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सोमवार, अगस्त 29

वीरानियों में सिमटी धरती


वीरानियों में सिमटी धरती 

चाँद, सूरज टंगा अंबर 

मरुस्थल पैर नहीं जलाता

उस पर चलनेवालों के

बच्चे नंगे पाँव दौड़ते हैं!

प्यास गला नहीं घोंटती

 पशु-पक्षियों का 

बादलों की छाँव होती है! 


न जाने क्यों पुरुष दिन-रात

सिसकते  हैं?

सूखे कुएँ-तालाबों को देखकर

मरुस्थल भी रोता हुआ 

दहाड़ मारता है!

गर्भ में सूखते शिशुओं को देख 

माताएँ भूल गई हैं सिसकना!


राजस्थान घूमने आए सैलानी

कवि-लेखक भी मुग्ध हो

कविता-कहानियाँ लिखते हैं

 पानी के मटके लातीं औरतों की

तस्वीर निकाली जाती है

मजबूरियों हृदय को छूती हैं

संवेदनाएँ ज़िंदा रहती हैं उनसे 

बरखान, धोरों में प्रेम ढूँढ़ा जाता है

दूर- दूर तक फैले टीलों को

निहारा जाता है

खंडहर बनी बावड़ियों

 गाँव और ग्रामीणों में 

सभ्य हो,

 सभ्यता तलाशी जाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, अगस्त 25

मौन से मौन तक



ऐसा नहीं है कि.

बहुत पहले पढ़ना नहीं आता था उसे 

उस वक़्त भी पढ़ती थी 

वह सब कुछ जो कोई नहीं पढ़ पाता था

 बुज़ुर्गोँ का जोड़ों से जकड़ा दर्द 

उनका बेवजह पुकारना 

समय की भीत पर आई सीलन

सीलन से बने भित्ति-चित्रों को 

पिता की ख़ामोशी में छिपे शब्द 

माँ की व्यस्तता में बहते भाव 

भाई-बहनों की अपेक्षाएँ

वर्दी के लिबास में अलगनी पर टँगा प्रेम

उस समय ज़िंदा थी वह

स्वर था उसमें 

हवा और पानी की तरह

बहुत दूर तक सुनाई देता था 

ज़िंदा हवाएँ बहुधा अखरती हैं 

परंतु तब वह प्राय: बोलती थी

गाती-गुनगुनाती

सभी को सुनाती थी

पसंद-नापसंद के क़िस्से 

 क्या सोचती है

उसकी इच्छाएँ क्या हैं?

ज़िद करती थी ख़ुद से 

रुठे सपनों को मनाने की 

अब भी पढ़ती है निस्वार्थ भाव से 

स्वतः पढ़ा जाता है

आँखें बंद करने पर भी पढ़ा जाता है

परंतु अब वह बोलती नहीं है।



@ अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, अगस्त 18

ग्रामीण औरतें


ये कागद की लुगदी से

मटके पर नहीं गढ़ी जाती

और न ही

मिट्टी के लोथड़े-सी चाक पर

चलाई जाती हैं।


माताएँ होती हैं इनकी

ये ख़ुद भी माताएँ होती हैं किसी की 

इनके भी परिवार होते हैं

परिवार की मुखिया होती हैं ये भी।


सुरक्षा की बाड़ इनके आँगन में भी होती है 

 सूरज पूर्व से पश्चिम में इनके लिए भी डूबता है

रात गोद में लेकर सुलाती  

भोर माथा चूमकर इनको भी जगाती है।


 गाती-गुनगुनाती प्रेम-विरह के गीत

पगडंडियों पर डग भरना इन्हें भी आता है 

काजल लगाकर शर्मातीं 

स्वयं की बलाएँ लेती हैं ये भी।


भावनाओं का  ज्वार इनमें भी दौड़ता है

ये भी स्वाभिमान के लिए लड़ती हैं

काया के साथ थकती सांसें 

उम्र के पड़ाव इन्हें भी सताते हैं ।


छोटी-सी झोपड़ी में 

चमेली के तेल से महकता दीपक

सपने  पूरे  होने के इंतज़ार में

 इनकी भी चौखट से झाँकता है।


सावन-भादों इनके लिए भी बरसते हैं

ये भी धरती के जैसे सजती-सँवरती हैं 

चाँद-तारों की उपमाएँ इन्हें भी दी जाती हैं 

प्रेमी होते हैं इनके भी,ये भी प्रेम में होती हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'