गुरुवार, 4 जून 2020

अभिनय



आसमानी पंडाल से सजा था 
अनुकरण का वह भव्य रंगमंच। 
 अभिनय की सार्थकता दर्शाने में
 व्यस्त था जीवन। 

 कभी ताकता स्वयं को 
कभी जाँचता अभिनय को। 
धमनियों में उफनता जुनून
 किरदार करना था जीवंत। 

हर कोई हर किसी के निभाए 
अभिनीत किरदार को नकारता। 
समर्थकों के समर्थन से था
 आकलन जीवंत अभिनय का। 

 टूटने-बिखरने का हक नहीं था 
उनमें  से किसी किरदार को। 
टूटने-बिखरने वाले की सांसें 
छीन लीं जातीं या लील जाता अभिनय। 

 कलाकार कलाकारी में मुग्ध रहते 
और देह पत्थर रुप में ढलती गई। 
 सूखती संवेदना पथराई आँखें 
वह जीवन नहीं अभिनय था। 

मैं भी अभिनय के उस दौर में 
धूप से तपा पाषाण बनती गई। 
संताप न वेदना न साथ अश्रुओं  का 
ज़ेहन में एक विचार अभिनय था। 

© अनीता सैनी  'दीप्ति'


मंगलवार, 2 जून 2020

कुछ पंछी



तारों भरी रात शीतल आकाश में कुछ पंछी
 डैने सिकोड़े निकले हैं उन्मुक्त उड़ान पर। 
नींद में ऊँघता है जब पृथ्वी का कण-कण 
तब गंत्तव्य में ढूँढ़ते हैं अनुत्तरित प्रश्न । 

अरण्य में खोजते सांस बिला जीवन 
दंश में साहस बटोरते अमल विनय से। 
धैर्य का पुष्प खिलाते अर्द्धयामिनी में 
उम्मीद बाँध पैरों पर चलते इत्मिनान से। 

मुग्ध हैं चाँदनी बिखेरते चाँद को देख  
तुहिन-कणों से प्राप्त प्रेम के कण बीनकर। 
अंतस से फूटते करुण स्वर हैं गूँजते  
भारमुक्त हो संज्ञा में तिरते पाहन के। 

अँधियारी रात बिछड़ते कुछ साथी 
कुछ ज़ख़्मी हो लौटते उड़ान भरने को।  
हवा की स्वरबंदी धरा से अथाह स्नेह 
झींगुरों की आवाज़ में ठहरे वे सुस्ताने को। 

© अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 30 मई 2020

शलभ नहीं, न ही जलती बाती बनना



शलभ नहीं, न ही जलती बाती बनना 
 वे प्रज्जवलित दीप बनना चाहते हैं। 
 अँधियारी गलियों को मिटाने का दम भरते 
 चौखट का उजाला दस्तूर से बुझाना चाहते हैं।  

मरु में राह की लकीर खींच आँधी बुलाते  
कंधों पर लादे ग़ुरुर सहानुभूति थमाना चाहते हैं। 
मिटने की नहीं मिटाने की तत्परता से 
क्रांति का बिगुल क्रान्तिकारी बन बजाना चाहते हैं।  

जगना नहीं जग को जगाने  की प्रवृत्ति लिए 
बुद्धि की कतार में नाम दर्ज करवाना चाहते हैं।  
द्वेष घोलते परिवेश में शब्दों के महानायक 
प्रीत की  नई परिभाषा गढ़ना चाहते हैं।  

लम में महत्त्वाकांक्षा की मसी का उफान 
 विश्व का उद्धार एक पल में लिखना चाहते हैं।  
अतीत को पलटते ग़लतियाँ समझाते सबल 
वर्तमान को कुचलते भविष्य को नोचना चाहते हैं।  

© अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 28 मई 2020

इंसानीयत हूँ

अनुसरण से आचरण में ढली 

इंसान में एकनिष्ठ  सदभाव हूँ। 
दग्धचित्त पर शीतल बौछार  
सरिता-सा प्रवाह इंसानीयत हूँ। 

निराधार नहीं अस्तित्त्व में लीन 
पुण्यात्मा  से बँधी करुणा हूँ। 
मधुर शब्द नहीं कर्म में समाहित 
नैनों से झलकता स्नेह अपार हूँ। 

शून्य सहचर अमरता वरदान 
मूक-बधिर भाव में झँकृत हूँ। 
साध सुगंध  सुंदर जीवन मैं 
 चेतना मानव की लिप्त आश्रय हूँ। 

सृष्टि में विद्यमान समंजित मर्मज्ञ 
जन-जीव के हृदय में निराकार हूँ। 
अंतःस्थ में विराजित एकाकी मौन 
जीवन पल्लवित सुख का आधार हूँ।

© अनीता सैनी  'दीप्ति'

बुधवार, 27 मई 2020

ये जो घर हैं न फिर मिलते हैं सफ़र में



ये जो घर हैं न फिर मिलते हैं सफ़र में
यों भ्रम में बुने सपने भी पथिक
कभी-कभी सूखे में हरे होते हैं।
परिग्रह के पात-सा झरता पुण्य
 पत्ते बन फिर पल्ल्वित होता है।
अनजाने पथ पर
अनजाने साथी भी  सच्चे होते हैं।

राहगीर राह  की दूरी भाँपना
यात्रा सांसों की अति मधुर होती है।
नीलांबर में डोलते बादल के टुकड़े
 दुपहरी में राहत की छाँव देते हैं।
पर्वत से बहता नदियों का निर्मल जल
धूप से धुले पारदर्शी पत्थर
 बेचैन मन को भी शीतल ठाँव देते हैं।

ऊषा उत्साह का पावन पुष्प गढ़ती है
प्राची में  प्रेम का तारा चमकता है।
अंशुमाली-सा साथ होता है अहर्निश
दुआ बरसती है तब शौर्य दमकता है।
तुम इत्मीनान से चलना पथिक
ये जो घर हैं न फिर मिलते हैं सफ़र में
यों भ्रम में बुने सपने भी
 कभी-कभी सूखे में हरे होते हैं।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 24 मई 2020

अधमरे अख़बार के पलटे पन्ने, उठते तूफ़ान की नहीं कोई ख़बर...



आज सुबह अधमरे अख़बार के पलटती पन्ने,
 उठते तूफ़ान की नहीं कोई ख़बर।  
शहर की ख़ामोशी में चारों ओर शांति ही शांति 
नहीं कोहराम का कोई कोंधता आलाप।  

एक माँ चीख़ी...
 बच्चे की थी करुण पुकार 
जग ने कहा -
माँ-बेटे की पीड़ा का विलाप! नहीं नियति पर ज़ोर। 
पूछ-पूछ पता घरों का, देगा दस्तक यह तूफ़ान 
बाक़ी मग्न झूमो जीवन में सुख का थामे छोर।  

दीन-दुनिया से बेख़बर व्यस्तता की 
महीन चादर ओढ़े  दौड़ रहे सब ओर। 
सूरज बरसाता चिलचिलाती धूप पृथ्वी पर 
हवा भी मंद-मंद झूम रही एक ओर। 

बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न कहो 
उमसाए सन्नाटे ने बाँधी ज़ुबाँ की डोर। 
अंतस में उमड़े सैलाब को न कहो तूफ़ान  
पत्ते गिरे होंगे पेड़ों से! भ्रम ने थामी होगी डोर। 

©अनीता सैनी'दीप्ति'

शुक्रवार, 22 मई 2020

श्रमजीवी श्रम धावक


कुछ परछाइयाँ मायूस हुईं !
कुछ शीश टिकाए बैठीं घुटनों पर 
कुछ बौराई-सी नम आँखों से 
पथरीले पथ पर टहल रहीं।  

 घने अंधियारे में तितर-बितर 
कुछ दौड़ जीवन की लगा रहीं। 
पथराई आँखों से 
कुछ ज़िंदगी जग में ढूँढ़ रहीं। 

टहल-क़दमी की नहीं आवाज़ 
प्रत्यक्ष नहीं परछाई किसकी 
कैसी कौन रहीं वो? 
सदियों से नहीं ढोई  हृदय ने 
ऐसी पीड़ा ढो रहीं वह।  
व्यथित मन की व्याकुलता 
बहुतेरी सांसों पर डोल रहीं।  

क्रमबद्ध  संयम  संभाले 
बढ़ाती क़दम बारंबार। 
बेबस बेसहारा मजबूर नहीं 
यही बोल रही वो। 
नेता, राजनेता, अभिनेता-सा 
अभिनय नहीं 
श्रमजीवी श्रम धावक श्वेद संग 
बतियाती वो। 

निगलना चाहता उन्मुख काल 
लिए धूप-पानी का वार 
असहाय होने का नहीं गढ़ती 
फिर भी सुंदर स्वाँग वो। 
सामर्थ्य सहेजे सद्भावना 
फलीभूत भुजाओं में  
माणस निवाले से नहीं भरती 
 जीवन उड़ान वो। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 21 मई 2020

काल की रेत पर मूर्छित हैं पदचाप


सुदूर दिश में दौड़ता अबोध छौना
बादल-सी भरता भोली कुलाँच। 
तपती धूप ने किया है कोई फ़रेब या 
उमसाए सन्नाटे ने लगाई है आँच। 

मरुस्थल पर  हवा ने बिखेरे हैं धोरे 
 काल की रेत पर मूर्छित हैं पदचाप।
गर्दन घुमा देखता बकरियों का समूह
गूँजता गड़रिये का व्याकुल आलाप।

आँधी से उड़ती धूल देख अचकचाए  
पीड़ा पी रहे बालू  के महीन कण-कण।  
बेबस पर यों हुक्म सब्र का बाँध न बना
वेदना के सैलाब में डूबा हुआ है जनगण। 

  संदेह के आत्मघाती तीर तरकश में छोड़
मृगमरीचका-सा भ्रम जाल न बना। 
संयम संतोष सहेज राह में पल के पथिक
तरसती आँखों को यों बदरी न बना।

© अनीता सैनी 

शनिवार, 16 मई 2020

नवीन किसलय मुरझाए बंधु



कंधों पर सुकून का अँगोछा 
मग्न आज किस लय में बंधु।  
तरुवर पथ की  सूखी शाख़ 
नवीन किसलय मुरझाए बंधु। 

असहाय की छलकती पीड़ा 
 पेट की भूख आँखों से टपकी। 
संवेदनहीन पूंजीभूत पराग  
अनल-सी जलती देह सारथी। 
समझ पड़ाव सब भाप बने 
कहाँ निशा पुण्य प्रभात बंधु। 

शोभा श्री समन्वय जनगण से 
करुणा की बरसा बौछार। 
मजबूर मज़दूर पुर को दौड़े 
माली थमा पुष्प का एक हार। 
मणि-मनके खनि की शोहरत 
भावुक मन जगा अनुराग बंधु। 

अचरज से छलक उठी निगाहें 
परिमलमय पारिजात पर। 
इंगित अंतस के अश्रुकर 
तरु-शाख़ा पर किसलय सूखे। 
हृदय की पीड़ा फूटी सड़क पर 
बदल न लिबास बारंबार बंधु। 

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 14 मई 2020

क्षितिज पर नहीं



उदय-अस्त की नियमित क्रीड़ा 
दृश्य निर्मम यथार्थ का।  
झुलसे पत्थर उजड़ी सड़क 
दृश्य प्रज्वलित दोपहरी का।  

देह मानव की भाप बनी 
निशान नहीं पदचाप का। 
खोजी श्वान का स्वाँग गढ़ा  
भ्रमित परपीड़ा संताप की। 

 काल निर्वहन दिवाकर का 
सृष्टि में व्याप्त व्यवधान का। 
दिशाहीन बिखरे जन-जीवन  
दृश्य शोकाकुल शोक दोपहरी का। 

खींप-आक सब सूख रहे 
दौर दयनीय दुनिया का।  
लंबी-चौड़ी विचारपट्टिका 
उकेरे चित्र कलिकाल का। 

सूर्य निकला क्षितिज पर नहीं 
सत्ता-शक्ति के बाज़ार का।  
उड़नखटोला उतरा भारत में 
नहीं समय शोहरत के बखान का।  

©अनीता सैनी 

बुधवार, 13 मई 2020

ऊसर हो चुकी संवेदना



इंसान  इंसान के लिबास में 
तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमते रहेंगे।  
वे युधिष्ठिर-सा अभिनय 
शकुनी-से पासे फेंकेंगे। 

ऊसर हो चुकी संवेदना 
स्मृतियों में यातना भोगेगी। 
क्रोध जलाएगा  अस्थियाँ 
विज्ञान उपचार तलाशेगा। 

वे आधिपत्य की उड़ान से 
गिद्द रुप में प्रहार करेंगे।  
करतब से कोयला बिखेरेंगे। 
इंसान की देह पैरों तले कुचलेंगे। 

स्वार्थ के कल्मष की चीख़ से सूर्य 
अंधकार में छिप जाएगा।  
 नीरव स्मृति हृदय पर गुँजाती 
 गलियारे से दौड़ती आएगी। 

©अनीता सैनी 

सोमवार, 11 मई 2020

एक चिड़िया की व्यथा



उसकी पीड़ा को
जब भी सहलाया मैंने
आँखों में साहस को और 
बलवती पाया मैंने। 

निर्मल पौधा क्षमादान का
 संजीदगी से सींचती आयी।  
छिपा रहस्य इंसानियत का
संवेदना से निखरा पाया।  

स्थूल जिव्हा मर्मान्तक की
शब्दजाल का न प्रभाव गढ़ा
पूछ रहा प्रिये पीड़ा मन की 
प्रीत जता वाकया नैनों में गढ़ा। 

पलकों से पोंछती अश्रु अपने
ज़ख़्मों ने राह कहीं और बनायी।  
एक चिड़िया ने यह व्यथा बतायी।  
आहट न सांसों को हो पायी। 

©अनीता सैनी  'दीप्ति'

रविवार, 10 मई 2020

माँ...कभी धूप कभी छांव



माँ...
 उजली धूप बनी जीवन में,
कभी बनी शीतल छांव, 
पथिक की मंज़िल बनी,
कभी पैरों की बनी ठांव 
माँ... 
भूखे की रोटी बन सहलाती,
 बेघर को मिला गंतव्य गांव, 
माँ तुम हृदय में रहती हो मेरे,
हो प्रेरक प्रेरणा की ठंडी छांव
माँ... 
संवेदना बन हृदय में समायी 
मिला वात्सल्य रुप निराकार,
हो सतरंगी फूलों की बहार, 
 अंतरमन में करुणा का भंडार 
माँ... 
नैनों से लुढ़कते चिर-परिचित,
मन के मनकों की हो बौछार,
तिमिर में हो प्रज्ज्वलित दीप,
माँ तुम सांसों का हो उद्गार
माँ..
तुम हो साहस की सौगात,
 चिरजीवन का साया बनी हर बार 
तुम्हारे अंतस में छिपी हूँ मैं,
 बन करुणा का कोमल किरदार।

© अनीता सैनी 'दीप्ति' 

शनिवार, 9 मई 2020

वह गुलमोहर


तुम्हें मालूम है ? 
तपिश सहता हुआ वह गुलमोहर,
आज भी ख़ामोश निगाहों से,  
अहर्निश तुम्हारी राह ताकता रहता है।  
जलती जेठ की दोपहरी में भी, 
लाल,नारंगी,पीली बरसता सतरंगी धूप, 
वह मंद-मंद मुस्कुराता रहता है।  
झरती सांसें जीवन की उसकी,  
सुकून की छतनारी छाया बनती ,  
वह छाया तुम्हें  पुकारती बहुत है। 

सहसा तुम्हारे आने की दस्तक से, 
उसने बदल लिया है लिबास अपना, 
अलमस्त झूलती-झूमती डालियों पर, 
पंछियों के फैले डैनों को सहलाता,  
हवा के हल्के झोंके से बिखेर रंग,  
 धूप के रंगीन  छींटे से मन मोह लेता है,  
 जलती सड़क नभ की बेचैनी  को देता, 
  ख़ुबसूरत कागज़ के फूलों-सा उपहार,  
इंतज़ार में वह तुम्हें याद करता बहुत है।  

दरमियाँ हैं दूरियाँ उसके तुम्हारे बीच, 
एहसास दिल से भुलाते क्यों नहीं, 
सन्नाटे से पूछो ख़ैरियरत उसकी, 
 शब्दों को शब्दों पर लुटाते क्यों नहीं,
दिल में गहरी है बेचैनी तुम्हारे,
दर्द समय का भुलाते क्यों नहीं, 
 खिड़कियों से झाँकता हुआ वह, 
पगडंडियों पर जीवन न्योछावरकर, 
वह बेज़ुबान अश्रु बहाता बहुत है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 6 मई 2020

संजीदगी संग प्रश्न


तहजीब के मन्वंतर में,
भ्राँतिक अभिनय जग का खेल,   
अंधेरे में बंद ज़िंदगियाँ है,  
 समय-दीपक में नहीं है तेल। 

दबे पैरों की आहट थी  वो,  
रहस्य की ध्वनि है  मौन,  
भविष्य के गर्भ में छिपे चेहरे,  
वे तिलिस्मी लुटेरे कौन? 

निस्तब्ध मटमैले जलाशय  में,
अनचीह्नी झाँकती है आकृति,
ललाट पर बिखरी सलवटें,
नुकीले दाँत,अहं-दंश की है आवृत्ति।

हल्की काली पट्टी नैनों पर,
अवचेतन का है सारा खेल,
शून्य बिंदु-सा है गलियारा,
सत्य रथ की बुझी है मशाल।

संजीदगी संग प्रश्न अनुत्तरित,
रिसते निरंकुशता के गहरे घाव, 
उन्मुख अंबर को है ताकता,  
दीप्ति-दृग,सौम्य मुख प्रादुर्भाव।


©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 2 मई 2020

शोहरत रत्नजड़ित मुखौटा



नैनों के झरोखे से झरती ज़िंदगियाँ, 
नहीं देख सकती लवणता में डूबी सांसें, 
वे स्वार्थ का लबादा ओढ़े पीड़ा पहुँचाते हैं, 
नहीं छिपा सकती अपनी संवेदना  को। 

वे सांत्वना देते हुए बारंबार तोड़ते हैं,  
 हार के एहसास की माला से जोड़ते हैं,  
 वे चुभते हैं इंसान की इंसानीयत को,  
 नहीं भुला सकती उनकी वेदना को। 

सुसभ्य संस्कारों के पतन का आकलन, 
 लालसाओं की दस्तक करती  विस्तार,
 हुनर की संज्ञा पर छलावे के प्रभुत्त्व का भार, 
 नहीं देख सकती मनीषा की आत्मवंचना को। 

आसान होगा सफ़र सांसों का जहां में,  
शोहरत का रत्नजड़ित मुखौटा पहनने से, 
प्रवचन में गूँथी वाकचातुर्यता यथार्थ को झुठलाती, 
नहीं देख सकती कर्म की अवेहलना को। 

© अनीता सैनी 'दीप्ति' 

शुक्रवार, 1 मई 2020

मिली थी उस मनस्वी से



मिट्टी के मटके-सी, 
जीवन चाक पर रखा करती, 
समय की अगन से,
 सद्भावना-सी निखरा करती, 
साँझ  ढले तारों से,
ढेरों बातें किया करती, 
 संयम संजीदगी की, 
 अर्धांगिनी बन नित संवरा करती। 

जेष्ठ महीने की,
 मध्य दोपहरी में टूटी टाटियों के,
छप्पर को बँधा करती,
सहती चिलचिलाती तेज धूप,
निर्मम लू के,
 थपेड़ों से देह अपनी सेका करती। 

पति न परिवार, 
न समाज का था संबल,
कुलटा नाम,
 पाकर बेवा शहीद की हर्षाई,
एक बार मिली थी
 उस सबला मनस्वी से,
 अंतस में,
 आशीष का सागर भर लायी। 

शब्दों का पंडाल,
 घटनाओं का लिए बैठी थी रेला,
आँगन के एक कोने में, 
मुद्दतों से लाचारी ढो रहा था ठेला,
पेट में छिपी भूख के, 
अनकहे अनगिनत नागफ़नी-सी,
 ज़िंदगी के थे कई अनुत्तरित प्रश्न !

©अनीता सैनी  'दीप्ति'

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

इस दौर के दोहरे प्रहार


मैंने अपने ही आचार विचारों को,  
सत्य संदर्भ के साथ जोड़ दिया,  
इस दौर के दोहरे-तिहरे प्रहार ने,   
अशेष मानवता को निचोड़ लिया। 

गौण गरिमा बरकरार उनकी रहे, 
उक्ति से समय पर संवार लिया,  
सवेदंनाओं की तपन से तपता मन,  
मुँह खोलने पर धिक्कार दिया। 

हुनरमंदों के बिखरे हुए हैं हुनर,   
देख खेतिहर एक पल रो दिया,  
सफ़ेदपोशी तय करेगी क़ीमत देख, 
अश्रुओं ने पीड़ा को ही धो दिया। 

स्वप्नसुंदरी भविष्य की बल्लरी को, 
आत्मीयता से सींचो और बढ़ने दो, 
खोल दो हृदय से चतुराई की गाँठ, 
गाड़ दो बल्ली रस्सी का सहारा दो। 

©अनीता सैनी 

रविवार, 26 अप्रैल 2020

उम्मीद का थामे हाथ किताबें



 राह जीवन की सुलभ बनातीं,  
सद्बुद्धि का आधार किताबें,  
गहन निराशा में गमन करातीं,   
उम्मीद का थामे हाथ किताबें। 

क्रूर दानव को मानव बनातीं, 
चेतन मन का शृंगार किताबें, 
मधुर शब्दों का मोहक संगम, 
सुधी पर शीतल बौछार किताबें।   

करतीं प्रज्ज्वलित ज्ञान-दीप,  
भ्रम का तोड़ें जंजाल किताबें, 
तर्क-वितर्क की मनसा समझें, 
स्वप्न करतीं साकार किताबें। 

जीवन मूल्यों से अंतस भरती,
 नियति का बोध करातीं किताबें,
नवाँकुर को वृक्ष रुप में गढ़ती,
प्रारब्ध को सुगम बनातीं किताबें। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

झील किनारे



 निर्मल शीतल जल झील का,  
ठिठुरकर सुनाता करुण कथा, 
  झरोखों से झाँकती परछाइयाँ, 
पलकों में भरती दीप-सी व्यथा। 

अकाल के दौर में बनाया महल,  
नींव में दबाए पेट की भूख  
 शौर्यगाथा अश्वमेध-यज्ञ की सुन,   
आतुर राजा संग परिवेश हर्षाया। 

वैराग्य में सिमटी सजी मनोदशा,  
एकांत में सुनाती सरोवर संवाद 
तलहटी से उठती करुण पुकार 
अंतस से करती वाद-विवाद । 

झील किनारे प्रतीक्षारत परछाई, 
  किरदार गढ़ने को व्याकुल हर पल,  
सौंदर्यबोध दर्शाती ख़ामोश दीवारें, 
राजसी भव्यता में डूबा जलमहल । 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

सुघड़ आमुख दानी कौन?



 पीड़ा और प्रीत को जीते,
पन्नों में बिखरे किरदार, 
  अनुभूति में सिमटे शब्द,
  तूलिका से निखरे हर बार। 

खंडित सत्य का स्वरुप,
  पहने शब्दों का लिबास, 
 किताबनुमा अँगोछे में,
अनगढ़ प्रेम का विश्वास। 

साँचे में ढले समाज को,
अंकित करता कंपित मौन,
 अंतरदृष्टि  में घुटता धुआँ,
सुघड़ आमुख दानी कौन? 

©अनीता सैनी  'दीप्ति'

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

प्रेम का दौंगरा था वह



हवा के एक हल्के,
 झोंके संग, 
गगन में उमड़े घने, 
मेघ थे वे, 
छलकी थी निश्छल,
 विवश बूँदें,   
कब कहा मैंने तुम्हारी,
याद थी वह। 

तपते मरुस्थल पर,
 बिखरी थी,  
तुम्हारी स्मृतियों की,
 गठरी थी वह, 
कुछ मुस्कुरायी कुछ, 
 पथराई-सी थीं वे,    
तपन के हाथ में पड़े, 
समय के छाले थे वे। 

माँज रहा था समय,
 दुःख भरे नयनों को,
स्वयं को न माँज पाई, 
एक पल की पीड़ा थी वह,
कल्याण का अंकुर,
उगा था उरभूमि पर,
बिखेर तमन्नाओं का पुँज,
हृदय पर लगी ठेस,
प्रीत ने फैलाया प्रेम का,
दौंगरा था वह।

©अनीता सैनी 

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

विचलित है जर्जर बूढ़ा नीम



 ढो रहा है उम्र को ढलते पडाव पर,
विश्व-पटल पर बदलते हालात पर,
ज़िंदगी के दिये अप्रत्याशित अनुभव पर, 
 आकलन की भयावह तस्वीर पर, 
विचलित है जर्जर बूढ़ा नीम, 
   उम्र के ढलते पडाव पर। 

परस्पर अकारण हो रही मुठभेड़ से,
महामारी के वक़्त हो रही राजनीति से, 
पुलिस पर हो रहे पथराव से, 
डॉक्टरों-नर्सों की शहादत से, 
 छोड़ रहा है जड़े जर्जर बूढ़ा नीम, 
उम्र के ढलते पडाव पर।  

अमेरिका इटली की दयनीय हालत पर,
अपने ही देशवासियों की नासमझी पर,
आरोप-प्रत्यारोप के इस क्रूर संग्राम पर,
ऐसे वक़्त पैसे बटोरती परछाइयों पर,  
अस्तित्त्व दरकिनार किए जाने पर,
 बहा रहा है अश्रु जर्जर बूढ़ा नीम, 
 उम्र के ढलते पडाव पर।   

नीम की गुणवत्ता न समझ पाने पर, 
अपने आप पर होते सीधे प्रहार पर, 
कोरोना-काल में अपनों की बेरुख़ी पर, 
रुक-रुककर चलती हवा में सांसों पर, 
ता-उम्र लुटाई ज़िंदगी से कुछ प्रेम के , 
  माँग रहा है मीठे बोल जर्जर बूढ़ा नीम, 
उम्र के ढलते पडाव पर।   

©अनीता सैनी 

शनिवार, 18 अप्रैल 2020

मरुस्थल में सीपी