मंगलवार, जनवरी 27

ख़ाली किनारे


ख़ाली किनारे
✍️ अनीता सैनी
……..
यहाँ इस
समाज नाम की
चारदीवारी में
किसी न किसी को
कुछ न कुछ बचाने का ज़िम्मा
चुपचाप सौंप दिया जाता है।

कोई घर बचाता है,
कोई बच्चों की साँसों में
अपना समय घोल देता है।

कोई रिश्तों की डोर
कसकर थामे रहता है,
तो कोई
पिता की पगड़ी।

कोई धर्म बचाता है,
कोई संस्कार।

हर कंधा
एक भारी गठरी ढोता है,
जिसे उतारने की अनुमति
उसे नहीं होती।

शायद इसलिए,
कि उतारने से पहले
उठाना सिखाया गया था।

कोई जागता है,
पर पूरा नहीं।

कोई चलता है,
पर पाँव अपने नहीं लगते।

और कोई
अपनी ही देह में
पराए मन पाले बैठा है।

वह निषेध
मिटाया नहीं गया,
काट दिया गया।

और 
कटे हुए स्थान पर
कोई खालीपन नहीं,
एक खुरदुरा किनारा रह गया।

वहीं
अर्थ बार-बार ठिठकता है,
रुक-रुक कर गिरता है।

और सच
वह बस उतना ही होता है,
जितना
किसी दूसरे की पीड़ा को
छूते हुए
उँगलियों में
थोड़ी देर ठहर जाए
उससे आगे नहीं।

यहाँ
अकेलापन भी
पूरा नहीं खुलता।

वह लड़खड़ाता हुआ आता है,
कुछ अपने पास रखता है,
कुछ अँधेरे में छोड़ देता है
शायद इसलिए
कि अँधेरा भी
किसी का अपना होता है।

पर मैं
शायद बहुत सौभाग्यशाली हूँ।

मेरे हिस्से
कुछ भी नहीं आया
न धर्म,
न समाज,
न घर,
न रिश्ता,
न परंपरा।

मुझे सिर्फ़
ख़ुद को बचाना था।


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 28 जनवरी 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
    अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।

    जवाब देंहटाएं
  2. खुद को बचाना सबसे जरूरी है
    Wahh

    जवाब देंहटाएं