बुधवार, 25 मार्च 2020

साँसें पूछ रहीं हाल प्रिये

मूरत मन की  पूछ रही है, 
नयनों से लख-लख प्रश्न प्रिये,
 जीवन तुझपर वार दिया है,
साँसें पूछ रहीं हाल प्रिये। 

समय निगोड़ा हार न माने,
पुरवाई उड़ती उलझन में,
पल-पल पूछूँ हाल उसे मैं,
नटखट उलझाता रुनझुन में
कुशल संदेश पात पर लिख दो,
चंचल चित्त अति व्याकुल प्रिये।। 

भाव रिक्त कहता मन जोगी,  
नितांत शून्य आंसू शृंगार,
भाव की माला गूँथे स्वप्न,
चेतन में बिखरे बारबार,
अवचेतन सँग गूँथ रहीं हूँ, 
कैसा जीवन जंजाल प्रिये।।

सीमाहीन क्षितिज-सी साँसें,
तिनका-तिनका सौंप रही हूँ,
आकुल उड़ान चाह मिलन की,
भाव-शृंखला भूल रही हूँ,
सुध बुद्ध भूली प्रिय राधिका, 
कैसी समय की ये चाल प्रिये।।

© अनीता सैनी

मंगलवार, 24 मार्च 2020

महावन

महावन में दौड़ते देखे, 
अनगिनत 
जाति-धर्म और,
मैं-मेरे के
 अस्तित्त्वविहीन तरु, 
सरोवर के 
किनारे सहमी,
 खड़ी मैं सुनती रही, 
निर्बोध 
बालिका की तरह, 
उनकी चीख़ें। 

आख़िर ठिठककर, 
 बैठ ही गयी,
अर्जुन वृक्ष के नीचे मैं भी,
देख रही थी ख़ामोशी से,
शहीद-दिवस पर, 
शहीदों का कारवाँ,  
सुन रही थी, 
पति-पिता को पुकारतीं, 
उनकी चीख़ें।  

देख-सुन रही थी 
ढँग जीने का,
बुद्धिमान वृक्षों की, 
बुद्धिमानी का,
भविष्य से बेख़बर, 
सींचते हैं 
सभ्य-सुसंस्कृत महावृक्ष  
 नक्सली नाम की, 
कँटीली झाड़ियाँ,
उन झाड़ियों में उलझे दामन,
उनकी चीख़ें। 

© अनीता सैनी 

रविवार, 22 मार्च 2020

गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न


गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न, 
प्रीत अवनी पर है अवदात ।
कज्जल कुँज में झूलता जीवन,  
समय सागर की है  सौगात।। 

 लहराती है नभ में पहन दुकूल ,
शीतल बयार संग प्रीत पली ।
उमड़ी धरा पर सुधी मानव की ,
खिला नव-अँकुर धरणी चली ।

छिपे तम में  मन के सुंदर भाव 
चाहता है एकाकी बरसात ।
गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न, 
प्रीत अवनी पर है अवदात ।

करुणामयी  अनुराग हृदय भरा ,
पूनम  चाँदनी मधुर पराग झरा ।
अनंत अंबर खोजे चित्त चैन, 
झरते तारे का प्रतिबिंब ठहरा ।

समय सागर पर ठिठुरी छाया, 
जीवन प्रलय है झँझावत ।
गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न, 
प्रीत अवनी पर है अवदात ।

© अनीता सैनी 

शनिवार, 21 मार्च 2020

दुर्लभ साँसें



धड़कन है जो धड़कती रहती है,
संग  साँसें भी चलतीं रहतीं हैं, 
थामें दिल का हाथ, हाथों में,
आँखें भी हँसती-रोतीं रहती हैं। 

सृष्टि में बिखरीं हैं अनंत अविरल साँसें,
धरती-जल-अंबर के आनन पर देखो,
कहीं लहरायी बल्लरियों-सी कहीं, 
अनुभूति में उलझी टूटे तारों-सी साँसें। 

वेंटिलेटर पर संघर्ष करतीं देखीं, 
जीवनदायिनी गणित साँसें, 
जीवन का अर्थ बतातीं समझाती, 
संसार की असारता का करतीं हैं,
बखान दुर्लभ साँसें। 

©अनीता सैनी 

बुधवार, 18 मार्च 2020

नितांत शून्य में खोजूँ... नवगीत



मौन नितांत शून्य में खोजूँ ,
प्रिया प्रीत अनुगामी-सी, 
झरते नयन हृदय में सिहरन, 
मधुर स्पंदन निष्कामी-सी।  

तुहिन कणों से स्वप्न सजाए,
मृदुल कंपन मन का गान,  
शीतल झोंके का उच्छवास, 
ठहर हृदय ताने वितान। 

अंतर निहित प्रीत पथ मेरा,
फिरी देश बंजारण-सी, 
मौन नितांत शून्य में खोजूँ, 
प्रिया प्रीत अनुगामी-सी। 

तिमिर घिरे हैं दीप जलाऊँ, 
विरह आग मन जल जाता, 
श्याम दरश मै  प्रति दिन चाहुं,
नयन अश्रु भर भर आता। 

चरण रहूँ मैं बन कुमोदिनी, 
प्रतिनिश्वास यामिनी-सी, 
मौन नितांत शून्य में खोजूँ,
प्रिया प्रीत अनुगामी-सी। 

©अनीता सैनी

मंगलवार, 17 मार्च 2020

ढलती साँझ... नवगीत



ढलती साँझ मुस्कुरायी, 
थामे कुँजों की डार, 
थका पथिक लौटा द्वारे,  
 गूँजे दिशा मल्हार।  

पाखी प्रणय प्रीत राही,  
शीतल पवन के साथ, 
मुग्ध लय में झूमा अंबर,  
थामे निशा का हाथ,  
चंचल लहर चातकी-सी,  
दौड़ी भानु के द्वार, 
ढलती साँझ मुस्कुरायी,  
थामे कुँजों की डार। 

पूछ रहे हैं  पत्थर-पर्वत,  
ऊँघते स्वप्न की रात, 
सूनी सरित पर ठिठककर,  
सहमी हृदय की बात,  
अनमनी भोर में बैठी, 
पहने मौन का हार,  
ढलती साँझ मुस्कुरायी,  
थामे कुँजों की डार। 

मूक स्मृति हिय बैठी,  
वेदना अमिट छांव,  
समय सरिता संग ढूँडूं,  
अदृश्य कवित के पांव,  
काँपते किसलय खिल उठे,   
मिला बसंती दुलार,  
ढलती साँझ मुस्कुरायी, 
थामे कुँजों की डार। 

©अनीता सैनी 

रविवार, 8 मार्च 2020

बेसुध धरा पर पड़ी है दिल्ली... नवगीत

कुछ रंग अबीर का प्रीत से,
मानव मानव पर मलते  हैं, 
बेसुध धरा पर पड़ी दिल्ली, 
मिलकर बंधुत्व  उठाते  हैं

सोनजही की बाड़,बाँधकर, 
किसलय क़समों-वादों की ।
नीर बहा दे नयनों  से कुछ, 
बिछुड़ी निर्मल यादों की

बहका मन बेटों  के उसका, 
कहकर फूल थमातें हैं ।
बेसुध धरा पर पड़ी दिल्ली,  
मिलकर बंधुत्व उठाते हैं ।

नाज़ुक दौर दर्द असहनीय, 
मरहम मधु वाणी का दे ।
जली देह अपनों के हाथों, 
कंबल मानवता का दे

अहंकार गरल बोध मन का,
अंतर द्वेष मिटाते हैं ।
बेसुध धरा पर पड़ी दिल्ली, 
मिलकर बंधुत्त्व उठाते हैं।

कुछ रंग अबीर का प्रीत से,
मानव मानव पर मलते  हैं, 
बेसुध धरा पर पड़ी दिल्ली, 
मिलकर बंधुत्व  उठाते  हैं

© अनीता सैनी

शनिवार, 7 मार्च 2020

अकेली औरतें



अकेली औरतें अकेली कहाँ होती हैं,  
घिरी होती हैं वे ज़िम्मेदारियों से, 
गिरती-उठती स्वयं ही सँजोती हैं आत्मबल,   
भूल जाती हैं तीज-त्योहार पर संवरना। 

सूखे चेहरे पर पथरायी आँखों से, 
दे रही होती हैं वे अनगिनत प्रश्नों के उत्तर, 
वर्जनाओं के नाम पर मनाही होती है उन्हें, 
खिलखिलाकर हँसते हुए करना ख़ुशी का इज़हार। 

अकेली औरतें दौड़ती रहती हैं ता-उम्र अकेली ही,  
क्योंकि समाज को नज़र नहीं आते उनमें मृदुल संस्कार, 
फिर भी ओढ़े रहतीं  हैं वे ख़ुद्दारी की महीन चादर, 
सीखती हैं एक नया सबक़ ख़ुद को करने सुढृढ़। 

अन्य औरतें इतराती हुईं  सुनाती हैं ,  
इन्हें पति-परिवार के अनगिनत क़िस्से-कहानियाँ, 
अनायास उभर आता इनका भी प्रेम, 
परंतु पीड़ा छिपाने में होती है इन्हें महारत हासिल। 

अकेली औरतें सहारा देती  हैं अपने ही जैसी, 
अनगिनत अकेली औरतों को, 
तब अकेली औरतें अकेली कहाँ होतीं  हैं, 
वे  बीनने लगती हैं अपने ही जैसी औरतों के दुःख-दर्द। 

समाज की हेयदृष्टि के सहती है तीखे तीर, 
संयम से सह समझकर मानती उसे वक़्त की तासीर, 
वे इन्हें जमा करती हैं दिल के तहख़ाने में,  
और तह-दर-तह उठती सतह पर खड़े हो, 
मन ही मन मुस्कराते हुए कहती हैं नहीं वह मज़बूर। 

अकेली औरतें अकेली कहाँ होती हैं,  
घिरी होती हैं वे ज़िम्मेदारियों से, 
गिरती-उठती स्वयं ही सँजोती हैं आत्मबल,   
भूल जाती हैं तीज-त्योहार पर संवरना। 

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 5 मार्च 2020

मिट्टी-सी निरीह


मैंने देखा है, 
 तुम्हारा अनुमोदन, 
न जाने क्यों,  
अनदेखा कर दिया,  
 आवृत्ति असीम आग्रह तुम्हारा,   
ठुकराती रही मैं क्योंकि,   
निरीह थी तुम आँगन में मेरे, 
 इतिहास के पन्नों को, 
 टटोलते हुए,  
 देखा है तुम्हें मैंने, 
तुम आज भी वहीं थीं, 
 मनु काल के वही,  
फुँफकारते साँप, 
डंक मारते बिच्छू,  
बदचलनी की, 
वही ज़हरीली हवा, 
पल-पल पड़ते, 
 कुलटा,बाज़ारु नाम के,  
 वही नुकीले पत्थर, 
 तुम्हें मिट्टी-सी, 
 निरीह मानते हैं  वे, 
तुम्हारा सब्र नहीं टूटता? 
 वह मुस्कुराते हुए बोली- 
अभिमानी ईह में,  
स्वयं को रौंदता है, 
और मैं उसे,  
क्योंकि मैं निरीह हूँ। 

©अनीता सैनी 

 निरीह = इच्छारहित, विरक्त
 ईह = तृष्णा / इच्छा  करना 



मंगलवार, 3 मार्च 2020

सुख स्वप्न हमारा... नवगीत


 मुक्त पवन का बहता झोंका,  
 कुछ पल का बने सहारा है, 
 निर्मल नीर चाँद की छाया,
ऐसा सुख स्वप्न हमारा है। 

समय सरित बन के बह जाता, 
 रहस्यमयी लहरों में कौन, 
शून्यकाल की सीमा  बैठा,
नीरव पुलिन मर्मान्तक मौन। 

 गहन निशा में जुगनू आभा,
 थाह तम साथी सहारा है,
निर्मल नीर चाँद की छाया,
ऐसा सुख स्वप्न हमारा है। 

धुंध की धूमिल आभा में, 
बांधे बँधन प्रेम विश्वास , 
सहृदय दीप वर्ति साँसों में,
प्रीत ज्योति की अमर है आस। 

तरणि तट मिट्टी के घरौंदे,
सजन बस तेरा सहारा है,
निर्मल नीर चाँद की छाया,
ऐसा सुख स्वप्न हमारा है

©अनीता सैनी 

रविवार, 1 मार्च 2020

सजा कैसा बाज़ार है?



उमड़ा जग में तांडव तम का, 
मानवता शर्मसार है, 
इंसा-इंसा को निगल रहा, 
सजा कैसा बाज़ार है? 

 होड़ कैसी बढ़ी उन्नति की,  
अवनति का शृंगार है, 
सुख वैभव स्वार्थ सिद्धि को,  
 गढ़ता जतन बारंबार है

अगुआओं के दिवास्वप्न का, 
जनता उठाती भार है, 
इंसा-इंसा को निगल रहा,  
सजा कैसा बाज़ार है? 

लूट-पाट का दौर दयनीय, 
मचा जग में हाहाकार है,  
अनपढ़ हाथों में खेल रहे, 
पसरा अत्याचार है

त्याग-तपस्या भूले उनकी,  
जीवन जिनका उपकार है,  
इंसा-इंसा को निगल रहा, 
सजा कैसा बाज़ार है? 

©अनीता सैनी 

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

आशा के सुन्दर सुमन हैं नागफनी के



  

नितांत निर्जन नीरस 
सूखे अनमने 
विचार शून्य परिवेश में 
पनप जाती है वह भी,  
जीवन की तपिश
 सहते हुए भी,  
मुस्कुरा उठती है वह, 
महक जाते हैं 
देह पर उसके भी,  
आशा के सुन्दर सुमन,  
स्नेह सानिध्य की, 
नमी से,  
रहती है वह भी सराबोर,  
मरु की धूल-धूसरित आँधी में, 
अनायास ही, 
 खिलखिला उठती है वह भी, 
अपने भीतर समेटे, 
 अथाह मानवीय मूल्यों-सा, 
 सघन सैलाब,  
वह भी 
बाँधती है शीतल पवन को,  
सौगंध अनुबंध के बँधन में,  
विश्वास का ग़ुबार, 
 लू की उलाहना, 
जड़ों को करती है और गहरी, 
जीवन जीने की ललक में,  
 पनप जाते है उनके भी अनचाहे, 
 कँटीले काँटे कोमल देह पर

©अनीता सैनी 

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

चीर तिमिर की छाती.... नवगीत



चीर तिमिर की छाती को अब,  
सूरज उगने वाला है, 
हार मान क्यों बैठा राही,
 तम के बाद उजाला है

दूर नहीं है मंज़िल राही,
कुछ डग का खेल निराला है,
ढल जायेगी बोझिल रात्रि,
कर्म नश्वर नूतन उजाला है

बंजर में कुसुम कुमोद खिला, 
धरा ने संबल संभाला है,  
चीर तिमिर की छाती को अब,  
सूरज उगने वाला है

अंकुर प्रेम के हो पल्लवित, 
सृष्टि का करुण उजाला है, 
शरद चाँदनी हो आँगन में,
समय अनुराग निराला है

नमी बंधुत्त्व की हो मन में,
हृदय स्वप्न  गूँथी  माला है, 
चीर तिमिर की छाती को अब,  
सूरज उगने वाला है

©अनीता सैनी 

टूटे पंखों से लिख दूँ मैं... नवगीत


टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।
पीर परायी धंरु हृदय पर,
छंद बहे रस की सरिता।

मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,
पूछ पवन संदेश बहे।
प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,
भानु-तपिश जो देख रहे,
जनमानस की हृदय वेदना,
अहं झूलती सृजन कहे।

पथ ईशान सारथी लिख दूँ,
उषा कलरव की सुनीता।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

पात-पात पर यथार्थ लिख दूँ,
सृष्टि-अश्रु बनकर बहती।
लेख विनाश लिखूँ तांडव पर,
मानस की करुणा कहती, 
उद्धार पतित पथ का लिख दूँ, 
भाव-विभाव जहाँ रहती।

बाल-बोध मन सुरभित लिख दूँ,
मिट्टी की गंध अनीता ।
टूटे पंखों से लिख दूँ मैं,
बना लेखनी वह कविता।

©अनीता सैनी 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

बीज रोप दे बंजर में... नवगीत



बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यों कोई होश नहीं खोता,
अंशुमाली-सी ज्योति मन की,  
क्यों पीड़ा पथ में तू बोता।

मधुर भाव बहता जीवन में,
प्रीत प्रसून फिर नहीं झरता,
विरह वेदना लिखे लेखनी,
यों पाखी प्रेम नहीं मरता।

नभ-नूर बिछुड़ी तारिकाएँ, 
 व्याकुल होकर पुष्कर रोता, 
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यों कोई होश नहीं खोता।

कर्म कसौटी बाँध कमर से,
यों पथिक मक़ाम नहीं तकता,
पात-पात पर सजा समर्पण,
पारिजात क्षिति पर है खिलता।

कोमल भाव महक फूलों-सी,
मानव जीवन में  है  जोता, 
बीज रोप दे बंजर में कुछ,
यों कोई होश नहीं खोता।

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

वर्तमान हूँ मैं


शून्य नभ से झाँकते तारों की पीड़ा,
मूक स्मृतियों में सिसकता खंडहर हूँ मैं, 
हिंद-हृदय सजाता अश्रुमाला आज, 
आलोक जगत में धधकते प्राण,
चुप्पी साधे बिखरता वर्तमान हूँ मैं

कलुषित सौंदर्य,नहीं विचार सापेक्ष,
जटिलताओं में झूलता भावबोध हूँ मैं,
उत्थान की अभिलाषा अवनति की ग्लानि,
कल का अदृश्य वज्र मैं, मैं ज्वलित हूँ, 
एक पल ठहर प्रस्थान जलता वर्तमान हूँ मैं

अवसान की दुर्भावनाएँ व्याप्त अकर्मण्डयता, 
मृत्यु को प्राप्त मूल्य,क्षुद्रता ढोता अभिशाप मैं, 
अमरता का मान गढ़ने पुरुष मर्त्य बना आज, 
अनिमेष देखता अद्वैत लीन मैं,चिरध्यान में मैं, 
विमुख-उन्मुख तल्लीनता उठता वर्तमान हूँ मैं

©अनीता सैनी 

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

मेहंदी के मोहक पात



 शुभ्र-लालिमा को लपेटे देह से, 
भटकते दिन का ढलता पहर, 
महताब संग बढ़ते पदचाप, 
 देख जीवन में हर्षायी साँझ


शरद चाँदनी से उजले हाथों में, 
मेहंदी के मोहक उठाये पात , 
पुलकित हृदय से इठलायी, 
हर्षित फ़ज़ा से झूमी साँझ

कमल-पँखुड़ियों से कोमल, 
प्रीत रंग के महावर में डूबे पाँव, 
दहलीज़ पर उतर हुई उल्लासित,  
नयन अश्रु से धो मुस्कुरायी साँझ

©अनीता सैनी 

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

गाजर घास / कांग्रेस घास


वे स्वतः ही पनप पल्लवित हो जाते हैं,

गंदे गलियारे मिट्टी के ढलान पर,

अधुनातन मानव-मन की बलवती हुई,  

अनंत अनवरत आकांक्षा की तरह ।


रेगिस्तान-वन खेत-खलिहान घर-द्वार, 

मानवीय अस्तित्त्व से जुड़ी बुनियादी तहें, 

इंसानी साँसों को दूभर बनाते अगणित बीज, 

गाजर घास बन गयी है अब मानवता की खीझ।


विनाश-तंज़ प्रभुत्त्व का सुप्त-बोध लिये,

  सीमाहीन विस्तार की चपल चाह सीये,

सहज सभ्य शिष्ट जीवन की गरिमा नष्ट करने,

ढहाने सभ्यता की कटी-छँटी बाड़ सरीखी।


प्रकृति की आत्मचेतना का करता अंकन मानव, 

समाज में खरपतवार का अतिक्रमण-सा तनाव, 

चटक-चाँदनी सुदर्शन डील-डौल से नामकरण, 

विहँसती वसुंधरा पर मँडराते ख़तरों से उत्पन्न वेदना।


पथरीले पथ पर आषाढ़ की असह भभक लिये,

विकृत शुद्ध पवन परिवेश में है आच्छादित, 

बेचैन मानवता हुई पलायन करते मानव मूल्य,

अन्तःस्मित,अन्तःसंयत का सोखता भाव। 


©अनीता सैनी 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

बरगद की आपातकालीन सभा



प्रदूषण के प्रचंड प्रकोप से ,  
दम तोड़ता देख धरा का धैर्य,  
 बरगद ने आपातकालिन सभा में,  
 आह्वान नीम-पीपल का किया। 

 ससम्मान सत्कार का ग़लीचा बिछा, 
बुज़ुर्ग बरगद ने दिया आसन प्रभाव का,  
विनम्र भाव से रखा तर्क अपना, 
बिखर रही क्यों शक्ति तुम्हारी,   
मानव को क्यों प्रकृति से अलगाव हुआ। 
  
मानव अलगाव की  करुण-कथा, 
 ज़ुबाँ से जताते व्यथा नीम-पीपल, 
 कटु-सत्य संग धर अधरों पर शब्दों को, 
पीले पत्तों-सा पतन मानव का दिखा रहे। 
  
शीशे की दीवारें शीतल हवा का स्वाँग, 
धन-दौलत को सुख जीवन का बता,  
प्रकृति से विमुख कृत्रिमता को पनाह, 
मानव कैमिकल का स्वाद चख़ रहा। 

 चिंतापरक गहन विषय पर्यावरण, 
अहं का भार बढ़ा मानव हृदय पर, 
लापरवाही गरल बोध दर्शाती, 
सजा का हो प्रवधान,  
वृक्षों की सभा में आवाज़ यह उठी। 

मन मस्तिष्क हुआ कुपोषित मानव का ,  
तन को सबक़ सिखायेगा प्रदूषण, 
प्रत्येक अंग में कीट बहुतेरे, 
आवंतों के सुझाव की प्रतीक्षा करे धरा। 

©अनीता सैनी