शनिवार, 4 अप्रैल 2020

देश नहीं पहले-सा मेरा



पतित हुआ लोगों का चेहरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।
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 सुखद नहीं पेड़ों की छाया,  
सबके मन में माया-माया,
लालच ने सबको है घेरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।

मन में बहुत निराशा भरते
ओछे यहाँ विचार विचरते 
उजड़ रहा खुशियों का डेरा।
देश नहीं पहले-सा मेरा।

पुतली सिकुड़ी मानवता की,
जीत हो रही दानवता की,
अंधकार का हुआ बसेरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।

घृणा बसी है घर-आँगन में, 
प्रेम बहिष्कृत हुआ चमन में,
गली में घूमे द्वेष लुटेरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।

तरु जल को लाचार हो गये,
पैने अत्याचार हो गये,
छाया है अँधियार घनेरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।

चीत्कार करते हैं दादुर, 
आत्मदाह को मन है आतुर,
दूर-दूर तक नहीं सवेरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।

चातक कितना है बेचारा,
सूखी है सरिता की धारा,
जीवन आज नहीं है चेरा, 
देश नहीं पहले-सा मेरा।

© अनीता सैनी 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

साहित्यिक उपनाम



"विज्ञात नवगीत माला" के संस्थापक 
  आदरणीय श्री संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा रामनवमी के शुभ अवसर पर मुझे साहित्यिक उपनाम 'दीप्ति' 
प्रदान करते हुए मेरे सृजन पर एक दोहे के माध्यम से कहा है-

अनिता सैनी 'दीप्ति'की, बने लेखनी दीप।  

चिंतन सागर सा गहरा,प्राप्त करे हर सीप

साहित्यिक उपनाम जब किसी लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार द्वारा दिया जाता है 

तब नाम पाने वाले को असीम ऊर्जा और मनोबल मिलता है
 साथ ही सृजन के प्रति गंभीर रुझान भी बढ़ता है। 

बहुत ख़ुशी हुई 'दीप्ति' उपनाम पाकर। 
इस सम्मान  के लिए मैं आदरणीय संजय कौशिक "विज्ञात "जी को
 हृदय तल से आभार व्यक्त करती हूँ।
अपना स्नेह और आशीर्वाद बनाये रखें। 
आदरणीय संजय कौशिक "विज्ञात "जी सर का सादर आभार। 

अनीता सैनी 'दीप्ति'

कहे वैदेही क्यों जलाया?


जलती देह नारी की विधाता, 
 क्रूर  निर्मम प्राणी  रचाया ।
 क्रोध द्वेष दंभ हृदय में इसके,
 क्यों अगन तिक्त भार बढ़ाया ।

सृजन नारी का सृजित किया है,
 ममत्त्व वसुधा पर लावन को।
दुष्ट अधर्मी मानव जो पापी,
आकुलता सिद्धी पावन को।
भद्र भाव का करता वो नाटक
कोमलांगी को है जलाया ।‌।

जीवन के अधूरे अर्थ जीती,
सार पूर्णता का समझाती ‌।
क्षणभंगुर जीवन भी है बोती, 
हर राह पर जूझती  रहती ।
निस्वार्थ अनल में जलती रहती
तपती काया को सहलाया ।।

कोमल सपने  बुनती जीवन में,
समझ सका ना इसको कोई‌।
नारायणी  गंगजल-सी शीतल,
 देख  चाँदनी भी हर्षाई।
सम्मान स्नेह सब अर्पन करती,
कहे  वैदेही  क्यों जलाया ।।

© अनीता सैनी

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

वे आँखें


                                              

दौड़तीं हैं वे परछाइयाँ,  
भूख से व्याकुल,  
 गाँव से शहर की ओर, 
और उसी भूख को,  
छिपाती हैं वे ज़िंदगीभर,  
अपनों के लिये ।

 बुनतीं हैं वे अहर्निश स्वप्न, 
अधखुली आँखों से,  
संग सँजोतीं हैं एहसास,  
कि ज़िंदा हैं वे परछाइयाँ,   
फिर अस्तित्त्व में क्यों नहीं?

समय के बहाव में वही आँखें, 
प्रश्नकर रहीं थीं स्वयं से, 
बिखरकर उठ खड़े होने के इरादे से,  
कि वे अपने ही घर में दौड़ क्यों रहीं हैं? 

वे आँखें प्रश्न कर रही हैं,  
अपने ही निर्णय से,  
पैरों में पड़े ज़िंदगी के छालों से, 
मन में उठती बेचैनी से, 
उस बेचैनी में सिमटी पीड़ा से।

वे आँखें, 
अश्रु नहीं बहा रही थीं, 
बस ख़ामोश थीं, 
कुछ विचलित-सी थीं और,  
देख रहीं थीं,  
एक ओर, 
ख़ाली करवाते मकान, 
दूसरी ओर,  
देख रहीं थीं कुछ देर बाद, 
 बनते हुए उन्हीं, 
आदमियों को इंसान !

© अनीता सैनी 

मंगलवार, 31 मार्च 2020

मानव मन अवसाद न कर


खिल उठेगा आँचल धरा का, 
मानव मन अब अवसाद न कर, 
हुओर प्रेम पुष्प खिलेंगे, 
समय साथ है आशा तू धर। 

 पतझर पात विटप से झड़ते, 
बसँत नवाँकुर खिल आएगा, 
खुशहाली भारत में होगी  
गुलमोहर-सा खिल जाएगा, 
बीतेगा ये पल भी भारी,  
संयम और  संतोष  तू  वर। 

 धरा-नभ का साथ है सुंदर 
 जीवन आधार बताते हैं 
कर्म कारवाँ  साथ चलेगा, 
मिलकर के प्रीत सँजोते हैं,  
पनीली चाहत थामे काल ,  
विवेक मुकुट मस्तिष्क पर धर। 

खिलेंगे किसलय सजा बँधुत्त्व 
मोती नैनों के ढ़ोते हैं, 
 स्नेह मकरंद बन झर जाए,
 अंतरमन को समझाते हैं,  
 विनाश रुप के  काले मेघ,
  धरा से विधाता विपदा हर । 
©अनीता सैनी 

सोमवार, 30 मार्च 2020

अभिसारिका



प्रीत व्यग्र हो कहे राधिका, 
घूँघट ओट याद हर्षाती ।
मुँह फेरुँ तो मिले कान्हाई, 
जीवन मझधारे तरसाती ।।

साँझ-विहान गुँजे अभिलाषा, 
मनमोहिनी- मिलन को आयी। 
प्रिये की छवि उतरी नयन में, 
अश्रुमाला गिर हिय समायी। 
जलती पीड़ा दीप माल-सी,  
यादें माधव की रूलाती ।।

बारंबार जलाती बैरन, 
भेद  कँगन से कह-कह जाती। 
भूली-बिसरी सुध जीवन की, 
समय सिंधु में गोते खाती।  
हरसिंगार सी  पावन प्रीत, 
अभिसारिका बन के लुभाती ।।

नीरव पीड़ा है अदृश्य सी 
याद  रेख की जलती  ज्वाला 
भूली रूप फूल की डाली 
लूट विभा विदेह की बाला 
करुण पुकार हृदय आँगन की 
 बुलबुल- भांति तड़पती रहती। 

©अनीता सैनी 

बुधवार, 25 मार्च 2020

साँसें पूछ रहीं हाल प्रिये

मूरत मन की  पूछ रही है, 
नयनों से लख-लख प्रश्न प्रिये,
 जीवन तुझपर वार दिया है,
साँसें पूछ रहीं हाल प्रिये। 

समय निगोड़ा हार न माने,
पुरवाई उड़ती उलझन में,
पल-पल पूछूँ हाल उसे मैं,
नटखट उलझाता रुनझुन में
कुशल संदेश पात पर लिख दो,
चंचल चित्त अति व्याकुल प्रिये।। 

भाव रिक्त कहता मन जोगी,  
नितांत शून्य आंसू शृंगार,
भाव की माला गूँथे स्वप्न,
चेतन में बिखरे बारबार,
अवचेतन सँग गूँथ रहीं हूँ, 
कैसा जीवन जंजाल प्रिये।।

सीमाहीन क्षितिज-सी साँसें,
तिनका-तिनका सौंप रही हूँ,
आकुल उड़ान चाह मिलन की,
भाव-शृंखला भूल रही हूँ,
सुध बुद्ध भूली प्रिय राधिका, 
कैसी समय की ये चाल प्रिये।।

© अनीता सैनी

मंगलवार, 24 मार्च 2020

महावन

महावन में दौड़ते देखे, 
अनगिनत 
जाति-धर्म और,
मैं-मेरे के
 अस्तित्त्वविहीन तरु, 
सरोवर के 
किनारे सहमी,
 खड़ी मैं सुनती रही, 
निर्बोध 
बालिका की तरह, 
उनकी चीख़ें। 

आख़िर ठिठककर, 
 बैठ ही गयी,
अर्जुन वृक्ष के नीचे मैं भी,
देख रही थी ख़ामोशी से,
शहीद-दिवस पर, 
शहीदों का कारवाँ,  
सुन रही थी, 
पति-पिता को पुकारतीं, 
उनकी चीख़ें।  

देख-सुन रही थी 
ढँग जीने का,
बुद्धिमान वृक्षों की, 
बुद्धिमानी का,
भविष्य से बेख़बर, 
सींचते हैं 
सभ्य-सुसंस्कृत महावृक्ष  
 नक्सली नाम की, 
कँटीली झाड़ियाँ,
उन झाड़ियों में उलझे दामन,
उनकी चीख़ें। 

© अनीता सैनी 

रविवार, 22 मार्च 2020

गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न


गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न, 
प्रीत अवनी पर है अवदात ।
कज्जल कुँज में झूलता जीवन,  
समय सागर की है  सौगात।। 

 लहराती है नभ में पहन दुकूल ,
शीतल बयार संग प्रीत पली ।
उमड़ी धरा पर सुधी मानव की ,
खिला नव-अँकुर धरणी चली ।

छिपे तम में  मन के सुंदर भाव 
चाहता है एकाकी बरसात ।
गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न, 
प्रीत अवनी पर है अवदात ।

करुणामयी  अनुराग हृदय भरा ,
पूनम  चाँदनी मधुर पराग झरा ।
अनंत अंबर खोजे चित्त चैन, 
झरते तारे का प्रतिबिंब ठहरा ।

समय सागर पर ठिठुरी छाया, 
जीवन प्रलय है झँझावत ।
गूँथे तारिका नित सुंदर स्वप्न, 
प्रीत अवनी पर है अवदात ।

© अनीता सैनी