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बुधवार, जनवरी 18

मैं और मेरी माँ






माँ के पास शब्दों का टोटा

हमेशा से ही रहा है 

वह कर्म को मानती है

कहती है-

”कर्मों से व्यक्ति की पहचान होती है

 शब्दों का क्या कोई भी दोहरा सकता है।”

उसका मितभाषी होना ही

मेरी लिए

कविता की पहली सीढ़ि था

 मौन में माँ नजर आती है 

मैं हर रोज़ उसमें माँ को जीती हूँ और 

माँ कहती है-

”मैं तुम्हें।”

जब भी हम मिलते हैं

 हमारे पास शब्द नहीं होते

 कोरी नीरवता पसरी होती है

 वही नीरवता चुपचाप

 गढ़ लेती है नई कविताएँ 

माँ कविताएँ लिखती नहीं पढ़ती है

 मुझ में 

कहती है-

"तुम कविता हो अनीता नहीं।"


@अनिता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, जनवरी 7

कोहरे की चादर में लिपटी सांसें



कोहरे की चादर में 

लिपटी सांसें

उठने का हक नहीं है

इन्हें !

जकड़न सहती

ज़िंदगी से जूझती ज़िंदा हैं

टूटने से डरतीं 

वही कहती हैं जो सदियाँ

कहती आईं 

वे उठने को उठना और

बैठने को

 बैठना ही कहतीं आईं हैं 

पूर्वाग्रह कहता है 

तुम 

घुटने मोड़कर 

बैठे रहो!

उठकर चलने के विचार मात्र से

छिल जाती है

 विचारों के तलवों की 

कोमल त्वचा।


@अनिता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, दिसंबर 26

'एहसास के गुँचे' एवं 'टोह' का लोकार्पण

 

  
      शब्दरंग साहित्य एवं कला संस्थान बीकानेर में रविवार को महाराजा नरेंद्र सिंह ऑडिटोरियम में काव्य संग्रह 'एहसास के गुँचे' और 'टोह'  का लोकार्पण किया गया।  नगर की विभिन्न संस्थाओं द्वारा किए गए सम्मान से अभिभूत हूँ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि कवि कथाकार आदरणीय राजेंद्र जोशी जी ने कहा-”कविताएँ स्त्री मन की रचनाएँ हैं जिसमें मानवीय संवेदना और अभिव्यक्ति के सशक्त आयाम है।"
 कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय डॉ. अजय जोशी जी ने कहा- ”कविताओं में संप्रेषणीयता और सरलता है और सहज ही पाठकों के हृदय में उतर जाती है।"
विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ लेखक एवं लघुकथाकार आदरणीय अशफ़ाक़ क़ादरी जी ने कहा- "कवयित्री बहुआयामी रचनाकार है जिनकी रचनाओं में लघु कथा जैसा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।"
 कार्यक्रम संयोजक आदरणीय राजाराम स्वर्णकार ने लोकार्पित कृतियों का परिचय बहुत ही सुंदर सहजता से दिया।
 सैनी समाज के सभी कार्यकर्ता एवं अधिकारी विकास संस्था बीकानेर के अध्यक्ष प्रवीण गहलोत जी एवं संगठन मंत्री आदरणीय मेघराज सोलंकी जी और खेल समीक्षक व्यंग्यकार आदरणीय आत्माराम भाटी जी जितेंद्र गहलोत जी , पवन गहलोत जी का भी हृदय से आभार।

समारोह में पधारे सभी महानुभावों का हृदय से अनेकानेक आभार इतने कम समय में सभी से रूबरू होने का यह सुअवसर एक यादगार क्षण बनकर हृदय में रहेगा।

शनिवार, दिसंबर 17

बटुआ



 एहसास भर से स्मृतियाँ

बोल पड़ती हैं कहतीं हैं-

तुम सँभालकर रखना इसे

अकाल के उन दिनों में भी

खनक थी इसमें!

चारों ओर

सूखा ही सूखा पसरा पड़ा था

उस बखत भी इसमें सीलन थी।

गुलामी का दर्द

आज़ादी की चहलक़दमी 

दोनों का

मिला-जुला समय भोगा है इसने।

अतीत के तारे वर्तमान पर जड़ती

यकायक मौन में डूब जाती थी।

क्या है इसमें ? पूछने पर बताती 

विश्वास! 

 विश्वासपात्र के लिए।

नब्बे पार की उँगलियाँ 

साँझ-सा स्पर्श 

भोर की हथेलियों पर विश्वास के अँखुए

धीरे-धीरे टटोला करती थी ददिया सास।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


बुधवार, नवंबर 30

उसका जीवन



उसका जीवन देखा?
यह जीवन भी कोई जीवन है
व्यर्थ है… एक दम व्यर्थ!
उसे मर जाना चाहिए
हाँ! मर ही जाना चाहिए
आख़िर बोझ है धरती का 
हाँ!बोझ ही तो है 
हर एक व्यक्ति
हर दूसरे व्यक्ति की ओर
इशारा करता हुआ कहता है।
कहते हुए वह झाड़ रहा होता है अपने कपड़े
और साथ ही अपनी जीभ।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, नवंबर 9

स्त्री भाषा



 

परग्रही की भांति

धरती पर नहीं समझी जाती

स्त्री की भाषा

भविष्य की संभावनाओं से परे 

किलकारी की गूँज के साथ ही 

बिखर जाते हैं उसके पिता के सपने

बहते आँसुओं के साथ 

सूखने लगता है

माँ की छाती का दूध

बेटी के बोझ से ज़मीन में एक हाथ 

धँस जाती हैं उनकी चारपाई 

दाई की फूटती नाराज़गी 

दायित्व से मुँह मोड़ता परिवार

माँ कोसने लगती हैं 

 अपनी कोख को 

उसके हिस्से की ज़मीन के साथ

छीन ली जाती है भाषा भी 

चुप्पी में भर दिए जाते हैं

मन-मुताबिक़ शब्द 

सुख-दुख की परिभाषा परिवर्तित कर  

जीभ काटकर

 रख दी जाती है उसकी हथेली पर 

चीख़ने-चिल्लाने के स्वर में उपजे

शब्दों के बदल दिए जाते हैं अर्थ 

ता-उम्र  ढोई जाती है उनकी भाषा

एक-तरफ़ा प्रेम की तरह।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अक्तूबर 29

मेरी दहलीज़ पर



भोर का बालपन

घुटनों के बल चलकर आया था

उस रोज़ मेरी दहलीज़ पर

गोखों से झाँकतीं रश्मियाँ

ममता की फूटती कोंपलें

उसकने लगी थीं मेरी हथेली पर

बदलाव की उस घड़ी में

छुप गया था चाँदबादलों की ओट में

सांसें ठहर गई थीं हवा की

बदल गया था

भावों के साथ मेरी देह का रंग

मैं कोमल से संवेदनशील

और पत्नी से माँ बन गई।

 

आँचल से लिपटी रातें सीली-सी रहतीं

मेरे दिन दौड़ने लगे थे

उँगलियाँ बदलने का खेल खेलते पहर

वे दिन-रात मापने लगे

सूरज का तेज विचारों में भरता

मेरा प्रतिबिम्ब अंबर में चमकने लगा

नूर निखरता भावनाओं का

मैं शीतल चाँदनी-सी झरती रही

बदल गया था

भावों के साथ मेरी देह का रंग

मैं कोमल से संवेदनशील

और पत्नी से माँ बन गई। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


बुधवार, अक्तूबर 26

काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर




मेरी मानस पुत्री के जन्म पर मेरी माँ उतनी ही ख़ुश है जितनी पहली बार वह नानी बनने पर थी। क़लम के स्पर्श मात्र से झरता है प्रेम अब हम दोनों के बीच। माँ के हृदय में उठती हैं हिलोरें भावों कीं जो मेरी क़लम में शब्द बनकर उतर आते हैं।

आज मेरे नवीनतम काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर Bodhi Prakashan जयपुर के कार्यालय में अपने-अपने क्षेत्र के स्वनामधन्य महानुभावों
श्री माया मृग जी (संचालक:बोधि प्रकाशन, जयपुर )

श्री  M.P. Saini 
(वरिष्ठ अधिवक्ता व पूर्व अध्यक्ष सैनी समाज, जयपुर 
अध्यक्ष: सिविल राइट्स सोसायिटी, जयपुर)

श्री डॉ.कमल सिंह जी (प्राचार्य एवं वरिष्ठ शिक्षाविद, जयपुर)
एवं मेरे प्रिय पुत्र-पुत्री
का सानिध्य, स्नेह, उत्साहवर्धन, आशीर्वाद व मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
यह ख़ुशी आपके साथ साझा करते हुए साहित्यिक जवाबदेही का एहसास होते हुए मन प्रफुल्लित है।
पुस्तक के आकार लेने तक की प्रक्रिया में शामिल समस्त महानुभावों का हृदय से आभार।

कविता संग्रह 'टोह'  प्राप्त करने हेतु अमेज़ॉन लिंक-




@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, अक्तूबर 23

बिरला गान



समय ने सफ़ाई से छला  

उस सरल-हृदय ने मान लिया 

कि गृहस्थ औरतों का क़लम पर 

दूर-दूर तक कोई अधिकार नहीं।


अतृप्त निगाहों से घूरती किताबों को

ज्यों ज़िंदगी ने सारे अनसुलझे रहस्य

 स्याही में लिप इन्हीं पन्नों में छुपाए हैं

 उसकी ताक़त से रू-ब-रू

 क़लम सहेजकर रखती है।


क़लम के अपमान पर खीझती 

सीले भावों की बदरी-सी बरसती  

उसके स्पर्श मात्र से झरता प्रेम

वह वियोगिनी-सी  तड़प उठती है।


 पंन्नों पर उँगली घुमाती

एक-एक पंक्ति को स्पर्शकर

बातें कविता-कहानियों-सी गढ़ती 

शब्द नहीं

आँखें बंदकर अनगढ़ भावों को पढ़ती है।


 अनपढ़ नहीं है वह 

गृहस्थी की उलझनों में उलझी 

 शब्दों से मेल-जोल कम रखती है 

 उनसे जान-पहचान का अभाव 

बढ़ती दूरियों से बेचैनी में सिमटी 

आत्म  छटपटाहट से लड़ती है।


शब्दों को न पहचानना खलता है उसे

आत्मविश्वास की उठती हिलोरों संग

 साँझ की लालिमा-सी 

भोर का उजाला लिए कहती है-

 लिखती है मेरी बेटी

क्या लिखती है वह नहीं जानती

जानती है बस इतना कि लिखती है मेरी बेटी

पहाड़-सी कमी

 छोटे से वाक्य में पूर्णकर लेती है माँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'