धूल की स्मृति / अनीता सैनी
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बिजली की एक रेखा
आकाश से उतरी
और हरेपन की देह
एक ही क्षण में कोयला हो गई।
चाँद-सूरज
और हवा भी साक्षी थे,
जली हुई टहनियों पर
कभी किसी पक्षी में
अपना पाँव नहीं रखा ।
काली पड़ती छाल
वसंत ने भी
उस ओर
आँख नहीं उठाई।
बरसों बाद
एक बढ़ई आया।
उसने कालिख में
वृत्त खोज लिया।
अब वह
रास्तों की धूल में नहीं,
धूल की स्मृति में है
जहाँ
हर घुमाव
मिट्टी से मिलकर
अपना पहला हरापन
धीरे से दोहराता है।

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