बुधवार, 15 जुलाई 2020

गूँगे-बहरों की दुनिया


दुःख  हो या सुख 
दोनों ही इस दौर में थे अकेले।  
रोए तो स्वयं को 
सुनाने के लिए की दर्द भी है दर्द। 
हँसे भी तो स्वयं को
 बहलाने के लिए कि ख़ुशी भी है ख़ुशी। 

गधे हों या घोड़े 
 दोनों ही अस्तबल के थे मालिक। 
दोनों एक ही दाम पर बिकते
 ख़रीद-फ़रोख़्त भी थी जारी। 
ख़रीदार को भी सिर्फ़ और सिर्फ़ 
ख़्याल संख्या का था रखना। 

 गूँगे-बहरों की दुनिया में 
 चिल्लाने का अभिनय था जारी।  
कुछ की बिख़रती मेहनत डोली 
दर्द उनका बोल पड़ा। 
 अपनी आवाज़ पहचानी उन्होंने ने 
कदाचित वह भी झिझक गए  
सहमना ही गूँगापन था उनका। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 12 जुलाई 2020

धूप-सी दर्दभरी एक रेखा


बहुत देर अपलक हम ख़ामोशी से 
देखा करें एकटक उनके जीवन को। 
कंकड़-पत्थर कह उन्हें  फिर धीरे से कहें  
हाँ,लिख दी है जेठ में बरसती धूप को। 

पर्वत से अटल झुलसतें सुविचारों को 
 मिट्टी की मोहक ख़ुशबू को। 
 लिख दी है मन के कोने में मरती मानवता को 
 फिर लिख न सकेंगे मृत्यु के इस आलाप को। 

उनके जीवन को देख हम लिखा करेंगे 
धुँधली बस धुँधली-सी समय की एक रेखा। 
जो मूर्त स्मृतियों में बैठी स्वयं ही घट जाएगी 
नहीं घटेगी धूप-सी दर्दभरी एक रेखा। 

न घट पाई न मिट पाई संघर्षशील 
दर्द भरी शोषित शोषण की वह रेखा। 
आँखों से झलकती कलेजा में तड़पती 
मिट नहीं सकी समाज से भेदभरी वह रेखा। 

भाग्य संयोग सहज ही सब नहीं लिखता 
जीवन निर्वेद में है कुछ तो लिखता ही होगा। 
असुंदर अनिष्ट कहता मानव मानव को 
पथ प्रगति का कह दर्द भी रोता ही होगा। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

अकेलापन अभिशाप



वह ख़ुश थी,बहुत ही ख़ुश 
आँखों से झलकते पानी ने कहा। 
असीम आशीष से नवाज़ती रही 
लड़खड़ाती ज़बान कुछ शब्दों ने कहा।  

पुस्तक थमाई थी मैंने हाथ में उसके 
एक नब्ज़ से उसने एहसास को छू लिया। 
कहने को कुछ नहीं थी वह मेरी 
एक ही नज़र में  ज़िंदगी को छू लिया। 

परिवार एक पहेली समर्पण चाबी 
अनुभव की सौग़ात एक मुलाक़ात में थमा गई। 
पोंछ न सकी आँखों से पीड़ा उसकी 
 मन में लिए मलाल घर पर अपने आ गई। 

अकेलेपन की अलगनी में अटकी  सांसें 
जीवन के अंतिम पड़ाव का अनुभव करा गई। 
स्वाभिमान उसका समाज ने अहंकार कहा  
अपनों की बेरुख़ी से बूढ़ी देह कराह  गई। 

© अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 6 जुलाई 2020

सयानी सियासत


सयानी सियासत हद से निकल 
नगें पाँव दौड़ रही है सरहद की ओर।  
पैरों में बँधे हैं गुमान के घुँघुरु
खनक में मुग्ध हैं दिशाओं के छोर।  
नशा-सा छाया है नाम के उसका
परिवेश में गूँजता है शह-मात का शोर।   

मोहनी सूरत का मुखौटा,मंशा में है गांभीर्य 
शीश पर लालच के पिटारे का है भार।  
वाकचातुर्यता या शब्दों में मिश्री का है घोल 
ठगती मानव-मूल्य,करती क्लेश का भोर। 
भाषा,धर्म के नाम पर दिमाग़ से खेलती 
ज़हर भविष्य के पथ पर गहरा घोलती। 
ख़ामोशी में सिमटी क्यों मानवता है मौन ?
किसलय खिली हैं उपवन में रक्षा करेगा कौन ?

सफ़ेदपोशी के साथ आँख मिचोली के खेल में 
सेवानिवृत्त सैनिकों को तृष्णा में है उतारा।  
सरहद से थके-हारों  की धूमिल करती छवि 
क्लेश की कालिख पोतते वर्दी पर यह रवि। 
बिकाऊ मीडिया को कह हुड़दंग है मचाती 
सियासत के गलियारे से सीमा पर जा बैठी। 
सेना के सीने पर सियासती ज़हर का बखेरा 
सैनिकों के कफ़न पर कैसा नक़्शा है उकेरा?

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

सरहद



 स्वयं का नाम सुना होगा सरहद ने जब
  मोरनी-सी मन ही मन हर्षाई होगी।
अस्तित्त्व अदृश्य पानी की परत-सा पाया
भाग्य थाम अँजुली में इतराई होगी। 

मंशा मानव की झलकी होगी आँखों में जब
आँचल में लिपटी अपने बहुत रोई होगी।
आँसू पोंछें होंगे जब सैनिक ने उसके
प्रीत में बावरी दिन-रैन न सोई होगी। 

क़िस्से कहे होंगे सैनिक ने घर के अपने
सीने से लगकर अश्रु दोनों ने बहाए होंगे ।
कंकड़-पत्थर संग आघात सीसे-सा पाया
मटमैले स्वप्न दोनों ने नैनों में धोए होंगे।
 

अनीता सैनी 'दीप्ति '

सोमवार, 29 जून 2020

वह देह से एक औरत थी

[चित्र साभार : गूगल ]                             
   वह देह से एक औरत थी              
उसने कहा पत्नी है मेरी 
वह बच्चे-सी मासूम थी 
उसने कहा बेअक्ल है यह
अब वह स्वयं को तरासने लगी
उसने उसे रिश्तों से ठग लिया 
वह मेहनत की भट्टी में तपने लगी 
उसने कर्म की आँच लगाई 
 वह कुंदन-सी निखरने लगी 
 वह उसकी आभा को सह न सका 
उसकी अमूल्यता को आंक न सका 
वह सीपी के अनमोल मोती-सी थी 
अब वह उसके तेज को मिटाने लगा 
उसने उसे उसी के विरुद्ध किया
औरत को औरत की दुश्मन कह दिया
देखते ही देखते उसने उसके हाथ में 
 मूर्खता का प्रमाण-पत्र थमा दिया 
उनमें से एक की आँखें बरस गईं   
उसे औरतानापन कह पीटा गया
वहाँ सभी पुरुष के लिबास में थे 
मैंने भी अपने अंदर की औरत को 
आहिस्ता-आहिस्ता ख़ामोश किया 
  पूर्णरुप से स्वयं का जामा बदला 
उस औरत को मिटते हुए देखने लगी |

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 25 जून 2020

एक चिट्ठी वर्तमान के नाम

                                           
समय की दीवार पर दरारें पड़ चुकीं थीं
सिमटने लगा था जन-जीवन
धीरे-धीरे इंसान अपना संयम खो रहा था 
  मानव अपने हाथों निर्धारित 
किए समय को नकार चुका था
तभी उसने देखा अतीत कराह रहा है 
उसकी आँखें धँस चुकीं थीं 
चिंता से उसका चेहरा नीला पड़ चुका था   
 एक कोने में अंतिम सांसें गिन रहा था वह
 उसके ललाट पर चिंता थी 
उस चिंता में  छिपे थे कुछ जीवनोपयोगी विचार 
जो वो वर्तमान को देना चाहता था 
 वह बार-बार वर्तमान से आग्रह करता
अपनी चारपाई के पास बैठने का 
परंतु वर्तमान की गोद में भविष्य था
जैसे ही वर्तमान बैठना चाहता भविष्य रोने लगता
भविष्य के रोने से वर्तमान विचलित हो उठता 
वह कभी अतीत से कुछ सीख नहीं पाया
  देखते ही देखते एक दिन अतीत ने
 जीवन की अंतिम सांस ली
उसी दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी 
उसी बरसात में अतीत भी बह गया
उसके हाथ में एक चिट्ठी थी
 वह चिट्ठी वर्तमान के लिए थी
वर्तमान एक ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ रहा था 
उसे भविष्य की परवरिश की फ़िक्र सता रही थी
 वह अतीत की वह चिट्ठी कभी पढ़ ही नहीं पाया
 उसे वहीं समय की दीवार में छिपा दिया
पता ही नहीं चला कब वर्तमान 
अतीत की शैया पर लेट गया 
 समय का दोहराव हुआ,
वर्तमान भविष्य को गोद में लिए वहीं खड़ा था 
 अब उसे अतीत की कही बात याद आने लगी 
 परंतु उसके पास वह  समझ नहीं थी
 जो उससे पहले वाले अतीत के पास थी 
 उसे चिट्ठी याद आयी जो वहीं 
समय की दीवार में दबी थी। 
 उसने कँपकपाते होठों से वह चिठ्ठी पढ़ी -

प्रिय वर्तमान,

           जब यह चिट्ठी तुम्हारे हाथ में होगी,
मैं तुमसे बहुत दूर जा चुका होऊँगा
 तुम्हारे पास उस समय इतना वक़्त भी नहीं होगा 
कि तुम मेरे बारे में  विचार कर सको 
तुम्हें भविष्य की फ़िक्र है, होनी भी चाहिए
 मैं देख रहा हूँ 
तुम्हारी इच्छाएँ भविष्य को लेकर तुम से द्वंद्व कर रहीं हैं
भविष्य को निखारने की चाह तुम्हें भटकाव का रास्ता न दिखा दे
मैं यह नहीं कहता कि तुम मुझे सीने से लगाए रखो
 परंतु कभी-कभार साइड मिरर समझ देखना भी ज़रुरी होता 
भविष्य को गिरने से बचाने के लिए
मुझे आज भी याद हैं
 जब मैं स्वयं की पीठ थपथपाया करता था
छोटी-छोटी ख़ुशियों पर मुस्कुराया करता था 
मेरी राह में भी अनगिनत रोड़े थे
 परंतु मैंने विवेक नहीं खोया
कुछ परिस्थितियाँ संयोग से बनतीं हैं
 कुछ हम स्वयं बनाते हैं 
आगे बढ़ने की चाह किसकी नहीं होती 
परंतु मैं अपना दायरा कभी नहीं भूला 
प्रभाव को नहीं गुणवान को दोस्त बनाया करता था 
अमेरिका,ब्रिटेन बुरे नहीं परंतु मैंने रुस से हाथ मिलाया था 
 अंतिम समय में 
मैं तुमसे कुछ कहना चाहता था 
तुम कौनसे नशे में थे!
तुमने करतूत चीन की भुलाई क्यों ?
गलवान घाटी को लहू से नहलाया क्यों ?
 मैं नहीं भविष्य यही प्रश्न दोहराएगा
मेरे प्रश्न पर एक और प्रश्नचिह्न लगाएगा।

तुम्हारा अतीत 
25/06/2020

©अनीता सैनी 'दीप्ति' 

मंगलवार, 23 जून 2020

दोहन दिमाग़ का



                                       

स्वयं की सार्थकता दर्शाते 
पंखविहीन उड़ना चाहते ऐसे चितेरे हैं।   
दुविधा में फिरते मारे-मारे   
देख रुखी-सूखी डालें समय की 
सभ्यता के जंगल में विचरते
  बदलते लिबास ऐसे बहुरुपिये बहुतेरे हैं। 

जीवन-वृक्ष की काटते टहनियाँ 
 जतन से बीनते स्वप्नरुपी डंठल। 
प्रत्येक डंठल पर लाचारी जताते  
फिर भी आज्ञा कह एकत्रित करते। 
उम्र की टोकरी अकारण  ढोते  
प्रगति की पवन का पीटते कोरा ढिंढोरा हैं।  

 संकुचित हो वे आड़े-तिरछे चलते  
निगाह चुराए कुछ भयभीत-से हैं। 
फुसफुसाहट अक्षर नवसाक्षर की-सी 
उलझन लिए दबे स्वर में कलरव-से गा उठे। 
मायावी लताओं से गूँथी व्यवहार की टहनियाँ 
प्रकृति का नहीं दोहन मानव दिमाग़ का होना है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 19 जून 2020

क्षणभंगुर नहीं थे वे



सत्ता की भूख से 
भरी थी वह मिट्टी 
तब खिले थे 
परोपकार के सुंदर सुमन। 
सेकत गढ़ती उन्हें 
हरसिंगार स्वरुप में। 
विलक्षण प्रभाव देख 
 दहलती थी दुनिया। 
क्षणभंगुर नहीं थे वे 
अनंत काल तक 
हृदय पर शीतल पवन-सा
 विचरते विचार थे।  
भाव-गांभीर्य का उन्माद 
 सभाचातुर्य की लहर 
स्वयं में विशिष्ट 
और अविस्मरणीय थे वे।   
जीवन उनका 
पेड़ की लुगदी होना नहीं था।  
सत वृक्ष के पुंकेशर से गढ़े
 सत्य के पुष्प थे वे। 
राजनीति के दोहरे धरातल पर खिली 
दुर्लभ मंजरी थी उसने कहा था मुझे। 
विचारों की गंध से 
ये विहग उसके इर्द-गिर्द विचरते। 
सुरक्षा का संभालते थे दायित्त्व। 
उसके तेज को 
धारण करते थे आँखों में।  
आज एकाएक 
करुण स्वर में वे पुकारते दिखे। 
बर्फ़ की शिला में सुरक्षित जीवित थे
आज भी वे जीवनमूल्य। 
कलाम जी अटल जी के जैसी देह गढ़ते 
सत्ता की मिट्टी पर खिलते हैं 
मानवता की मोहक महक लिए। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'