बुधवार, 11 नवंबर 2020

आँखोड़ा


आँखों पर आँखोड़ा 
खुरों में लोहे की नाल को गढ़ा 
दौड़नेवाले की पीड़ा का आकलन नहीं 
दौड़ानेवाले को प्राथमिकता थी।

क्यों का हेतु साथ था ?
किसने बाँधी विचारों की ये पट्टी ?
प्रश्न का उत्तर ज़बान पर
हाथ में फिर वही प्रश्न  था।

ऊँघते हालात का देते तक़ाज़ा 
खीझते परिवर्तन के साथ दौड़ना
चुप्पी साधे समझ गंभीरता ओढ़े  
बुद्धि का यह खेल अलबेला था।

सदियों पहले जिसने भी बाँधी हो ?
कर्ता-कर्म बदले विचारों का भार वही 
समय के साथ रियायत मिली
चमड़े का पट्टा थ्री डी प्रिंट में था।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

20 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12.11.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय सर चर्चामंच पर स्थान देने हेतु।

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  2. यथावत, प्रभावशाली लेखन - - नमन सह।

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    1. सादर आभार आदरणीय सर आपकी प्रतिक्रिया मेरा संबल है।आशीर्वाद बनाए रखे।

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 12 नवंबर 2020 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. सादर आभार आदरणीय सर पाँच लिंकों पर स्थान देने हेतु।
      सादर

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    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  5. इस कविता में भावनात्मक दर्द है।

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  6. बहुत सुंदर सृजन ।
    कवि मन कहां तक सोचता है!!!
    एक अश्व को साधने और व्यवहार लेने से पहले उसे कितने बंधन में बांधना होता है,किसने की शुरुआत नहीं पता पर सोच कर बताएं ....
    नथनी,बोरला झुमके,कंगन करधनी,पायल बिछिया
    घूंघट,के बारे में आप क्या सोचती है।😌

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    1. दिल से आभार आदरणीय दी सारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु।आपकी प्रतिक्रिया संबल है मेरा।
      सादर

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  7. बहुत सार्थक। विडम्बना है यह।
    धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ आपको।

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    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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    1. सादर आभार आदरणीय सर मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।
      सादर

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  9. हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।

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    1. दिल से आभार आदरणीय मीना दी मनोबल बढ़ाने हेतु।
      सादर

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anitasaini.poetry@gmail.com