गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

गाजर घास / कांग्रेस घास



वे स्वतः ही पनप जाते हैं,
गंदे गलियारे मिट्टी के ढलान पर,
अधुनातन मानव-मन की बलवती,
हुई आकांक्षा की तरह 

रेगिस्तान-वन खेत-खलिहान घर-द्वार, 
मानवीय अस्तित्त्व से जुड़ी बुनियादी तहें, 
इंसानी साँसों को दूभर बनाते अगणित बीज, 
गाजर घास बन गयी है अब मानवता की खीझ

विनाश-तंज़ प्रभुत्त्व का सुप्त-बोध लिये,
  सीमाहीन विस्तार की चाह सीये,
सहज सभ्य शिष्ट जीवन नष्ट करने,
ढहाने सभ्यता की कटी-छँटी बाड़ सरीखी

प्रकृति की आत्मचेतना का करता अंकन मानव, 
समाज में खरपतवार का अतिक्रमण-सा तनाव, 
चटक-चाँदनी सुदर्शन डील-डौल से नामकरण, 
विहँसती वसुंधरा पर मँडराते ख़तरों से उत्पन्न वेदना

पथरीले पथ पर असाढ़ की भभक लिये,
विकृत शुद्ध पवन है परिवेश में आच्छादित, 
बेचैन मानवता पलायन करते मानव मूल्य,
अन्तःस्मित,अन्तःसंयत का सोखता भाव। 

©अनीता सैनी 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

बरगद की आपातकालीन सभा



प्रदूषण के प्रचंड प्रकोप से ,  
दम तोड़ता देख धरा का धैर्य,  
 बरगद ने आपातकालिन सभा में,  
 आह्वान नीम-पीपल का किया। 

 ससम्मान सत्कार का ग़लीचा बिछा, 
बुज़ुर्ग बरगद ने दिया आसन प्रभाव का,  
विनम्र भाव से रखा तर्क अपना, 
बिखर रही क्यों शक्ति तुम्हारी,   
मानव को क्यों प्रकृति से अलगाव हुआ। 
  
मानव अलगाव की  करुण-कथा, 
 ज़ुबाँ से जताते व्यथा नीम-पीपल, 
 कटु-सत्य संग धर अधरों पर शब्दों को, 
पीले पत्तों-सा पतन मानव का दिखा रहे। 
  
शीशे की दीवारें शीतल हवा का स्वाँग, 
धन-दौलत को सुख जीवन का बता,  
प्रकृति से विमुख कृत्रिमता को पनाह, 
मानव कैमिकल का स्वाद चख़ रहा। 

 चिंतापरक गहन विषय पर्यावरण, 
अहं का भार बढ़ा मानव हृदय पर, 
लापरवाही गरल बोध दर्शाती, 
सजा का हो प्रवधान,  
वृक्षों की सभा में आवाज़ यह उठी। 

मन मस्तिष्क हुआ कुपोषित मानव का ,  
तन को सबक़ सिखायेगा प्रदूषण, 
प्रत्येक अंग में कीट बहुतेरे, 
आवंतों के सुझाव की प्रतीक्षा करे धरा। 

©अनीता सैनी 

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

पन्ना धाय के आँसू



पन्ना धाय तुम्हारे आँसुओं से भीगे,
 खुरदरे मोटे इतिहास के पन्ने, 
जिनमें सीलन मिलती है आज भी,
कर्तव्यनिष्ठा राष्ट्रप्रेम की


उदय सिंह क़िले के ठीक पीछे,
 झील में झिलमिलाता प्रतिबिम्ब त्याग का,
ओस की बूँदों-सा झरता वात्सल्य भाव,
पवन के झोंको संग फैलाती महक ममता की

ज़िक्र मिलता है ममत्व में सिमटी, 
तुम्हारे भीगे आँचल की मौन कोर का,  
 पुत्र की लोमहर्षक करुण-कथा का,  
  लोकगाथा  तुम्हारे अपूर्व बलिदान की

चित्तौड़ के क़िले की ऊँची सूनी दीवारों में,
गूँजता तुम्हारा कोमल कारुणिक रुदन,
 सिसकियों में बेटे चंदन की बहती पीड़ा,
 दिलाती याद अनूठे स्वामिभक्ति की

उनींदे स्वप्न में सतायी होगी याद,  
तुम्हें बेटे की किलकारी की,  
काटी होगी गहरी काली रात, 
तुमने अपने ही भाव दासत्व की

पराग-सा मधुमय फलता-फूलता,  
खिलखिलाते  महकते  उदयपुर संग,  
धाय माँ के दूध की ऋणी बन इतराती आज भी,    
अजर-अमर अजब दास्ताँ क़ुर्बानी की

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

सत्य क़ैद क्यों है?


तुम जूझ रहे हो स्वयं से, 
या उलझे हो,
भ्रम के मकड़जाल में,    
सात्विक अस्तित्त्व के,   
कठोर धरातल पर बैठे हो,  
या इंसान की देह पर, 
ज़िंदा लाश की तरह, 
यों ही लदे हो, 
या ढो रहे हो स्वयं को,
मर रही मानवता पर 
क्योंकि तुम सत्य हो
चेहरा अपना छिपाये हो, 
या बार-बार दम तोड़ते,
यथार्थ का सामर्थ्य हो, 
तलाशते हो पहचान,  
क्योंकि तुम सत्य हो
कभी रौंदे जाते हो,
रहस्य की तरह,  
अनगिनत अनचीह्नी, 
उठती आवाज़ो से, 
 किये जाते हो प्रभावहीन, 
असामयिक खोखले,
 उसूलों की अरदास पर,   
 चिल्ला नहीं सकते,
झूठ की तरह तुम, 
क्योंकि तुम स्वयं में,
पूर्णता का एहसास हो, 
फैल नहीं सकते,
 फ़रेब की तरह, 
क्योंकि तुम सत्य हो
 सूर्य की अनंत आभा की तरह

© अनीता सैनी 

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

प्रफुल्लित पदचाप



सोलह बसंत बीते,
 बाँधे चंचलता का साथ,   
आज सुनी ख़ुशियों की, 
प्रफुल्लित पदचाप,  
घर-आँगन में बिखरी यादें,  
महकाती बसंत बयार, 
 छौना मेरा यौवन की, 
दहलीज़ छूने को तैयार 

गगन में फैली चाँदनी-सा,
 शुभ्रतामय यश की लीये बहार, 
भानु-रश्मियों-सी कांति,
सुकून से सँवारे आँचल मेरा हर बार,
 काँटों भरा हो कठिन पथ, 
 दुआओं का मखमली साया मेरा,
दुलराएगा तुम्हें हिम्मत की,
मधुर निर्झर-सी रागिनी सुनाकर, 
स्नेह की बरसाये बरखा बहार 

तपोमय ज्योतिपुंज-सी रोशन,
 हो जीवन की राहें तुम्हारी चहुं ओर,
हृदय में प्यार का सागर ले हिलोरें, 
शिकायत को तरसे जग सारा, 
देश, समाज,परिवार,ममत्त्व मेरा, 
तुम्हारी ओर उम्मीदों का,
 स्वप्निल सुन्दर सँजोते है संसार, 
दामन भरना खुशयों से यही रखना आधार।

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

पंखुड़ी-सा स्मृति-वृंद



परिमल महक,पंखुड़ी-सा स्मृति-वृंद, 
चहुं-दिशि हरित-छटाएँ फैलाती है,  
 खनकती पायल-सी अंतरमन में, 
गूँजती हृदय में भँवरे की गुँजार है। 

नयनों पर मायाविनी-सी रचती, 
कुछ पल सपनों का संसार है, 
लताओं के कुँज में छिपी, 
अहर्निश प्रतीक्षा बारंबार है। 

नीरव-सा नीरस एकांत,  
दर्शाती आयरिस आँखों की,  
सूनेपन की उमड़ी दारुण कथा, 
खारे पानी का बहता बहाव है, 
व्यंग्य भाव से झूलती झूला, 
 कहती यही जीवन की बहार है।

मरु-से मन में फिरती मरीचि-सी, 
 विहगावली-सा डोलता सुन्दर संसार है, 
सूने आँगन में लहरायी बल्लरियों-सी, 
गुज़रते समय ने किया उपहास है, 
लौकिक वेदना का मरहम गोद प्रकृति की, 
मूक व्यथा का बिखरा मुक्ता-हार है

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

हाइकु


1.
अर्द्ध यामिनी~
जुगनू की आभा से
चमके धरा । 

2.
रुदन स्वर~
पति की फोटो पास
बैठी विधवा । 

3.
ज्येष्ठ मध्याह्न~
खेत मध्य ठूंठ पे
किशोरी शव।

4.
कुहासा भोर~
चूल्हा लीपे माटी से
रसोई में माँ।

5.
शीतल नीर ~
वृक्ष की छाँव तले
हिरण झुण्ड । 

6.
चौथ का चाँद ~
  हाथ में पूजा थाल
नवल वधू । 

7.
उत्तरायण ~
माँझे में उलझें है
पक्षी के पँजे । 

8.
उत्तरायण ~
पक्षियों के पँजे से
 लहू की बूँदें । 

9.
कुहासा भोर ~
सैनिक वेश धरे
नन्हें बालक।

10.
पूस की रात~
खलिहान में जागे
वृद्ध किसान । 

11.
रात्रि प्रहर~
सूनी राह तकती
द्वार पे वृद्धा । 

12.
मेघ गर्जन  ~
दीपक की लौ बीच
पतंगा शव । 

13
ठण्डी बयार ~
अमिया डाल पर
झूलती गोरी । 

14.
ठण्डी बयार ~
चौपाल के बीच में
हुक्के का धुँआ । 

15.
 संध्या लालिमा ~
गाय झुण्ड में गूँजा
घंटी का स्वर । 

16
 संध्या लालिमा ~
ग्वाले की गोद में
नन्हा बछड़ा 

17
 पौष मध्याह्न~
मंगौड़ा की सुगंध
पाकशाला से। 

18.
कुहासा भोर -
मयूर नृत्य देखे 
नन्हीं बालिका। 

19.
सघन वन-
लपटों के बीच में
कंगारू दल।

20.
कुहासा भोर~
पतंग-मांझा संग
छत पे बच्चे। 

21.
जेठ मध्याह्न~
गन्ना गट्ठर लादे
पीठ पे नारी। 

22.
मिट्टी की गंध ~
हल्की बरसात में 
छलका आँसू। 

© अनीता सैनी 

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

भूख का वह भीषण दौर



जिस शाम छूटी थीं तुम्हारी अँगुलियाँ मेरे हाथ से, 
समय-प्रवाह में तलाश रही थी मैं हाथ तुम्हारा, 
रोयी थी पूनम की चाँदनी तब चाँद गवाह बना था,  
 बदली थी  सूरज ने अपनी जगह तुम देख रहे थे, 
वह पश्चिम में दिखा था। 

भूख का चल रहा वह भीषण दौर भयावह था,
चीख़ती आवाज़ें अंतरमन की अकेलेपन के नुकीले दाँत, 
वसंत में फूटती मटमैली-सी मन की अभिलाषा, 
 मैं जीवन का सारा सब्र चबा चुकी थी। 

सबसे पहले चबायी थी मैंने अपनी ज़ुबाँ, 
ग़मों के साथ ग़ुस्सा निगला,धीरे-धीरे नाख़ून कुतरे,
बीच-बीच में गटके थे आँसू के घूँट भी, 
निगाह झुकाये तब मैं नोंच रही थी तन को अपने, 
मैं पूर्णतया अब स्वयं के लिये स्वयं पर आश्रित। 

हृदय पर किये थे मैंने आघात याद हैं  मुझे, 
तिल-तिल तड़पा चबाया था अंत में मैंने उसे, 
पाप-पुण्य का लेखा-जोखा भी हुआ था उस दरमियाँ,    
नितांत व्यक्तिगत रही थी यह हिंसा मेरी । 

जब मैं अश्रुओं से भिगो चबा रही थी हृदय अपना, 
तुम दूर क्षितिज की सीमा पर खड़े देख रहे थे मुझे, 
 जता रहे थे लाचारी न टोक रहे थे न रोक रहे थे, 
 यादों की बहती धारा थी वह, 
नदी के तटों-सा जीवन बना था तब हमारा। 

© अनीता सैनी 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

समझ ग़ुलाम क्यों है?



सागर की लोल लहर,सन्नाटे की गूँज,  
छाती की छोटी-सी सिहरन बन दौड़ी,  
रचा समय ने इतिहास,द्वेष की हवा क्यों है? 
जनवादी-युग में प्रकृति पर प्रहार, 
तय विनाश का सफ़र क्यों है?  
सीपी-सी मासूम धड़कनों का पतन,  
मानवता बुर्क़े में चेहरा छिपाये क्यों है? 

प्रत्यवलोकन कर मानव यथार्थ का,  
प्रत्यभिमुख अस्तित्त्व से अपने क्यों है?  
खींप,आक कह बाँधी बाड़ एकता की,  
हनन जीवन-निधि का यह कैसा तांडव रचा है,  
बड़प्पन के मुखौटे पर लेवल समझदारी का,  
कैसा अवास्तविक आवरण हवा में गढ़ा, 
स्वार्थ-निस्वार्थ समझ की चुप्पी का 
लेता हिलोरें क्यों है 

 बढ़ा धरा पर घास-फूस का हाहाकार,  
झिझक घटी,बढ़ीं विकृतियाँ बदहवास वासना कीं,  
हरी पत्तियाँ रौंद,सूखे डंठल से हुँकार,  
कँटीली झाड़ियों का बसाया कैसा परिवेश है?  
मंदिर-मस्जिद के गुंबद के पीछे डूबते एक,
 चाँद-सूरज का करता बँटवारा इंसान, 
 अनेकता में एकता का धुँधला पड़ता स्नेह,
शब्दों का मुहताज बन समझ ग़ुलाम क्यों है? 

©अनीता सैनी  

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

दिलों में बहती शीतल हवा मैं...हवा हूँ...



 विपदा में बैठी उस माँ की फ़िक्र हूँ, 
महक ममता की लहू में बहूँ  मैं, 
बेचैन बाबुल के दिल की दुआ हूँ, 
यादों में झलकता नयन-नीर  हूँ मैं,
 दिलों में बहती शीतल हवा मैं...हवा हूँ...

भाई से बिछड़ी बहन की राखी मैं, 
स्नेह-बंधन में बँधी नाज़ुक कड़ी हूँ, 
बचपन खिला वह आँगन की मिट्टी मैं, 
गरिमा पिया-घर की बन के सजी हूँ, 
दिलों में बहती शीतल हवा मैं...हवा हूँ...

प्रीत में व्याकुल मन की सदा हूँ,
 ख़ुशी की लहर विरह की तपिश मैं,
सावन-झड़ी में मिट्टी की ख़ुशबू हूँ,
रिश्तों में झलके वो ओझल कला मैं,
 दिलों में बहती शीतल हवा मैं...हवा हूँ...

 ग्वाले के गीतों में गाँव की शोभा हूँ,
प्रगति में ढलती रौनक शहर की मैं,
पतझड़ में उड़ती शुष्क पवन हूँ,
 सुकूँ का हूँ झोंका तपन रेत की मैं,
 दिलों में बहती शीतल हवा मैं...हवा हूँ...

थाल पूजा का कर-कमल की मौली हूँ, 
कलश-शीश सजी दूब-रोली मैं, 
चाँद निहारते चातक-सी आकुल हूँ
पावस ऋतु में सतरंगी आभा मैं,
दिलों में बहती शीतल हवा मैं... हवा हूँ...

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 28 जनवरी 2020

पावन बयार बन बही



थार की धूल में,
 पावन बयार बन बही,  
अभिमंत्रित अविरल, 
अभिसंचित थी जग में,  
महकी कुडकी की, 
मोहक मिट्टी में, 
कान्हा-प्रेम के प्रसून-सी, 
प्रीत के पालने में पली थी वह। 


झील के निर्झर किनारे पर, 
गूँज भक्ति की,    
अंतरमन को कचोटती, 
व्याकुल कथा-सी थी वह । 

 जेठ की दोपहरी,
लू के थपेड़ों में ढलती,   
खेजड़ी की छाँव को,
तलाशती तपिश थी वह । 

सूर्यास्त के इंतज़ार में, 
जलती धरा-सी,  
क्षितिज के उस पार, 
आलोकित लालिमा-सी थी वह। 

अकल्पित अयाचित,
उत्ताल लहर बन लहरायी, 
 मेवाड़ के चप्पे-चप्पे में,
चिर-काल तक चलती, 
हवाओं में गूँजती,
 प्रेमल साहित्यिक सदा थी वह। 

 जग के सटे लिलारों पर लिखी,
प्रेम की अमर कहानी,   
उदासी, वेदना, करुणा की,
एकांत संगिनी थी वह । 

करती निस्पंद पीटती लीक, 
पगडंडियाँ-सी ,  
प्रीत की पतवार से खेती नैया,
  लेकर आयी मर्म-पुकार,  
रौबीले रेतीले तूफ़ान में, 
स्पंदित आनंदित हो ढली,  
वैसी शीतल अनल-शिखा-सी, 
ज़माने में फिर न उठी न दिखी थी वह।  

   © अनीता सैनी  
 

रविवार, 26 जनवरी 2020

चौपाल में हुक़्क़े संग धुँआ में उठतीं बातें

                                         
                                  
बेचैनी में लिपटी-सी स्वयं को सबला कहती हैं,  
वे आधिपत्य की चाह में व्याकुल-व्याकुल रहती हैं, 
सुख-चैन गँवा घर का राहत की बातेंकर,  
वे प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में दौड़ा करती हैं। 

शिक्षित हो या अशिक्षित वाक शक्ति में श्रेष्ठ स्वयं को कह
 ख़ुद-ग़र्ज़ी की हुँकार भर शेरनी-सी दहाड़ा करतीं हैं,  
कमनीय काया का कोहराम मचाती जग में, 
कर्मों की दुहायी दे स्वयं को पल-पल छला करती हैं। 

सजग समझदार तर्कशील कहतीं ख़ुद को, 
वे अहर्निश जुगाली द्वेष की करती हैं, 
 मोह ममता छूटी मन से प्रीत की तलब में, 
वे परिभाषा सुख की नित नई गढ़ा करतीं हैं। 

इच्छाओं के पँख फैलाकर उड़ान सपनों की भरा करतीं हैं, 
वे बना स्वार्थ को  साथी स्वयं को छला करतीं हैं,   
स्वयं-सुख को धारण कर परिवार से विमुख हो, 
 दासी क्रोध की बन क़दमों से जीवन कुचला करतीं  हैं। 

घर-बाहर वे दौड़ लगातीं कँधे से कँधा मिलाकर चलतीं,  
सहतीं रहतीं जीवनपर्यन्त जीवन को उनके युग छला करते हैं,
हाल हुआ क्या नारी के नारीत्व का ठहाके लगा बातों की उलझन,
हुक़्क़े संग चौपाल में पुरुषार्थ को साध धुँआ में खोला करते हैं। 

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 23 जनवरी 2020

गणतन्त्र दिवस पर मिट्टी हिंद की सहर्ष बोल उठी



मिट्टी हिंद की सहर्ष जय गणतन्त्र बोल उठी है 
मिटी नहीं कहानी आज़ादी के मतवालों की, 
बन पड़ी फिर ठण्डी रेत पर उनकी कई परछाइयाँ, 
   आज़ादी के लिये जिन्होनें साँसें अपनी गँवायीं थीं
कुछ प्रतिबिम्ब दौड़े पानी की सतह पर आये,
कुछ तैर न पाये तलहटी में समाये,
कुछ यादें ज़ेहन में सोयीं थीं कुछ रोयीं थीं, 
 कुछ रुठी हुई पीड़ा में अपनी खोयीं थीं, 
मिट्टी हिंद की सहर्ष  बोल उठी, 
मिटी नहीं कहानी वे छायाएँ-मिट पायी थीं। 

बँटवारे का दर्द भूलकर,
कुछ लिये हाथों में तिरंगा दौड़ रही थीं, 
अधिराज्य से पूर्ण स्वराज का, 
सुन्दर स्वप्न नम नयनों में सजोये थीं,
नीरव निश्छल तारे टूटे पूत-से,
टूटी कड़ी अन्तहीन दासता के आँचल की थीं,
लिखी लहू से आज़ादी की
 संघर्ष से उपजी वीरों की लिखी कहानी थी, 
मिट्टी हिंद की सहर्ष  बोल उठी, 
मिटी नहीं कहानी वे छायाएँ-मिट पायी थी। 

बहकी हवा फिर बोल रही,
बालू की झील में शाँत-सी एक लहर उठी,
नव निर्माण के नवीन ढेर निर्मितकर,
उत्साह जनमानस के हृदय में घोल रही, 
एकता अखंडता सद्भाव के सूत्र, 
पिरोतीं विकास की अनंत  आशाएँ थीं, 
धरती नभ समंदर से चन्द्रभानु भी कहता है, 
लिख रहा हर भारतवासी, 
ख़ून-पसीने से गणतन्त्र की नई इबारत है, 
मिट्टी हिंद की सहर्ष  बोल उठी है, 
मिटी नहीं कहानी वे छायाएँ-मिट पायी थी। 

©अनीता सैनी  

मंगलवार, 21 जनवरी 2020

आस है अभी भी


लड़खड़ाते हौसलों में हिम्मत, 
दूब-सा दक्ष धैर्य धरा पर है अभी भी, 
कोहरे में डूबी दरकती दिशाएँ,  
नयनों में उजले स्वप्न सजोते हैं अभी भी, 
रक्त सने बोल बिखेरते हैं  हृदय पर, 
जीने की ललक तिलमिलाती है अभी भी । 

कश्मकश की कश्ती में सवार,  
तमन्नाओं की अनंत कतारें हैं अभी भी,  
बिखरी गुलाबी आँचल में, 
 सुंदर सुमन अलसाई पाँखें हैं अभी भी, 
सुरमई सिंदूरी साँझ में, 
विहग-वृन्द को मिलन की चाह शेष है अभी भी । 

घात-प्रतिघात शीर्ष पर, 
इंसानीयत दिलों में धड़कती है अभी भी,  
नयनों के झरते खारे पानी में , 
दर्द को सुकून मिलता है अभी भी,  
उम्मीदों के हसीं चमन में फूलों को 
 बहार आने की अथक आस है अभी भी । 
© अनीता सैनी 

रविवार, 19 जनवरी 2020

मैंने देखा है तुम्हें



 मैंने देखा ता-उम्र तुम्हें, 
   ज़िंदा है इंसानीयत तुममें आज भी, 
तुम निडर साहसी और बहादुर हो,  
इतने बहादुर कि जूझते हो स्वयं से ,   
तलाशते हो हर मोड़ पर प्रेम। 

 महसूस किया है तुम्हारे नाज़ुक दिल को मैंने 
अनगिनत बार छलनी होते हुए, 
 समाज के अनुरुप हृदय को ढालते,  
जतन पर जतन सजाते,  
स्वयं की सार्थकता जताते हुए। 

तुम्हारे कन्धों में सामर्थ्य है, 

सार्थक समाज के सृजन का, 
ऊबना भयावह सच की देख तस्वीर, 
तुम चलना मानवता के पथ पर, 
अपना कारवाँ बढ़ाते हुए। 

स्वार्थसिद्धि के उड़ते परिंदे हैं परिवेश में,  
तुम्हें विवेक अपना जगाना होगा, 
न पहनो मायूसी का जामा, 
रोपने होंगे तुम्हें बीज ख़ुशहाली के,  
दबे-कुचलों को राहत का मरहम लगाते हुए। 

©अनीता सैनी 


शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

बर्फ़-सी पिघलती है पिपासा



वाक़िया एक रोज़ का... 
सँकरी गलियों से गुज़रता साया,
छद्म मक़सद के साथ था, 
कुछ देखकर अनायास ठिठक गया। 

राम के नाम पर विचरते  राहू-केतू,

आज नक़ाब चेहरे का उतर गया,
है अमर ज्योति गणतंत्र की वहाँ, 
दबे पाँव दहशत का अँधेरा उस राह पर छा गया। 

स्वतंत्रता की उजली धूप में मानुष, 
अँगूठा अपना दाँव पर लगा  रहा,  
पसार दिया अपना हाथ मैंने भी,
  उन्मादी मस्तिष्क नजात दर्द से पा गया। 

 कतार का हिस्सा बन झाँकती जहां में,

 उसी कतार से नाम अपना मिटा रही, 
बदलेगी दुनिया आत्ममंथन के बाद,  
नये चेहरों को कतार का मुखिया बना रही।  

बर्फ़-सी पिघलती है पिपासा मेरे मन में,
 कलकल बहती झरने-सी साँसों में, 
भरी अँजुरी से झरती देख भविष्य को, 
 पैरों से लिपट सार्थकता अँगूठे की बता रही। 

ज़िंदा हूँ मैं ज़िन्दगी मुझसे पूछती, 

ख़ामोशी में चेतना बन वह साया विहरता, 
पसारा था हाथ अवसाद में बनी आत्मवंचना
रोम-रोम उस मोड़ पर सिहरता रहा।  

©अनीता सैनी 

बुधवार, 15 जनवरी 2020

सफ़ेदपोशी



वे सजगता की सीढ़ी से, 
 क़ामयाबी के पायदान को पारकर,  
अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से, 
सुख का आयाम शोषण को बताने लगे। 

सुन्न हो रहे दिल-ओ-दिमाग़,   

दर्द में देख मानव को मानव अट्टहास करता, 
सूख रहा हरसिंगार-सा हृदय, 
पारस की चाह में स्वयं पत्थर-से बनने लगे। 

मूक-बधिर बनी सब साँसें, 

 सफ़ेदपोशी नींव पूँजीवाद की रखने लगी,  
आँखों में झोंकते सुन्दर भविष्य की धूल, 
अर्जुन-वृक्ष-सा होगा परिवेश स्वप्न समाज को दिखाने लगे। 

आत्मता में अंधे बन अहं में डूबते, 

 ख़ामोशी से देते बढ़ावा निर्ममता को , 
आत्मकेन्द्रित ऊषा की चंचल अरुणावली से, 
जग का आधार सींचने लगे। 

सौंदर्यबोध के सिकुड़ रहे हों  पैमाने,  

दूसरों का भी हड़पा जा रहा हो आसमां,  
तब खुलने देना विवेक के द्वार, 
ताकि पुरसुकून की साँस मानवता लेने लगे। 

© अनीता सैनी 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

जिजीविषा की नूतन इबारत



अविज्ञात मलिन आशाओं को समेटकर, 
अनर्गल प्रलापों से परे,  
विसंगतियों के चक्रव्यूह तोड़कर, 
जिजीविषा की नूतन इबारत, 
मूल्यों को संचित कर वह लिखना चाहती है। 

भोर में तन्मयत्ता से बिखेरती पराग, 

विभास से उदास अधूरी कल्पना छिपाती, 
सुने-अनसुने शब्दों को चुन प्रसून महकाती, 
नुकीले कंटकों को सहते हुए वह मुस्कुराना चाहती है। 

कोहरे का कौतुहल मुठ्ठी में छिपा हिलमिल, 

प्रीत गीत गाती ग़लीचे में धूप को बातों में उलझाती,   
शबनम की उलझन मख़मली घास से सुन,  
नेह को निथार कर वह  सँवरना चाहती है। 

ज़िंदगी की झूलती डाल को धीर मन से थामे 
व्याकुल हृदय मुख पर आच्छादित भावशून्यता का 
अधीर आवरण गढ़े 
सुगढ़ अर्थवान शब्दों  की परवाज़ लिये, 
जतन की आवाज़ बन वह जीना चाहती है। 

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

मन भीतर यही आस पले



मन भीतर यही आस पले,  
प्रणय की आँधी चले, 
  थार के दिनमान जगे,   
मन संलग्नता से,  
विधि का आह्वान करे,  
अनल का प्रकोप रुठे,  
प्रकृति ज़िंदा न जले,  
सघन वन पर नीर बहा, 
गगन हरी देह धरा की करे। 

धूल भरी घनी काँटों से सनी, 
 गहरी शाब्दिक चोट,  
वेदना की टीसों के स्थान, 
तन्मयता से परस्पर, 
उनींदे प्रेम के निश्छल,  
पुरवाई के झोंकों से भरे।  

तुषार-सी शीतल निर्मल, 
वाक-शक्ति मरुस्थल की,  
ऊँघती संध्या-लालिमा-सी, 
अधमींची आँखों पर ठहरे, 
क्षुद्रता का अभिशाप हर, 
पलकों का बन सुन्दर स्वप्न,  
नन्हीं झपकी की गठरी बने, 
जीवन जीव का फूलों-सा, 
हृदय सरिता-सा झरे। 

©अनीता सैनी 


बुधवार, 8 जनवरी 2020

आदमी इंसान बनना चाहता



अदब से आदमी,आदमी होने का ओहदा, 
आदमीयत की अदायगी आदमी से  करता,  
आदमी इंसानियत का लबादा पहन,  
स्वार्थ के अंगोछे में लिपटा इंसान बनना चाहता। 

सूर्य के तेज़-सी आभा मुख मंडल पर सजा,  

ज्ञान की धारा का प्रारब्धकर्ता कहलाता,  
सृष्टि का लाडला सृष्टि को तबाह करने को उतारु,  
बुद्धि की समझ से आधुनिकता का पाठ पढ़ाता। 

जीवन मूल्यों की नई पहचान गढ़ता, 
स्वाभिमान के रुप में हथियार अहंकार का रखता,   
 रोबोट बनने की चाह में स्वयं को हैवान बन गँवाता,  
दुनिया को तबाही का भयावह मंज़र दिखाना चाहता। 

 ©अनीता सैनी