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बुधवार, जून 22

नेह बाखळ रौ

 

टळ-टळ टळके पळसा पाणी 

नीम निमोळ्या पान झड्या।।

नैणां नेह बाखळ रौ उमड्य

दुबड़ हिवड़ा जाल गढ्या।।


बादळ मुठ्या जल सागर रौ 

जीवण सुपणा बौ रौ है।

रोहीड़ रा रूड़ा फूलड़ा

मनड़ा उठ्य हिलोरौ है।

कांगारोळ काळजड़ माथै

सुर-ताळ परवाण चड्या।।


 प्रीत च्यानणा जळे पंतगा

दिवलौ पथ रौ काज करे।

रात चाले ओढ्या अंधेरों

 ताख खूद पै नाज करे।

 समय सोता सिणधु स्यूं गहरा  

 जग नीति रौ पाठ पढ्या।।


ओल्यूं घुळै दूर दिसावरा 

 जोग रूळै ताज जड्यो।

चाँद-चाँदणी मांड-मांडणा 

धुरजी देख्य ठौड खड्यो।

गाँव गळी बदळा घर झूपां 

 पँख पसार पखेरू उड्या।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ

पळसा-पोळ के भीतर का स्थान, मुख्य द्वार के अंदर का स्थान 

निमोळ्या-नीम के फल 

बाखळ-घर के सामने खुली जगह,धोरीमोडा के बाहर का स्थान 

रूड़ा-रूखा 

कांगारोळ–कौवे के ज्यों चिल्लाना 

माथै-ऊपर 

सिणधु-  सिंधु 

च्यानणा-उजाला 

घुळै-घुलना,मिश्रित होना 

रूळै- मिटी में मिलना 

धुरजी- ध्रुव तारा 

ठौड-एक ही स्थान पर खड़े रहना 


राजस्थानी शब्द एवं उनके अर्थ मैं अपनी स्मृति के आधार पर लिखती हूँ।

बाखळ घर के सामने खुली जगह को कहते हैं। आज-कल न आँगन रहे न वह बचपन, उमड़ आया हृदय में वह घर, आँगन उम्मीद है आप भाव और भाषा को अवश्य समझेंगे।

जब कोई लिखता है तब वह उस कविता का बहुत ही वृहद रूप जीता है।  एक-एक भाव को शब्दों में गढ़ता है। उसे अनुवाद में कैसे समेटे? मुझे कुछ समय दे मैं प्रयास करुँगी।

शुक्रवार, जून 17

नेम प्लेट



मुख्य द्वार पर लगी

नेम प्लेट पर उसका नाम है 

परंतु वह उस घर में नहीं रहता

 माँ-बाप,पत्नी; बच्चे रहते हैं 

हाँ! रिश्तेदार भी आते-जाते हैं 

 कभी-कभार आता है वह भी 

नेम प्लेट पर लिखा नाम देखता है 

नाम उसे देखता है 

 दोनों एक-दूसरे को घूरते हैं 

कुछ समय पश्चात वह 

मन की आँखों से नाम स्पर्श करता है 

तब माँ कहती-

”तुम्हारा ही घर है, मैं तो बस रखवाली करती हूँ। "

पत्नी देखकर नज़रें चुरा लेती है 

और कहती है -

”एक नाम ही तो है जो आते-जाते टोकता है।”

वह स्वयं को विश्वास दिलाता है 

हाँ!  घर मेरा ही है

बैग में भरा सामान जगह खोजता है 

साथ ही फैलने के लिए आत्मविश्वास

ज्यों ही परायेपन की महक मिटती है 

फिर निकल पड़ता है उसी राह पर

सिमट जाना है सामान को उसी बैग में 

कोने, कोनो में सिमट जाते हैं 

 दीवारें खड़ी रहती हैं मौन  

 चप्पलें भी  करती हैं प्रश्न 

 नेम प्लेट पूछती है कौन ?

पहचानता क्यों नहीं कोई ?

डाकिया न दूधवाला और न ही अख़बारवाला 

कहते हैं - "सर मैम को बुला दीजिए।"

स्वयं को दिलाशा देता 

"हाँ! मेरा नाम चलता है न। "

सभी नाम से पहचानते हैं मुझे 

स्वयं पर व्यंग्य साधता

 हल्की मुस्कान के साथ 

 कहता-”घर तो मेरा ही है!

 हाँ! मेरा ही है! परंतु मैं हूँ कहाँ ?"


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, जून 12

धरती धोरा री



वीर भूमि धरती धोरा री

 सोन्य बरगो भळके रूप।

भाळ रै पैर घुँघरू बंध्या 

पाणी प्यासा कुआँ कूप।।


शूरवीर बेटा अण जाया

बेटियाँ जाई  प्रतिमाण।

देव लोक ईं गाथा गावै

मरु सो दूजो न बलवाण।

धीर-गंभीर  पाठ पढ़ावै

प्रीत छाया अणद अरूप।।


दादू-कबीर सबद सुणाया 

 वीराणे सूं उपजे बोल।

 मीरां प्रीत सुणावै भाटा

लगन कान्हा री अनमोल।

मरू धरा रौ कण-कण गावै

जीवण माटी रौ स्तूप।।


कुल-कुणबा काणयाँ सुणावै

रूँख जड्या है अभिमाण।

रेत समंदर साहस सीपी

हिया सोवै है सम्माण।

मोती मिणियाँ चमक चाँदणी 

सतरंगी-सी बरस धूप।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

बरगो-जैसा 

भाळ-हवा 

अणद अरूप-अत्यंत सुंदर, आनंद से भरा या आनंदित

 वीराणे-वीराना 

भाटा-पत्थर 

कुणबा -कुटुंब, बाल-बच्चे, परिवार।

काणयाँ-कहानियाँ 

रूँख-पेड़ 

सतरंगी-सात रंग 


गुरुवार, जून 9

आंखयां



आंखयां उणमादी ढोला 

ढ़ोळै  खारो पाणी।

मुंडो मोड़ै टेढ़ी चाल्ये 

खळके तीखी वाणी।।


काळै कोसां आया बादळ 

भाळा छेकड़ा छिपे।

रूंख उकसे पगडंडिया जद

गळयां बीजड़ा बिछे।

कै जाणे बरसती छाट्या

आखर हिवड़ा साणी।।


कुआँ पाळ मरवा री ओटा 

घट गढ़ती घड़ी-घड़ी।

बात सगळी जाणे जीवड़ो 

 अज सूखै खड़ी-खड़ी।

पीर पिछाणे टेम चाल री

ओल्यूं घाल्ये घाणी।।


बेगा-बेगा घर आइज्यो 

काळज रा पान झड़ै।

ओज्यूँ बिखरी धूप आँगणा 

लू दुपहरी रै गड़ै।

पून पूछे पुन्याई बैरण

 गीणावै जग जाणी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

उणमादी- मानसिक संभ्रांति, नटखट 

ढ़ोळै- ढुलना,गिराना 

खळके- घूमना 

काळै कोसां-बहुत दूर से 

भाळ -पून, हवा 

छेकड़ा-सुराख़

घट - घड़ा 

रूंख- पेड़ 

उकसे- बढ़ना

गळया- भीग हुआ 

छाट्या-छांट 

पाळ-जगत,कुएँ के ऊपर चारों तरफ़ बना हुआ चबूतरा

सगळी-सभी

मरवा -कुएँ के बुर्ज

सूखै-सूखे 

पिछाणे-पहचानना 

ओल्यूं-याद 

घाल्ये- करना 

घाणी-बार-बार घूमना 

बेगा-बेगा-जल्दी -जल्दी 

आइज्यो -आना 

काळज रा -कलेजा 

पान-पत्ता 

ओज्यूँ-फिर, दुबारा 

पूछे- हालचाल पूछना 

पुन्याई- पुण्य 

गीणावै-गिनवाना 

शनिवार, मई 28

माई! पंछी प्रेम पुगायो



माई! पंछी प्रेम पुगायो 

उण ही पीर सुणा बैठी।।

भाव बोल्या न बदळी गरजी

आभे देख गुणा बैठी।


 जैठ जावते रा भाग जळे

आंधी ख़्याळ रचावे है।

किण बोया कांटा कैरा रा

आँचळ आप छुड़ावे है।

नैण नीर दिण-रात बहाया 

बिकी ही बाड़ बणा बैठी।।


चाँद चाँदणी प्रीत लुटावे 

माथ चूम तकदीरा रा।

आखर आँगणा जदे उग्या 

 पात झरा तकबीरा रा।

ठाठ-बाठ रो पसर चानणो

 काळजड़ो भूणा बैठी।


  रूप ढुलै ढळते सूरज रो 

सिंझ्या थबकी दे दहरी।

  जग खेल रचावे नित न्यारा 

मार फावड़ा री गहरी।

लाडा भूखी हिये बसायो

जीवण बिरह बुणा बैठी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

पुगाना =देना 

उण = उसको 

सुणा = सुना 

बोल्या= बोलना 

बदळी =बदली

सिंझ्या=सांध्या 

आभे= अंबर 

जळाव=जलाव 

जावतो=जाना 

ख़्याळ=ख़्याल, चैतना 

किण= किन 

आँचळ=आँचल 

आँगणा=आँगन 

जद = जब 

 उग्या= उगना

तकबीर= प्रर्थना 

पसर= फैलना

चानणो=उजाला

काळजड़ो=कलेजा 

 भूणा= भूनना, जलना

ढुलै= ढुलना 

 ढळते= ढलना

फावड़ा= फावड़ा

बुधवार, मई 25

तुम मत बोलना !


ये जो सन्नाटा पसरा पड़ा है 

 इसकी परतें तुम मत खोलना।

विरह की रड़क थामे है मौन

 टूटना-रुठना तुम मत घोलना।

 मत बोलना! तुम मत बोलना!!


अव्यक्त नयन सोते में डूबा

जिह्वा का हठयोग रहा।

व्यक्त आजीवन एकदम उत्सर्ग

विधना का सुयोग रहा।

बैठ  छाँव में निरख ढोलना

 मत बोलना! तुम मत बोलना!!


व्यूह में उलझे अभिमन्यु के 

 अनकहे भाव  सुलगते हैं।

न कहने की पीड़ा को पीते

 कितने ही प्रश्न झुलसते हैं।

 जीवन तराजू में न तौलना 

 मत बोलना! तुम मत बोलना!!


कोरे पन्नों पर बिखेर बेल-बूँटे 

शीतल माटी गाँव गढ़े।

क़लम उकेरे तत्समता भावों की  

उजड़े चित्त की ठाँव पढ़े।

उस पथ पर पथिक तुन दोलना

मत बोलना! तुम मत बोलना!!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, मई 16

बुद्ध



निर्विकार के उठते हिलकोरे 

पग-पग पर करते प्रबुद्ध 

उर बहती प्रीत सरित 

ममता के पदचाप में बुद्ध।


श्वेत कपोत आलोक बिखेरे 

 मौन वाणी करुणा की शुद्ध 

बोधि-वृक्ष  बाँह फैलाए 

मानवता की छाप में बुद्ध।


मिलन-बिछोह न भेदे मन 

आकुलता संतोषी अबिरुद्ध 

दुःख दिगंबर भाव भरता 

पंछी के आलाप में बुद्ध।


हवा परतों में शील-प्रज्ञा

गीत कल्याणी गूँजे अनिरुद्ध 

मधु घुलता जन-जन हृदय में 

समता के हर जाप में बुद्ध।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, मई 12

विरह



समय का सोता जब 
धीरे-धीरे रीत रहा था 
मैंने नहीं लगाए मुहाने पर पत्थर
न ही मिट्टी गोंदकर लगाई 
भोर घुटनों के बल चलती 
दुपहरी दौड़ती 
साँझ फिर थककर बैठ जाती 
दिन सप्ताह, महीने और वर्ष
कालचक्र की यह क्रिया 
 स्वयं ही लटक जाती 
अलगनी पर सूखने 
स्वाभिमान का कलफ अकड़ता 
कि झाड़-फटकार कर
रख देती संदूक के एक कोने में
प्रेम के पड़ते सीले से पदचाप  
वह माँझे में लिपटा पंछी होता 
विरक्ति से उनमुख मुक्त  करता
मैं उसमें और उलझ जाती 
कौन समझाए उसे 
सहना मात्र ही तो था 
ज़िंदगी का शृंगार
विरह मुक्ति नहीं 
इंतज़ार का सेतु चाहता था।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शनिवार, मई 7

संकेत


यों ही अकारण, अकस्मात 

चैत्र-बैसाख महीने के अंबर में

दौड़ती बिजली का कौंधना

गरजते बादलों का झुंड में बैठ

बेतुकी बातों को तुक देते हुए

भेद-भाव भरी तुकबंदियाँ गढ़ना 

यही खोखलापन लीलता है

खेजड़ी के वृक्ष से सांगर

उनकी जगह उभरती गठानें 

खेजड़ी का  ठूँठ में बदलना 

शक्ति प्रदर्शन का अति विकृत रूप 

दरख़्त की छेकड़ से फूट-फूटकर बहना 

प्रकृति का असहनीय पीड़ा को

भोगी बन भोगते ही जाना 

संकेत हैं धरती की कोख में 

मानवता की पौध सूखने का।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'