बुधवार, सितंबर 16

यादें


विहंग दल की भाँति 
डैने फैलाए लौट आतीं हैं यादें 
वे इंसान नहीं कि 
नहीं लौटे दोबारा 
बंधनों की दहलीज़ 
लाँघ मिलतीं हैं अपनत्व से
पुकारतीं हैं 
अपनों की परछाई बन  
उन्हीं के स्वर में 
नयन गढ़ लेते हैं भावों की 
 गुँथी से जीवित छायाचित्र 
सेवा भाव का यह सागर 
हर लेता है मन की पीड़ा 
तब सुकून का सैलाब 
सवार होता है हर सांस पर 
एक वक़्त के खाने में
 उड़ेल समर्पण 
गाय,कौवे में उन्हें 
तलाशती है अंतर्चेतना   
अँजुरी में भरा पानी 
श्राद्धपक्ष में श्रद्धा के पुष्प बन 
अंतस की नमी से 
आँखों के भिगों देता है कोर
अपनों की याद में।

@अनीता सैनी'दीप्ति'

18 टिप्‍पणियां:

  1. दिल को छू देने वाली कविता। बाकि याद याद बस याद रह जाती है।

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अनुज मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  2. अति सुन्दर भाव लिए अनुपम सृजन ।

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    1. सादर आभार आदरणीय दी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 16 सितंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. सादर आभार आदरणीय सर सांध्य दैनिक पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  4. उत्तर
    1. बहुत बहुत शुक्रिया सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 17.9.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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    1. सादर आभार आदरणीय सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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  6. प्रिय अनीता, अपने पितृ पुरुषों को अत्यंत आत्मीयता से याद करते हुए बहुत ही शानदार लिखा है तुमने। कदाचित् इसीलिए हर इंसान औलाद की कामना करता है। भावनाओं से भरे मन के इस मर्मस्पर्शी सृजन के लिए क्या लिखूँ?? कितना भावपूर्ण लिखा है
    गाय,कौवे में उन्हें
    तलाशती है अंतर्चेतना
    अँजुरी में भरा पानी
    श्राद्धपक्ष में श्रद्धा के पुष्प बन
    अंतस की नमी से
    आँखों के भिगों देता है कोर
    अपनों की याद में।
    शुभकामनाओ सहित
    🌹🌹💐💐🌹🌹

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय रेणु दी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु। स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।सादर

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  7. तन्हाईयाँ नहीं होतीं तो इन यादों का क्या होता

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    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  8. एक वक़्त के खाने में
    उड़ेल समर्पण
    गाय,कौवे में उन्हें
    तलाशती है अंतर्चेतना
    अँजुरी में भरा पानी
    श्राद्धपक्ष में श्रद्धा के पुष्प बन
    अंतस की नमी से
    आँखों के भिगों देता है कोर
    अपनों की याद में।
    पूर्वजों के श्राद्ध पर श्रद्धा से लिखी बहुत ही हृदयस्पर्शी रचना...।
    वाह!!!

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    1. तहे दिल से आभार आदरणीय सुधा दी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।स्नेह आशीर्वाद बनाए रखे।
      सादर

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  9. घ्र पक्तिं दिल को छू जाती है प्रिय अनिता सुन्दर सृजन।

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    1. आभारी हूँ दी मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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