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बुधवार, नवंबर 9

स्त्री भाषा



 

परग्रही की भांति

धरती पर नहीं समझी जाती

स्त्री की भाषा

भविष्य की संभावनाओं से परे 

किलकारी की गूँज के साथ ही 

बिखर जाते हैं उसके पिता के सपने

बहते आँसुओं के साथ 

सूखने लगता है

माँ की छाती का दूध

बेटी के बोझ से ज़मीन में एक हाथ 

धँस जाती हैं उनकी चारपाई 

दाई की फूटती नाराज़गी 

दायित्व से मुँह मोड़ता परिवार

माँ कोसने लगती हैं 

 अपनी कोख को 

उसके हिस्से की ज़मीन के साथ

छीन ली जाती है भाषा भी 

चुप्पी में भर दिए जाते हैं

मन-मुताबिक़ शब्द 

सुख-दुख की परिभाषा परिवर्तित कर  

जीभ काटकर

 रख दी जाती है उसकी हथेली पर 

चीख़ने-चिल्लाने के स्वर में उपजे

शब्दों के अर्थ बदल दिए जाते हैं

ता-उम्र  ढोई जाती है उनकी भाषा

एक-तरफ़ा प्रेम की तरह।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अक्तूबर 29

मेरी दहलीज़ पर



भोर का बालपन

घुटनों के बल चलकर आया था

उस रोज़ मेरी दहलीज़ पर

गोखों से झाँकतीं रश्मियाँ

ममता की फूटती कोंपलें

उसकने लगी थीं मेरी हथेली पर

बदलाव की उस घड़ी में

छुप गया था चाँदबादलों की ओट में

सांसें ठहर गई थीं हवा की

बदल गया था

भावों के साथ मेरी देह का रंग

मैं कोमल से संवेदनशील

और पत्नी से माँ बन गई।

 

आँचल से लिपटी रातें सीली-सी रहतीं

मेरे दिन दौड़ने लगे थे

उँगलियाँ बदलने का खेल खेलते पहर

वे दिन-रात मापने लगे

सूरज का तेज विचारों में भरता

मेरा प्रतिबिम्ब अंबर में चमकने लगा

नूर निखरता भावनाओं का

मैं शीतल चाँदनी-सी झरती रही

बदल गया था

भावों के साथ मेरी देह का रंग

मैं कोमल से संवेदनशील

और पत्नी से माँ बन गई। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


बुधवार, अक्तूबर 26

काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर




मेरी मानस पुत्री के जन्म पर मेरी माँ उतनी ही ख़ुश है जितनी पहली बार वह नानी बनने पर थी। क़लम के स्पर्श मात्र से झरता है प्रेम अब हम दोनों के बीच। माँ के हृदय में उठती हैं हिलोरें भावों कीं जो मेरी क़लम में शब्द बनकर उतर आते हैं।

आज मेरे नवीनतम काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर Bodhi Prakashan जयपुर के कार्यालय में अपने-अपने क्षेत्र के स्वनामधन्य महानुभावों
श्री माया मृग जी (संचालक:बोधि प्रकाशन, जयपुर )

श्री  M.P. Saini 
(वरिष्ठ अधिवक्ता व पूर्व अध्यक्ष सैनी समाज, जयपुर 
अध्यक्ष: सिविल राइट्स सोसायिटी, जयपुर)

श्री डॉ.कमल सिंह जी (प्राचार्य एवं वरिष्ठ शिक्षाविद, जयपुर)
एवं मेरे प्रिय पुत्र-पुत्री
का सानिध्य, स्नेह, उत्साहवर्धन, आशीर्वाद व मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
यह ख़ुशी आपके साथ साझा करते हुए साहित्यिक जवाबदेही का एहसास होते हुए मन प्रफुल्लित है।
पुस्तक के आकार लेने तक की प्रक्रिया में शामिल समस्त महानुभावों का हृदय से आभार।

कविता संग्रह 'टोह'  प्राप्त करने हेतु अमेज़ॉन लिंक-




@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, अक्तूबर 23

बिरला गान



समय ने सफ़ाई से छला  

उस सरल-हृदय ने मान लिया 

कि गृहस्थ औरतों का क़लम पर 

दूर-दूर तक कोई अधिकार नहीं।


अतृप्त निगाहों से घूरती किताबों को

ज्यों ज़िंदगी ने सारे अनसुलझे रहस्य

 स्याही में लिप इन्हीं पन्नों में छुपाए हैं

 उसकी ताक़त से रू-ब-रू

 क़लम सहेजकर रखती है।


क़लम के अपमान पर खीझती 

सीले भावों की बदरी-सी बरसती  

उसके स्पर्श मात्र से झरता प्रेम

वह वियोगिनी-सी  तड़प उठती है।


 पंन्नों पर उँगली घुमाती

एक-एक पंक्ति को स्पर्शकर

बातें कविता-कहानियों-सी गढ़ती 

शब्द नहीं

आँखें बंदकर अनगढ़ भावों को पढ़ती है।


 अनपढ़ नहीं है वह 

गृहस्थी की उलझनों में उलझी 

 शब्दों से मेल-जोल कम रखती है 

 उनसे जान-पहचान का अभाव 

बढ़ती दूरियों से बेचैनी में सिमटी 

आत्म  छटपटाहट से लड़ती है।


शब्दों को न पहचानना खलता है उसे

आत्मविश्वास की उठती हिलोरों संग

 साँझ की लालिमा-सी 

भोर का उजाला लिए कहती है-

 लिखती है मेरी बेटी

क्या लिखती है वह नहीं जानती

जानती है बस इतना कि लिखती है मेरी बेटी

पहाड़-सी कमी

 छोटे से वाक्य में पूर्णकर लेती है माँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, अक्तूबर 9

मैं जब तुम बनकर जीती हूँ


मैं जब, तुम बनकर जीती हूँ

तब मैं जी रही होती हूँ आकाश

हृदय पर उगते उन्मुक्त भाव

धूप के टुकड़ों से सींचती 

भोर के क़दमों की आहट पर 

क्षितिज-सा समर्पण जी रही होती हूँ 


मैं जब तुम बनकर जीती हूँ

तब मैं लिख रही होती हूँ पहाड़

दरारों से झाँकती सदियाँ 

पाषाण के फूटते बोल 

जीवन काढ़े का अनुभव 

परिवर्तन पी रही होती हूँ


जब मैं तुम बनकर जीती हूँ

तब मैं, मैं कहाँ रहती हूँ

बिखर रही होती हूँ काग़ज़ पर

भावों की परछाई शब्दों में ढलती 

उस वक़्त कविता-कहानियों का 

अनकहा ज़िक्र जी रही होती हूँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, सितंबर 24

दायित्व


मुझे सुखाया जा रहा है

सड़क के उस पार खड़े वृक्ष की  तरह

ठूँठ पसंद हैं इन्हें

वृक्ष नहीं!

वृक्ष विद्रोह करते हैं!

जो इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं

समय शांत दिखता है

परंतु विद्रोही है 

इसका स्वयं पर अंकुश नहीं है 

तुम्हारी तरह, उसने कहा।

उसकी आँखों से टपकते

आँसुओं की स्याही से भीगा हृदय 

उसी पल कविता मन पड़ी थी मेरे 

सिसकते भावों को ढाँढ़स बँधाया

कुछ पल उसका दर्द जिया

उसकी जगह

खड़े होने की हिम्मत नहीं थी मुझ में 

मैंने ख़ुद से कहा-

मैं अति संवेदनशील हूँ!

और अगले ही पल

मैंने अपना दायित्वपूर्ण किया!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, सितंबर 15

भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई


सांसों से उलझते भाव 

जीभ से लिपटते स्वर

होंठों का कंपन 

समय की कोख में सदियों ठहरे 

कितनी ही बोलियों ने गर्भ बदले 

असंख्य चोटें खाईं 

अभावों को भोग 

भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई 

अथाह गहराई हृदय की अकुलाहट 

हवा में तैरते मछलियों से शब्द 

एक-एक शब्द में प्राण फूँके 

टहलता जीवन, जीवन जो

स्वयं कहानी कहता है अपनी 

कहता है-

विरासत के भोगियों !

प्रेम है मुझसे!

तब ढूँढ़ लो उस ठठेरे को

भोगी जिसने प्रथम शब्द की प्रसव-पीड़ा 

गढ़ा जिसने पहला शब्द

ऊँ शब्द में पुकार 

माँ शब्द में दुनिया 

पिता शब्द में छाँव गढ़ी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, सितंबर 13

कर्तव्य पथ



उनके लिए घर नहीं बना?

वह घर पर नहीं रह सकता ?

मैंने कुएँ से पूछा, उसने भी यही कहा!

उनके लिए घर नहीं बना

वह घर पर नहीं रह सकता 

सदियों से कुआँ ऐसा ही बोलता आया है

माँ ने कहा -

घर पर रहने से नाकारा, निकम्मा

होने की मुहर लगा दी जाती है 

वह ठप्पा उसे बहुत चुभता है 

चुभन से काया पर फफोले पड़ जाते हैं

जिससे उसे कोढ़ का आभास होता है

तू जानती है न?

कोढ़ी मरीज़ से सब दूर भागते हैं!

समाज से कटकर

वह जीवित नहीं रह सकता 

 टूटने-रूठने, आँखों में पानी भरने के 

किस गुनाह पर पता नहीं

परंतु ऐसे अधिकतर अधिकार

उससे छीन लिए गए हैं।

माँ की हाँ में 

गर्दन नहीं झुकाना चाहती थी 

स्वतः झुक गई

एक स्मृति के साथ 

एक बार उसने कहा था -

पंद्रह लोग गए थे हम 

दस सफ़र में छूट गए

पाँचो के नाम दिल्ली में लिखें हैं 

तब वह टूटना चाहता था, नहीं टूटा 

घर पर रुकना चाहता था, नहीं रुका!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, सितंबर 1

स्वेटर



” औरत हो! कभी अपने हृदय में झाँककर

अपने अंदर की औरत से भी मिल लिया करो 

पूछ लिया करो! दुख-दर्द उसके भी।”


कहते हुए-

उसांस के साथ हाथ बढ़ाएँ 

 और सीने से लगा लिया।


कुछ समय पश्चात चुपचाप उठकर चला गया।

कहते हुए-

”ख़याल रखना, जल्दी मिलते हैं।”


वह नहीं बोलता कभी

आँखें ही बोलती हैं उसकी

 एक छोर भी न पकड़ा और 

वर्षों से बुना

शिकायतों का स्वेटर एक पल में उधेड़ गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'