रविवार, जनवरी 4

उस ओर


उस ओर 

✍️ अनीता सैनी

……

अगर तुम 
ले जा सकते हो,
तो
ले चलो 
उस शोर के पार
जहाँ दुनिया
अपने जूतों की आवाज़
दरवाज़े पर उतार देती है,
और पत्तों की ओट से
धूप
धीरे-धीरे
मन को छू जाती है।

ले चलो 
उस ऊँचाई पर
जहाँ स्त्री
एक प्रश्न नहीं,
एक उत्तर लगती है।
उन रास्तों पर ले चलो 
जहाँ हर सरसराहट
कोई कथा नहीं रचती है,
केवल
एक स्वीकार बनकर
मन में उतर जाती है।

ले चलो 
वहाँ
जहाँ पहली बारिश
धरती को
उसके नाम से पुकारती है,
और मिट्टी
अपनी स्मृति में
सुगंध भर लेती है,
जहाँ आशा
हल की मूठ थामे
फिर से खड़ी हो जाती है।

ले चलो 
उस साँझ के द्वार जो देहरी पर
थकान रखवा देती है,
जहाँ स्पर्श ही भाषा है,
 शब्द
थककर चुप हो जाएँ
और चुप्पी
सबकी साझा भाषा बन जाए।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 5 जनवरी 2026 को लिंक की जाएगी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

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  2. आपकी रचना मानवीय थकान को उतारकर आत्मिक सुकून पाने की एक गहरी पुकार है, जो भावों की एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरी यात्रा है। यह केवल कहीं 'पहुँचने' की चाह नहीं है, बल्कि उस मानसिक अवस्था की खोज है जहाँ बाहरी शोर और आंतरिक द्वंद्व शांत हो जाते हैं।

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  3. Wahhh
    सूक्ष्म खयाल

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  4. स्वीकार बनकर मन में उतरना ...यूं भी आसान कहां होता है

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