समर्थक/Followers

सोमवार, 11 नवंबर 2019

मुख पर वो मुस्कान कैसे लाऊं ?



अपने ही दायरे में सिकुड़ रही अभिव्यक्ति, 
पनीली कर सकूँ ऐसा नीर कहाँ से लाऊँ ? 
कविता सृजन की आवाज़ है चिरकाल तक जले,  
कवि हृदय में वो अगन कैसे लजाऊँ ? 

समझा पाऊँ शोषण की परिभाषा,  
ऐसा तर्क कहाँ  से लाऊँ ? 
स्वार्थ के लबादे में लिपटा है इंसान, 
जगा सकूँ इंसानियत को वो परवाज़ कहाँ से लाऊँ ? 

सत्ता-शक्ति का उभरता लालच, 
 राजनीति की नई परिभाषा जनमानस को कैसे समझाऊँ ?  
शक्ति प्रदर्शन कहूँ या देश के भविष्य पर डंडों से करते बर्बर वार,  
 मरघट बनी है दुनिया इसे होश में कैसे लाऊँ ? 

हैवानियत की इंतिहा हो चुकी, 
इंसानियत की  बदलती तस्वीर कैसे दिखाऊँ ? 
मर रहा मर्म मानवीय मूल्यों  का,   
स्वार्थ के  खरपतवार को कैसे जलाऊँ ? 

अंजुरी भर पीने को भटकता है समाज,  
परमार्थ की शरद चांदनी को,  
सिहरती  सिसकती मासूम बालाओं के मुख पर 
  वो नैसर्गिक मुस्कान कैसे लाऊँ ?

©  अनीता सैनी 

शनिवार, 9 नवंबर 2019

मौन में फिर धँसाया था मैंने उन शब्दों को



 कुछ हर्षाते
 लम्हे 
अनायास ही
 मौन में मैंने 
धँसाये  थे  
आँखों  के
 पानी से भिगो
 कठोर किया उन्हें  
साँसों की 
पतली परत में छिपा
 ख़ामोश
 किया था जिन्हें 
फिर भी 
 हार न मानी उन्होंने 
 उसे 
 अतीत की 
दीवार में चिनवा चुप्पी साधी थी 
मैंने  
उन लम्हों में 
बिखर गये थे कुछ शब्द  
कुछ लिपट गये
 भविष्य के पैरों से   
वक़्त की
उजली कच्ची 
 धूप सहते हुए 
 ज़िंदगी
 के गलियारे में 
अपने
 अस्तित्त्व 
की नींव गढ़ते
  राह में मुखर हो 
 समय की 
दहलीज़ पर 
इतिहास के पन्नों में 
बरगद 
की छाँव बन 
भविष्य की अँगुली 
थाम
 जीवन की 
राह में मील के 
पत्थर बन  
पूनम की साँझ में 
मृदुल मौन बनकर वे 
पराजय का
 दुखड़ा भी न रो पाये 
तीक्ष्ण असह वेदना 
से लबालब 
अनुभूति का जीवन 
 जीकर  
पल प्रणय में भी नहीं खो पाये 
तभी उन्हें  
मौन में फिर धँसाया था 
मैंने  |


© अनीता सैनी 

बुधवार, 6 नवंबर 2019

जनाब कह रहे हैं ख़ाकी और काला-कोट पगला गये हैं


जनाब कह रहे हैं 
 ख़ाकी और काला-कोट पगला गये हैं  
और तो और सड़क पर आ गये हैं  
 धाक जमा रहे थे हम इन पर 
सफ़ेद पोशाक  पहन 
पितृ देव का रुतबा दिखा 
भविष्यवाणी कर रहे थे 
शब्दों का प्रभाव क्या होता है 
ख़ाकी और काले-कोट को 
अँगुली पर नचा रहे थे 
नासपीटे धरने पर बैठ गये 
पहले काला-कोट अब यह ख़ाकी  
परिवार सहित सड़क पर जाम लगाये बैठे हैं  
बुद्धि भिनभिना रही है हमारी 
ये  होश  में  कैसे आ रहे हैं ? 
जागरुकता का यह क्या झमेला है ? 
ख़ामोश करो इन सभी को 
कोई नई सुरँग खोदो  
नया उजला चोगा बनवाओ 
नया अवतार गढ़ो 
 एक बार फिर उजाले का 
देवता और मसीहा मुझे कहो 
सफ़ेद पोशाक के पीछे 
मेरी हर करतूत छिपाओ
हुक्म की अगुवाही नहीं हुई 
बौखला गये जनाब
वहम की पट्टी खुलती है और 
मंच पर पर्दा गिरता है
क़दम डगमगाते हैं 
साँसें गर्म हो
 शिथिल पड़ जाती हैं 
जनाब यह 
२०२० की पैदाइश हैं  
एक बच्चा कान में फुसफुसाता है !

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

दर्द दिल्ली का



ज़िंदगियाँ 
निगल रहा प्रदूषण  
क्यों पवन पर प्रत्यंचा
चढ़ायी है ? 
कभी अंजान था मानव 
इस अंजाम से 
आज वक़्त ने
 फ़रमान सुनाया है 
चिंगारी 
शोला बन धधक रही 
मानव !
किन ख़्यालों में खोया है
वाराणसी 
सिसक-सिसक तड़पती रही 
आज दिल्ली 
 नाज़ुक हालत में पायी है 
 देख !
कलेजा 
 मुँह को भर आया 
क्यों गहरी नींद में स्वयं को सुलाया है 
सल्फ़ाइड का धुँआ खुले आसमान में 
उड़ रहा 
 क्यों मौत को हवा में मिलाया 
चंद सिक्कों का मुहताज बन दर्द का 
दरिया क्यों बहाया है 
इतिहास गवाह है
 सदियों से 
सहती आयी 
 हर दौर का जख़्म सहलाया   
न टपका आँख से पानी न नमी पलकों को  
छू पायी है 
वक़्त का सुनाया फ़रमान 
इसकी हिम्मत में
 न कमी पायी   
आज न जाने क्यों 
बेबस और लाचार नज़र आयी है 
उम्र ढल गयी या 
अपनों ने यह रोग 
थमाया है 
साँसों में घोल रहा क्यों ज़हर 
तड़प रही प्रति पहर है 
आँखों पर क्यों धुंध छाई है |

© अनीता सैनी

शनिवार, 2 नवंबर 2019

शिकवा करूँ न करूँ शिकायत तुमसे



शिकवा करूँ न करूँ तुमसे शिकायत कोई, 
बिखर गया दर्द, दर्द का वह मंज़र लूट गया,  
समय के सीने पर टांगती थी शिकायतों के बटन, 
राह ताकते-ताकते वह बटन टूट गया |

मज़लूम हुई मासूमियत इस दौर की,  
 भटक गयी राह, 
इंसान अच्छे दिनों के दरश को तरस गया,  
सुकूँ सजाता है मुसाफ़िर मंज़िल के मिल जाने पर, 
वह मंज़िल की राह भटक गया |

दीन-सी हालत दयनीय हुई जनमानस की, 
वो अब निर्बोध बन गया, 
उम्मीद के टूटते तारों से पूछता है वक़्त जनाब, 
हिचकियों का मतलब भूल गया |

बहका दिया उन चतुर वासिंदों ने उसे,  
बौखलाकर वनमानुष-सा बदहवास हो हमें भूल गया, 
हालात बद से बदतर हुए, 
बदलाव की परिभाषा परोसते-परोसते, 
लहू हमारा सोखता गया |

परवान चढ़ी न मोहब्बत खेतिहर की , 
जल गयी पराली और बिखर गयी आस्था खलिहान में, 
खिलौना समझ खेलता रहा ज़ालिम, 
डोर अब किसी और के हाथों में थमाता गया |

© अनीता सैनी 

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

क्यों नहीं कहती झूठ है यह



क्यों नहीं कहती झूठ है यह,  
तम को मिटाये वह रोशनी हो तुम,  
 पलक के पानी से जलाये  दीप,  
ललाट पर फैली स्वर्णिम आभा हो तुम,  
संघर्ष से कब घबरायी ? 
मेहनत को लाद कंधे पर, 
 जीवन के हर पड़ाव पर मुस्कुरायी तुम |

बाँध देती हो पलभर में प्रलय-सी, 
मायूसी की पोटली को तुम,  
फिर ढलती शाम संग, 
जी उठती हो, 
 नव प्रभात नव किरण के साथ तुम,  
हौसले को रखती हो साथ, 
मंज़िल की तलबगार हो तुम |

नारी हो तुम, 
 नारी-शक्ति ख़ुद में एक हथियार हो तुम, 
हिम्मत संग डग भरो, 
शौर्य से करो फिर मुलाक़ात तुम, 
इंदिरा गाँधी को याद करो, 
नयन से नहीं नीर बहाओ तुम, 
अबला बन हाथ न जोड़ो, 
सबला बन अधिकारों को अपने पहचानो,   
नारी हो तुम नारी को नहीं लजाओ तुम |

बेटी बोझ नहीं कंधे का, 
जनमानस को यह दिखलाओ  तुम,  
 कर्मठ कर्मों का दीप जला, 
परिस्थितियों को पैनीकर राह जीवन में बना,  
हालात का बेतुका बोझ नहीं दिखलाओ तुम,  
कफ़न का उजला रंग शर्माएगा, 
सूर्य-सी आभा घर-आँगन में,  
धरा के दामन में फैलाओ तुम |

© अनीता सैनी 

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

तुम देख रहे हो साहेब



 उजड़ रहा है
 साहेब 
धरा के दामन से 
विश्वास 
सुलग रही हैं 
साँसें 
कूटनीति जला रही है ज़िंदा 
मानस 
  सुख का अलाव
 जला भी नहीं 
दर्द धुआँ बन आँखों में
 धंसता गया  
निर्धन प्रति पल हुआ
 बेचैन 
 वक़्त वहीं गया 
ठहर  
झगड़ता रहा
 मैं, मेरे का कारवां  
बिखर गये घरौंदे 
 परिवेश में घुलता रहा 
ज़हर 
सौंप गये थे जो धरोहर 
देश को 
छल रही है उसे 
सत्ता-शक्ति 
मोह देखो उसका 
अंधी बन स्वार्थ के हुई 
वह अधीन  
बिखर रहा है 
बंधुत्व का 
स्वप्न 
झुलस रहा है 
हिंद के दामन में 
प्रेम 
प्रकृति को रौंद रहे हैं  
दिन दहाड़े 
पग-पग पर हो रहा है
 भावनाओं का 
क़त्ल-ए-आम 
तुम देख रहे हो साहेब
 कितना बदल गया है 
इंसान |

©अनीता सैनी 

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2019

आम आदमी उस वक़्त बहुत ख़ास होता है



आज जब मैंने 
तुमको तड़पते हुए देखा 
शक्तिहीन अस्तित्त्वहीन 
निःशस्त्र और दीन 
आँखों में आँसू 
माथे पर सलवटें  
भविष्य को सजाने की चाह में 
वर्तमान को 
कुचलता हुआ देखा 
प्रत्येक पाँच वर्ष में 
तुम उल्लासित मन लिये डोलते हो 
वे तुम्हारे विचारों का 
 झाड़ने लगते जाले 
 जन-गण  के 
पोतने लगते हैं 
 नाख़ून 
नीले रंग की 
चुनावी स्याही से  
शब्दों का खोखला खेल 
शै-मात का झोल 
ग़रीबों को गंवार कह 
बड़प्पन को बुख़ार 
चंद सिक्कों का लिये 
डोलते हैं ख़ुमार  
सिसकियों में 
सिमटते नज़र आये तुम 
और तुम ख़ामोश ही  रहना 
टाँग देना ज़ुबा पर ताला 
तपते रहना ता-उम्र 
जलाना अलाव मेहनत का 
 ढालते  रहेंगे वे तुम्हें 
मनचाहे आकार में 
पहना देगें 
चोला आम आदमी का 
तब तुम समझना 
तुम आम आदमी हो  
और वे बहुत ख़ास  हैं  
परन्तु तुम जानते हो 
खास आदमी पता नहीं क्यों 
चुनाव के वक़्त आम बन जाता है 
और तुम ख़ास बन 
जलाना शक्ति की ज्वाला 
और एक-एक कर बीन लेना अपने 
सभी स्वप्न 
क्योंकि तुम आम आदमी हो |

© अनीता सैनी 

सोमवार, 21 अक्तूबर 2019

बदल रही थी रुख़ आब-ओ-हवा ज़माने की




आहत हुए कुछ अल्फ़ाज़ ज़माने की आब-ओ-हवा में,  
लिपटते रहे  हाथों  से  और  दिल  में उतर गये, 
उनमें में एक लफ़्ज़ था मुहब्बत, 
ज़ालिम ज़माना उसका साथ छोड़ गया, 
  मुक़द्दर से झगड़ता रहा ता-उम्र वह, 
 मक़ाम उसका बदल दिया, 
इंसान ने इंसानियत का छोड़ा लिबास, 
 हैवानियत का जामा पहनता गया |

अल्फ़ाज़ के पनीले पुनीत पात पर, 
एक और लफ़्ज़  बैठा था नाम था  वफ़ा, 
तृष्णा ने  किया उसको तार-तार, 
अब अस्तित्त्व उसका डोल गया, 
कभी फुसफुसाता था उर के साथ ,   
लुप्त हुआ दिल-ओ-जिगर इंसान का, 
  मर्म वफ़ाई का जहां में तलाशता रह गया |

अल्फ़ाज़ के अलबेलेपन में छिपा था, 
एक और लफ़्ज़ नाम था जुदाई,  
एहसासात की ज़ंजीरों में जकड़ा, 
बे-पर्दा-सा जग में बिखरता  गया,  
बदल रही थी रुख़, 
आब-ओ-हवा ज़माने की, 
क्रोध नागफनी-सा, 
मानव चित्त पर पनपता गया |

 अल्फ़ाज़  से बिछड़ एक कोने में छिपा बैठा था,   

एक और लफ़्ज़ नाम था आँसू, 
शबनम-सा लुढ़कता था कभी ,  
दिल की गहराइयों में रहता था गुम, 
ख़ौफ़-ए-जफ़ा से इतना हुआ ख़फ़ा, 
आँखों से ढलकना भूल गया |

© अनीता सैनी