गुरुवार, अगस्त 15

पर्वत-पुत्री हूँ मैं


                                               
ममतामयी प्रकृति ने                                                   
नवाज़ा स्नेह से मुझे 
पिता पर्वत ने दिया 
पत्थर-सा कठोर हृदय 
विचलित नहीं होती मैं  
कभी मन की तृष्णा से 
सुख-सुविधा से परे 
वादियों में बुनती हूँ 
सम्पूर्ण जीवन का सार।  

कलुषित चित्त की चीत्कार 
कुपित करती है मानव मन को 
सुख-सुविधा का दिखा संगसार 
मेरे आधिपत्य की करता दरकार 
औचित्य अपना गवा नादान 
पर्वत-पुत्री के वैभव की करता पुकार। 

अब उर में उमड़ते  उस के 
पुरसुकून के प्यारे बादल 
जहाँ उड़ती हूँ मैं भी 
जब होती है चाह प्रबल 
चाँद-तारों की गोद में बैठकर 
सुनती हूँ प्यारी सरगम 
जहाँ आशंका का होता न कोई  संगसार ।  



# अनीता सैनी 

2 टिप्‍पणियां: