सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

परिवर्तन सब निगल चुका था


हमने शब्दों का व्यापार करना चाहा 
परंतु वे शब्द भी खोखले प्रभावरहित थे 
हमारा व्यवहार संवेदनारहित 
भाव दिशा भूल ज़माने से भटक चुके थे 
शुष्क हृदय पर दरारें पड़ चुकी थी 
अब रिश्ते रिश्ते नहीं पहचान दर्शाने हेतु 
मात्र एक प्रतीक बन चुके थे 
जीवन ज़रुरतों का दास बन चुका था 
घायल सांसों से आँखें चुराता इंसान 
इंसानीयत का ओहदा छोड़ चुका था 
अबोध बालकों की घूरतीं आँखें 
बालकनी से झाँकते कोरे जीवंत चित्र थे 
माँ की ममता पिता का दुलार 
अपनेपन का सुगढ़  एहसास  
सप्ताह में एक बार मिलने वाली 
मिठाई बन चुका था 
मास्क में मुँह छिपाना 
हाथों पर एल्कोहल मलना 
परिवर्तन पहनना अनिवार्य बन चुका था 
अकेलापन शालीनता की उपाधि
मानवीय मूल्य मात्र बखान 
फ़्रेम में ढलती कहानी बन चुके थे 
देखते ही देखते बदलाव सब निगल चुका था।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 25 अक्तूबर 2020

अभिलाषा



मन दीये में नेह रुप भरुँ  
बैठ स्मृतियों की मुँडेर पर।
समर्पण बाती बन बल भरुँ 
समय सरित की लहर पर।
प्रज्वलित ज्योति सांसों की 
बन प्रिय पथ पर पल-पल जलूँ।

भाव तल में तरल तरंग 
मृदुल अनुभूतियाँ बन छाया ऊठूँ ।
किसलय-दल मैं सजल भोर बनूँ 
पथिक पथ तपन मिटे दूर्वा रुप ढलूँ।
शाँत पवन मिट्टी की महक बनूँ 
 नयनन स्वप्न प्रिय प्रीत बन जलूँ ।

सूनेपन में  मुखर आभा 
उदास मन में उम्मीद बन निखरुँ।
आरोह-अवरोह सब मैं सहूँ 
जीवन-लय में लघु कण बन बहूँ ।
हताश मन में साथी संबल बनूँ 
प्रिय मन दीप्ति हृदय आँगन जलूँ ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

अनभिज्ञता है पूर्णता


तुम्हें ये जो पूर्णता का बोध
 हर्षाए जा रहा है 
ये अनभिज्ञता है तुम्हारी 
थकान नीरसता छिछलापन है 
तुम्हारे मन-मस्तिष्क का 
उत्सुकता उत्साह पर 
अनचाहा विराम चिन्ह है 
अपूर्णता अज्ञानता मिथ्या है जो 
 झाँकतीं है समझ की दीवार के 
 उस पार नासमझ बन 
समर्पण को हाँकता अधूरापन 
 तुम्हारे  विनाश का है  प्रारब्ध।
पूर्णता के नशे में 
तुमने ये जो ज़िंदा पेड़ काटे हैं 
जूनून दौड़ेगा इनकी नसों में 
जड़े  ज़िंदगी गढ़ेगी दोबारा  
 इन पेड़ों की टहनियों को 
ज़िद पर झुकाईं हैं तुमने ये टूटेगी नहीं 
लहराएगी नील गगन में स्वछंद ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

जब भी मिलती हूँ मैं



जब भी मिलती हूँ मैं 
शब्दों से परे एक-एक की ख़ामोशी 
आँखों के झिलमिलाते पानी में पढ़ती हूँ।

कोरी क़िताब के सफ़ेद पन्ने 
पन्नों में हृदय के कोमल भाव 
भावों के बिखरे मोती शब्दों से चुनती हूँ।

सूरज की रोशनी चाँद की आभा 
कृत्रिमता से सुदूर प्रकृति की छाँव  में 
निश्छल बालकों का साहस पढ़ती हूँ।

गर्व में डूबा मन इन्हें सेल्यूट करता 
पैरों में चुभते शूल एहसास सुमन-सा देते 
आत्ममुग्धता नहीं जीवन में त्याग पढ़ती हूँ ।

परिवर्तन के पड़ाव पर जूझती सांसें 
सेवा में समर्पित सैनिक बन सँवरतीं हैं  
समाज के अनुकूल स्वयं को डालना पढ़ती हूँ।

समय सरहद सफ़र में व्यतीत करती आँखें 
आराम  आशियाने  में  ढूँढ़तीं  
गैरों से नहीं अपनों से सम्मान की इच्छा पढ़ती हूँ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

क्षितिज पार दूर देखती साँझ


 
फिर पथ पीड़ा क्यों हाँक रहा?
ले गोद चला भाव सुकुमार
एक-एक रोटी को पेट पीटता  
करुण कथा में सिमटा संसार।

मौन करुणा कहे बरसे बरखा 
शीतलता को धरणी तरसती।
मनुज सरलता डायन बन लौटी 
चपला बुद्धि काया को छलती।

ठठेरा बन बैठा है यहाँ कौन ?
गढ़ता शोषण साम्राज्य मौन।
मिटाना था अँधेरा आँगन का   
विपुल वेदना अधिकारी कौन?

हृदय मधु भरा मानस मन में 
ज्यों पराग सुमन पर ठहरा।
ज्ञात है बदली में अंजन वास 
 निधियाँ का चितवन पर पहरा।

उन्मादी मन उलझा उत्पात में 
क्षितिज पार दूर  देखती साँझ। 
निर्निमेष पलक हैं भावशून्य 
अंतस में रह-रह उभरे झाँझ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2020

मैं और मेरा मन


मैं और मेरा मन 
सभ्यता के ऐंद्रजालिक अरण्य में 
भटके नहीं विचरण पर थे 
दृश्य कुछ जाने-पहचाने  
सिमटी-सी भोर लीलाएँ लीन 
बुझते तारे  प्रभात आगमन 
मैं मौन मन लताओं में उलझा 
अस्तित्व ढूँढ़ता सुगबुगाया 
निश्छल प्रकृति का है कौन ?
देख वाक़या धरणी पर 
शंकित आहान बिखरे शब्द 
वृक्ष टहनियों में  स्वाभिमान  
पशु-पक्षी हाथ स्नेह के थाल  
सुंदर सुमन क्रीड़ा में मग्न 
प्रकृति कर्म स्वयं पर अडिग  
सूरज-चाँद पाबंद समय के
शीतल नीर सहज सब सहता 
पर्वत चुप्पी ओढ़े मौन वह रहता 
अचरज आँखों में उपजा मन के 
निकला लताओं के घेरे से 
मानव नाम का प्राणी देखा !
सींग शीश पर उसके चार 
काया कुपित काजल के हाथ 
नींद टाँग अलगनी पर बैठा 
आँखों में आसुरी शक्ति का सार  
वैचारिक द्वंद्व दिमाग़ पर हावी 
 भोग-विलास में लिप्त इच्छाएँ अतृप्त 
काज फिरे कर्म कोसता आज 
धड़कन दौड़ने को आतुर 
नब्ज़ ठहरी सुनती न उसकी बात 
हाय ! मानव की यह कैसी ज़ात 
मन सुबक-सुबककर रोया 
आँख का पानी आँख में सोया।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

इंद्रजाल


ऐन्द्रजालिक की भाँति छाया रहता है
घर के कोने-कोने में माया का ओढ़े गुमान।
माया महकती है सदृश्य हर पहर  
हरशृंगार के पावन पुष्प के समान
  
बाँधता नाज़ुक श्वेत धागा अंतस पर 
व्यवहार का हल्की गठान के साथ
मौन साधे आँखों से कुछ कहता 
अहसास संग जोड़ता परिवार का हाथ

नीरवता में भाव बिखेरता हँसता जैसे 
 लहरों को छिपाता आग़ोश में समंदर
भावभीनी चुप्पी में सतरंगी स्वप्न बीनता 
पैरों की जलन बिसराता तपती रेत पर।

कैसे गढ़ता है ज़िंदगी की हवा में जादू 
निश्छल निरीह जीवन पर ऋतुएँ हर्षाईं। 
यादों की एक गठरी उठाए कंधों पर 
चल पड़ा जाने-पहचाने पथ पर हरजाई

दृढ़ शक्ति अथाह विश्वास के बोता बीज 
मन में नेह अँकुरित करता जैसे छलिया
अनंत परिभाषाओं से गढ़ूँ नाम उसका 
 शीतल हवा-सा खिला देता मन कलियाँ

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

आदरणीया कुसुम दीदी द्वारा लिखी मेरी पुस्तक 'एहसास के गुँचे' की समीक्षा

आदरणीया कुसुम दीदी का अपार स्नेह मुझे प्राप्त है। मेरे प्रथम काव्य-संग्रह 'एहसास के गुंचे' की आदरणीया कुसुम दीदी ने अपनी चिर-परिचित शैली में समीक्षा लिखी है।आदरणीया दीदी किसी भी रचना का मर्म स्पष्ट करने और भाव विस्तार करने में सिद्धहस्त हैं। आपका स्नेह और आशीर्वाद पाकर मैंने ब्लॉग जगत के साथ साहित्य के क्षेत्र में अपना सफ़र तय करने का निश्चय किया है। साहित्य क्षेत्र में क़दम-क़दम पर वरिष्ठ जनों के मार्गदर्शन एवं सहयोग की ज़रूरत पड़ती है।आदरणीया दीदी सदैव रचनाकारों को प्रोत्साहित करतीं नज़र आतीं हैं।
लीजिए पढ़िए आदरणीया कुसुम दीदी द्वारा लिखी मेरी पुस्तक 'एहसास के गुंचे' की समीक्षा-

अनीता सैनी "दीप्ति" जी का 'एहसास के  गूँचे' मेरे हाथ में है ।
ये उनका पहला काव्य संग्रह है,
वैसे  ब्लाग जगत का ये दैदीप्यमान तारा फेसबुक और काव्य प्रेमियों के लिए अंजान नहीं है ,उनकी सतत और सशक्त लेखनी निर्बाध गति से साहित्य पथ पर अग्रसर है।
पूर्ण समीक्षा कर सकूं ऐसा अभी तक स्वयं में सामर्थ्य नहीं पाती पर पुस्तक पढ़ कर कुछ उदगार
जो सहज ही मेरे मानस पर आते वो व्यक्त कर रही हूं।

'एहसास के  गूँचे' क्या है मेरी नज़र में----
भावों की अवरुद्ध यवनिका को हटा कर, कुछ असंगत वर्जनाओं को तोड़ कर,  जीवन की अनेकों संवेदनाओं से ओतप्रोत रंग  सहज गति से शब्दों के रूप में श्वेत पन्नों की विथिका में विचरण कर रहें हैं ।
प्रेम ,आस्था, विश्वास,समर्पण
सामायिक, सामाजिक,चिंतन समस्याएं,कुंठा ,विश्वानुभूति सभी विषय समाहित है इसमें।
जगह जगह साबित करती है इनकी रचनाएं कि कवियत्री संवेदनशील,कोमल हृदय,सामाजिक और मानवीय मूल्यों के प्रति अगाढ़ आस्था के भाव रखती है जो उनकी कविताओं में स्वत: ही उभर कर पाठक को गहरा जोड़ लेती है । 

विषय में गहरे तक डूबने की क्षमता साथ ही हर दर्द को महसूस कर उस से जूड़ जाना,
कुछ रचनाओं में उनके व्यक्तित्व का ये गुण स्पष्ट सामने आ रहा है।
कुछ जगह भाव गूढ़ और रहस्यात्मक हो जाते हैं जो आम पाठक को कुछ विचलित करते होंगें, पर रचनाओं के नजदीक जाकर ये महसूस होता है कि यह उनका अपना स्वाभाविक अंदाज है।
मुझे पुरा संकलन पठनीय लगा तो किसी भी अलग अलग रचना पर अपने भाव नहीं रखकर पुरी पुस्तक पर सामूहिक भाव रख रही हूं ।
भाषा सहज मिश्रित, बोलचाल में व्यवहार होते फारसी, उर्दू शब्दों का हिंदी के साथ तालमेल करता सुंदर प्रयोग।
अनीता जी को उनके पहले एकल  काव्य संग्रह के लिए अनंत शुभकामनाएं और बधाई,वे सदैव अपनी काव्य यात्रा में नये आयाम स्थापित करें ।
उनका अगला काव्य संग्रह और भी परिमार्जित होकर शीघ्र ही काव्य प्रेमियों के हाथ में आये।
शुभकामनाओं सहित ।

कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

भद्रता


भद्रता ! 
तुम भद्रता नहीं रही हो !
बदल गई हो !
अपनी-सी नहीं रही हो आज!
भटक गई पथ के प्रवाह से या 
ऊँटों के कारवाँ  से कुचली गई हो 
तेज़ धूप में जली 
अनमने स्वरुप में ढल गई  हो आज 
भावों से 
आचरण में उतर प्रभाव को ढोती 
रेत में धँसा
 मात्र एक शब्द बन गई हो आज 
स्वयंसिद्धता दर्शाती 
विचारों में उलझी 
द्वंद्व में पीसी सापेक्ष पीड़ा हो!
मानवीय मूल्यों की 
टूटी कड़ी बन गई हो आज 
भावों का अभाव  
निरंकुशता का दाव 
मानव जीवन गर्हित 
मूर्छित पड़ा राह में 
पैरों से पीसती 
 मौन साधे क्यों बैठी हो आज ?
फूल पत्ते 
नव किसलय में कोरा कंपन 
शुष्क संवेदना 
कृत्य करुणा में क्रंदन 
जीवन आचरण से
 भटक तुम भर्मित हो !
अतृप्त चित्त 
रुष्ट आस्था में रुदन क्यों ? 
परिवर्तन दिशाविहीन खंडित हो !
आख्यान मात्र एक शब्द क्यों?
नहीं रही मानव मन में 
कहाँ है तुम्हारा आधार जीवंत ?
ममता मनः स्थिति 
भाव बन  बिसराई नहीं लाज 
व्यर्थ सुमन कुमोद को संचित जग 
भद्रता !
तुम भद्रता नहीं रही भटक गई हो आज !

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

मनोज्ञ रश्मियाँ


मनोज्ञ रश्मियाँ 
समेटने लगी हैं स्वयं को 
भू पर बिखरे 
अतिशयोक्तिपूर्ण आभामंडल से 
विरक्त हो 
ज़िंदगी की दरारें 
वक़्त बे वक़्त चाहती हैं भरना  
जीवन की ऊहापोह से थक 
आज ख़ामोश हैं  
संकुचाई-सी मुरझाई-सी 
दायित्वबोध का करती भान 
कहती हम पाहुन हैं  
  निशा की गोद में सिमटी-सी 
सांसों में  ढूँढ़ती हैं सुकून 
यायावर रुप में ढला जीवन  
क़दमों का चाहती हैं ठहराव
अनमने मन से  हैं  उदास  
सुबह से शाम तक स्वयं में उलझी
यामिनी से मिलने पर भी  
समेटे शब्दों को मौन में 
चिंताग्रस्त स्वयं से क्रुद्ध 
समय पैंतरों से अनजान 
दुखांत हृदय को थामे पलकों से 
पूछती कौन हैं हम ?

@अनीता सैनी  'दीप्ति'