्ष, जिसकी जड़ों में सदियों की आदतें पानी की तरह लगातार रि...
मंगलवार, दिसंबर 9

प्रतीक्षा एक तीर्थ

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प्रतीक्षा एक तीर्थ  ✍️ अनीता सैनी …… कोई भी साया बस यूँ ही देवद्वार तक नहीं जाता भटकन उसे भी खारी लगने लगती है। मन की मरुस्थली द...
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गुरुवार, दिसंबर 4

भीतर की थिरकन

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भीतर की थिरकन  ✍️ अनीता सैनी …. कभी-कभी हवा के हल्के झोंके से भाव मन की भीतरी डोर कस लेते हैं और भीतर के समंदर में एक सूक्ष्म कं...
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मंगलवार, नवंबर 25

रेत पर बिखरे उत्तर

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रेत पर बिखरे  उत्तर ✍️ अनीता सैनी ….. कभी धूप में झिलमिलाते उस सुनसान विस्तार से दृष्टि मत मोड़ना— उसका वही एक चकत्ता, जहाँ पृथ्...
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रविवार, नवंबर 16

नदी का छिपा हुआ दीप

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नदी का छिपा हुआ दीप (मौन की गहराई में जन्म लेता उजास) ✍️ अनीता सैनी .... मेरी हर सुबह मेरे पुरखों की हड्डियों में सोया उजास लेकर...
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रविवार, नवंबर 2

रेत भी प्रेम में उतरती है

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रेत भी प्रेम में उतरती है ✍️ अनीता सैनी ……… रेत — बहुत धीरे-धीरे बहती है, जैसे मरुस्थल ने पानी की स्मृति को कंठ में रोक लिया हो।...
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अनीता सैनी
मैं एक ब्लॉगर हूँ, स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हूँ, प्रकृति के निकट स्वयं को पाकर रचनाएँ लिखती हूँ, कविता भाव जगाएँ तो सार्थक है, अन्यथा कविता अपना मर्म तलाशती है |
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