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सोमवार, दिसंबर 29

ओसरी में खड़ा गवाह


ओसरी में खड़ा गवाह
अनीता सैनी
…….
उसे दिखाई देता है
मोह का एक विशाल वृक्ष,
जिसकी जड़ों में
सदियों की आदतें
पानी की तरह
लगातार रिसती रहती हैं।

वृक्ष पर टँगा
एक टूटा, जर्जर पिंजरा,
जैसे समय ने
अपनी थकान
वहीं टाँग रखी हो।

पिंजरे के सहारे
पिंजरे से बाहर धकेली गई
एक चिड़िया,
जो हर बार
गहन भरोसे के साथ
बार-बार
वहीं आ बैठती है
कि आज भी आकाश
उससे
कुछ नहीं छीनेगा।

पिंजरे से चिड़िया का
गहरा लगाव देख
वह हँसता है।
हँसी
जो आँखों से पहले
होंठों पर आ जाती है,
जैसे
कुछ देख लेने भर से
खुद को
बचा लेना चाहता हो।

वह हँसता है
कभी चिड़िया पर,
कभी उस जर्जर, टूटे पिंजरे पर,
कभी चिड़िया की उड़ान पर
जो उड़ान कम,
बार-बार लौट आने की
एक सधी हुई कला में
बँधी हुई है।

वह विचारता है
वृक्ष की गहरी जड़ों को,
जो हर बंधन को
स्वाभाविक ठहराती हैं;
और चिड़िया के भोलेपन को,
जिसे वह
दया का नाम देता है।

वह गरबाता है
 कि
देखते-ही-देखते
उसकी दया का पात्र
और बड़ा हो जाता है।

उसे दिखता है
चिड़िया का रूप,
उसका रंग,
उसके पंखों का फैलना;
पर उसे नहीं दिखता
वह क्षण,
जब वह
आकाश को
सिर्फ़ दिशा मानकर
छोड़ देती है।

उसे नहीं दिखते
उस वृक्ष पर टँगे
हज़ारों पिंजरे
जो अब लोहे के नहीं,
आदतों के बने हैं।

वे हज़ारों चिड़ियाँ,
जो उड़ना नहीं भूलतीं,
बस
उड़ान को
ज़रूरत से ज़्यादा
सपना
मानने लगती हैं।

और वह
आज भी, अब भी,
ओसरी में खड़ा
मुस्कुराता है
और
गिनती करता है,  बिना देखे
कभी चिड़ियों की,
कभी पिंजरों की।



मंगलवार, दिसंबर 9

प्रतीक्षा एक तीर्थ


प्रतीक्षा एक तीर्थ 

✍️ अनीता सैनी

……

कोई भी साया
बस यूँ ही देवद्वार तक नहीं जाता
भटकन उसे भी
खारी लगने लगती है।
मन की मरुस्थली देह पर
जब बहुत दिनों तक
कोई रोशनी नहीं उतरती,
तभी हाथ-पैर
थकान के आगे झुकते-झुकते
प्रार्थना में फैल जाते हैं।

कोई 
सहज ही मरुस्थल नहीं बनता
आँखों के पीछे
एक अदृश्य आँधी
महीनों तक घूमती रहती है।
अन्दर कहीं
घड़ों-घड़ों रेत
चुपचाप गिरती रहती है,
और समय
अपनी ही परछाइयों को पीकर
धीरे-धीरे
सूखी नदी बन जाता है।

होनी और अनहोनी
कभी-कभी
एक ही चेहरा पहन कर सामने आती हैं
अजनबी-सा,
अपने ही अजीब खेलों में उलझा हुआ।
और इसी बीच
आँखें
दिन-रात की नींद पीकर
नमक बनकर
चुपचाप जम जाती हैं।

बड़े दिनों तक
जब कोई काग भी
मुंडेर पर नहीं आता
तो लगता है
घर के आँगन से
किसी की धड़कन
कहीं दूर कहीं खिसक गई हो।
हवा चलती है
बहुत सुरीली, बहुत अपनाई-सी,
पर उसी समय
किसी और के हाथ आया संदेश
मन को
कटार-सा चुभ जाता है।

और तभी समझ आता है
प्रतीक्षा भी एक तीर्थ है,
जहाँ हर यात्री
अपनी धूल
अपने ही कंधों पर ढोता है।


गुरुवार, दिसंबर 4

भीतर की थिरकन


भीतर की थिरकन 

✍️ अनीता सैनी

….
कभी-कभी
हवा के हल्के झोंके से
भाव
मन की भीतरी डोर कस लेते हैं
और भीतर के समंदर में
एक सूक्ष्म कंपन उठता है,
बिना शोर, बिना संकेत
जैसे चेतना के तल पर
किसी ने धीरे से
उँगली रख दी हो।

फिर
भावनाएँ
अपने ही बोझ से
धीरे-धीरे गलने लगती हैं,
और बरसात का पानी बन
सीधे आँखों तक चली आती हैं।

मन की गहराई में उठी
यह एक अदृश्य लहर
सिर्फ किनारे ही नहीं तोड़ती
पूरा भूगोल
एक पल में बदल देती है।

और तुम कहते हो
यह तो बस
नजर भर की भरभरी है।