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सोमवार, जुलाई 25

दोहे



1.बैरागी री ओढ़णी,

    सजै सावणा साथ।

    डग डागळा चार भरै,

    पकडे कजरी हाथ।।


2. पथ री पीड़ा कुण पढ़े,

   लुळ-लुळ  चालै आप।

  भाटा जद आवै पगां,

    मन पीड़ावै धाप ।।


3.आभै आँगणा झुमती,

      बुणे बादळी जाल। 

    गाज गिरावै काळजौ,

     सुथरी चालै-चाल ।।


4.  छज्जे माथे मोरियो,

   बुणे सुखां री छाँव।

  सूत करम रौ कातता, 

   छळे समै रौ दाँव।।


5.धीर धरम धीमे चले,

   गीत गावता मौण।

  घणा लुभावै चालता, 

   होवै तिसणा गौण।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, जुलाई 22

कैसी हवा बुन रहे हो साहेब?


”साहेब!

मख़ौल उड़ाना नहीं भूले।"

कहते हुए-

माँओं ने दुधमुँहे बच्चों की आँखों से 

काजल से सने स्वप्न पोंछे 

पिताओं ने भाईचारे का खपरैल तोड़ा 

ये देख बुज़ुर्गों ने भी चुप्पी साधी  

गाय की पहली रोटी छीनी 

तो कहीं कौवों की मुंडेर

किसान का कलेवा छूटा तो 

वहीं हल ठहर-ठहरकर चलने लगा 

अभावग्रस्त संपन्नता को ताकते 

 सभ्यता के इस दौर में 

संभ्रांतों  की वृद्धि में इज़ाफ़ा  हुआ

शब्द, विचारो में

वर्तमान निखर कर बाहर आया 

मुँह फेरने की नई रीत चल पड़ी 

"भव्यता का स्वाद क्या चखा साहेब!

घर की नींव न देखी महलों के नक़्शे बना दिए!"

कहते हुए-

फिर समय झुँझलाया 

और सूखे पत्तों-सा झड़ने लगा 

धैर्य आशाएँ टाँकता-टाँकता खो चुका विवेक 

जवान काया कॉम्पिटिशन के मान पर

कुढ़-कुढ़कर टूटती है 

गीली लकड़ी-कंडे भी भीगे-से

मिट्टी का चूल्हा मिट्टी की हांडी 

कैसी हवा बुन रहे हो साहेब?

लोग जीवन जीना भूलकर

चने की दाल-से धुएँ में पकने लगे हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


रविवार, जुलाई 17

सैनिकों की बेटियाँ



सैनिकों की बेटियाँ

पिता के स्नेह की परिभाषा 

माँ के शब्दों में पढ़ती हैं।

भावों से पिता शब्द तराशतीं 

 पलक झपकते ही बड़ी हो जाती हैं। 


पिता शब्द में रंग भरतीं 

माँ को सँवारतीं 

स्वप्न के बेल-बूँटों को स्वतः सींचतीं 

टूटने और रूठने से परे वे 

न जाने कब सैनिक बन जाती हैं। 


बादलों की टोह लेतीं 

धूप-छाँव के संगम में पलीं वल्लरियाँ 

रश्मियों-सी निखर जाती हैं। 

हृदय-भीत पर मिट्टी का लेप लगातीं 

न जाने कब घर का स्तंभ बन जाती हैं। 


जटायू हूँ मैं 

कह काल के रावण को डरातीं 

छोटे जूतों में बढ़ते पैरों को छिपातीं 

माँ की ढाल बनते-बनते 

न जाने कब पिता की परछाई बन जाती हैं। 

सैनिकों की बेटियाँ

 पलक झपकते ही बड़ी हो जाती हैं। 



@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, जुलाई 14

सिरजणहार



राम-रमौवळ खग री वाणी 

माणस मोती जूणा है।।

पीड़ा सहे सीप-सी स्रिस्टा

टेम घड़ी री हूणा है।।


रास रचावै सोनल किरणां

डिगै नहीं दोपहरा ईं।

कोनी जाणै लाण रूसणों

तड़के उठे सबेरा ईं।

बादळियै री छेड़े छांटां

सूरज आभै थूणा है।।


चानणों रंग सात रचावै 

नैणा हिवड़ा घोळे हेत।

पग ध्वणियां असाढ़-सावण री

बाट जोवती नाचे रेत।

दूब उचके काळजे माथे 

 फले फूलती कूणा है।।


पता घूळे रोळी हींगळू

मेदिणी निरखे सिणगार।

जोत जळावै बादळ चूंखा

पून पांखा सिलग आंगार।

काळ घट गड्या ईबकाळै

 भाव सागरा सूणा है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

राम-रमौवळ/राम में रमे स्वर या राम मयी स्वर,जूणा/योनि,हूणा/समय,सोनल किरणां/सूर्य की किरण,डिगै/ बैठना ,कोनी /नहीं,जाणै/जानना ,रूसणों/नाराज होना,तड़के/भोर का समय ,बादळियै/बादल,छांटां/बारिस की बुँदे,आभै/आकाश , थूणा/स्तूप,चानणियो/उजाला ,हेत/प्रेम,चूंखा/रुई ,ईबकाळै/इस बार , स्रिस्टा /सृष्टि का निर्माण करने वाला

गुरुवार, जुलाई 7

बापू



भाव सरिता बहती आखरा 

मौण रौ माधुर्य बापू।।

बढ़े-घटे परछाई पहरा

दुख छळे सहचर्य बापू।।


हाथ आंगळी पग पीछाणै

सुख रौ जाबक रूखाळो।

सूत कातता उळझ रया जद 

सुळझावै नित निरवाळो।

तिल-तिल जळती दिवला बाती 

च्यानण स्यूं अर्य बापू।।


काळजड़े रै कूंणा फूटै 

अणभूतयां री कूंपळां।

सूरज किरण्या जीवण सींचे 

खारे समंदर दीप्तोपळा 

खरे ज्ञान रो खेजड़लो है 

देवदूत अनुहार्य बापू।।


टेम  खूंटी आभै टांगता 

 इंदर धणुष थळियां उग्या।

मरू माथे छाया रूंख री 

मोती मणसा रा पुग्या।

सगळां री संकळाई ओटै 

मेदिणी रौ धैर्य बापू।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

छळे/छलना,आंगळी/अंगुली,पीछाणै/पहचाने,जाबक/संपूर्ण; एकदम,रूखाळो/रखवाला,सुळझावै/सुलझाना,निरवाळो/एकांत,अनुहार्य/अनुकरण  करने योग्य,कूंणा/कोना,अणभूतयाँ /अनुभूति,कूंपळा/कोंपल,च्यानण /उजाला,अर्य/(श्रेष्ठ,पूज्य ),दीप्तोपळा/सूर्य कांत मणि,खेजड़लो/खेजड़ी का वृक्ष,टेम/समय,आभै /अंबर,सगळां /सभी,संकळाई/समस्या,ओटै /समाधान करना

सारांश -पिता में छिपे ममता रूपी भावों को दर्शाता यह नवगीत, इसमें नायिका कहती की पिता का स्नेह ऐसे है जैसे शब्दों में भाव हो और मौन में माधुर्य, वह कहती है समय के साथ दिन दोपरा परछाई बढ़ती घटती जैसे सुख के साथी बहुत होते हैं परंतु पिता तो दुख में भी आपने साथ होता है।

अगले अंतरे में नायिका कहती हैं पिता अंगुलियों के स्पर्श मात्र से या पैरों की आहट से पहचान लेता है, वह आपके सुख का बहुत ध्यान रखता है, अगर वह ज़िंदगी की उलझनों में उलझ भी जाता है तब भी किसी को कुछ नहीं कहता अगल एकांत में बैठ उसे सुलझाता रहता है, पिता बाती के जैसे आजीवन तिल-तिल जलता है, इसी पर नायिका ने पिता को उजाले से भी श्रेष्ठ और महान बताया है

अगले अंतरे में नायिका कहती है -हृदय के कोने में यादों की कोंपल फूटती  है, स्मृति में डूबी कहती है जैसे सूरज जग में समंदर रूपी खारे जीवन को सींचता है वैसे ही पिता परिवार में सूर्य कांत मणि के समान है,

वह कहती है पिता शुद्ध ज्ञान का भंडार है, वह देवदूत अनुकरण  करने योग्य है,

वह कहती है- पिता ही है वह जो समय की खूँटी पर अंबर टांग देता है और इंद्र धनुष आँगन में उतार देता है, पिता मरुस्थल के माथे पर छाँव है वह हमारी इच्छाओं का मोती है, सम्पूर्ण परिवार के दुख-दर्द अपने हृदय पर रखकर जीता है तभी नायिका कहती है पिता तो धरती का धैर्य  है।

सभी पिताओं को समर्पित यह नवगीत अगर आप पाठकगण अपने-अपने दृष्टिकोण से पढ़ेंगे तब मुझे बहुत ख़ुशी होगी, हमेशा सारांश संभव नहीं है 🙏

गुरुवार, जून 30

तुम्हें पता है?



तुम्हें पता है?

उधमी बादलों का यों

गाहे-बगाहे उधम मचाना 

सूरज को हथेली से ढकना 

ज़िद्दीपन ओढ़े गरजना 

संस्कारहीनता है दर्शाता

चहुँ ओर फैले अंधकार के

स्वर कोंधते हैं कानो में 

वृक्षों का मौन मातम

कोंपलें करता है कलुषित

आँखों से बहता हाहाकार

धड़कनों पर रहता है सवार 

अवचेतन की गोद में क़लम

 स्थूल पड़े शब्दों का ज्वर

आशंकाओ में उलझी बुद्धि 

 घोंसले में दुबके पखेरू 

अँधेरा बुझाता पहेलियाँ 

चेतना टटोलती उजाला 

दीपक हवाओं की क़ैद में हैं!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, जून 26

जीवण जेवड़ी


जीवण जेवड़ी रहट घूमे 

चौमासे री रात गळे।।

नाच नचावै म्रग तिसणा।

ताती माटी पैर तळे।।


राग अलापे पंछी भोळा 

मूक-बधिर पाहुण ठहरा।

झंझावात जंजाळ बुणावै

धी  बूंटा काडे गहरा।

प्रेम आभै रै पगती बुई

आभ निरखे आपे ढळे।।


लौ लपट्या झूलस्य धरती 

लुट्य तरवर रौ सिणगार।

पून सुरमो सारया थिरके 

काग सिळगावै अंगार।

छाँव रूँख री रूँख रै मथै

दो सूरज अक साथ जळे।।


ओढ़ ओढ़णी चाले टेडी

 रंग बुरकावै नुआँ-नुआँ।

दिण दोपहरी सूरज ढळता 

धूणी सिळगे धुआँ-धुआँ।

काळी-पीळी सज सतरंगी

फिरती-घिरती हिया छळे।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

जेवड़ी /रस्सी, रहट/ कुएँ से पानी निकालने का एक ऐसा यंत्र, जिस से रस्सी से पानी निकाल जाता है, ताती/गर्म,तळे/नीचे,लौ लपट्या/ आग की लपटे,सुरमो/ काजल,रूँख/वृक्ष,मथै/ऊपर,अक/एक,बुरकावै/बरसाना,नुआँ-नुआँ/नया-नया, बुई / छोटा मरुस्थली पौधा होता है जो बदल जैसा सफ़ेद दिखता है।

बुधवार, जून 22

नेह बाखळ रौ

 

टळ-टळ टळके पळसा पाणी 

नीम निमोळ्या पान झड्या।।

नैणां नेह बाखळ रौ उमड्य

दुबड़ हिवड़ा जाल गढ्या।।


बादळ मुठ्या जल सागर रौ 

जीवण सुपणा बौ रौ है।

रोहीड़ रा रूड़ा फूलड़ा

मनड़ा उठ्य हिलोरौ है।

कांगारोळ काळजड़ माथै

सुर-ताळ परवाण चड्या।।


 प्रीत च्यानणा जळे पंतगा

दिवलौ पथ रौ काज करे।

रात चाले ओढ्या अंधेरों

 ताख खूद पै नाज करे।

 समय सोता सिणधु स्यूं गहरा  

 जग नीति रौ पाठ पढ्या।।


ओल्यूं घुळै दूर दिसावरा 

 जोग रूळै ताज जड्यो।

चाँद-चाँदणी मांड-मांडणा 

धुरजी देख्य ठौड़ खड्यो।

गाँव गळी बदळा घर झूपां 

 पँख पसार पखेरू उड्या।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

पळसा/पोळ के भीतर का स्थान, मुख्य द्वार के अंदर का स्थान, निमोळ्या/नीम के फल,बाखळ/घर के सामने खुली जगह या धोरीमोडा के बाहर का स्थान, रूड़ा/रूखा,कांगारोळ/कौवे के ज्यों चिल्लाना, माथै/ऊपर,सिणधु/ सिंधु, च्यानणा/उजाला, घुळै/घुलना या मिश्रित होना, रूळै/मिटी में मिलना, धुरजी/धुर्व तारा, ठौड/एक ही स्थान पर खड़े रहना 

राजस्थानी शब्द एवं उनके अर्थ मैं अपनी स्मृति के आधार पर लिखती हूँ।

बाखळ घर के सामने खुली जगह को कहते हैं। आज-कल न बाखळ रहे न वह बचपन, उमड़ आया हृदय में वह घर, आँगन उम्मीद है आप भाव और भाषा को अवश्य समझेंगे।

जब कोई लिखता है तब वह उस कविता का बहुत ही वृहद रूप जीता है।  एक-एक भाव को शब्दों में गढ़ता है। उसे अनुवाद में कैसे समेटे? मुझे कुछ समय दे मैं प्रयास करुँगी।

सारांश... 'बाखळ जीवन और प्रेम का प्रतीक है' 'बाखळ' घर के बाहर का स्थान है जहाँ बच्चे खेला करते हैं घर के बुजुर्ग बैठे रहते हैं। घर आँगन की स्मृतियों में खोई नायिका के भाव ऐसे हैं जैसे बारिश के समय पळसे से पानी टपकता है यादें हृदय में दूब के ज्यों  जाळ गढ़ रही है। सब कुछ छूटने के बाद नायिका अपने जीवण की कल्पना करती है कि  उसके जीवन ऐसे है जैसे बादल अपनी अंजूरी में पानी लिए खड़ा है और वह स्वप्न बौ रही। रोहिड़े के रूखे फूलों के जैसे स्मृतियाँ हृदय में हिलोरे-सी उठ रही है ये घटनाएँ ऐसे है जैसे कागा, कागारोळ मचा रहा है सुर ताल सातवें आसमान को छू रहें हो।

इसके बाद नायिका कहती है दीपक तो अपने काम में व्यस्त है वह तो पथ पर उजाला कर रहा है प्रीत में  पतंगा अपना जीवन स्वतः गवा रहा है

स्वयं पर व्यंग्य साधती नायिका कहती है रात अंधेरा ओढ़े चलती है परंतु वहीं एक ताख स्वयं पर कितन नाज़ करता है कि मेरे पास उजाला है। वैसे ही वह कहती है जग पग पग पर नीति का पाठ पढ़ाता है परंतु किसने देखा समय का सोता कितना गहरा है अगले ही पल उसकी कोख़ में क्या छिपा है।

यह सभी स्मृतियाँ दूर बैठी नायका के हृदय में घुल रही हैं वह स्वयं के भाग पर हँसती है। रात के इस पहर में वह देखती है चाँद चांदनी कल्पनाओं के सुंदर फूल गुंथ रहें है और धुर्व तारा यह दृश्य चुप चाप खड़ा देख रहा है। वह कहती है समय के साथ सब बदल जाता है गाँव गळी घर…बाखळ में खेलते पंछी को तो एक दिन उड़ना ही होता है वह बाखळ में कितने दिन रुकेगा।


शुक्रवार, जून 17

नेम प्लेट



मुख्य द्वार पर लगी

नेम प्लेट पर उसका नाम है 

परंतु वह उस घर में नहीं रहता

 माँ-बाप,पत्नी; बच्चे रहते हैं 

हाँ! रिश्तेदार भी आते-जाते हैं 

 कभी-कभार आता है वह भी 

नेम प्लेट पर लिखा नाम देखता है 

नाम उसे देखता है 

 दोनों एक-दूसरे को घूरते हैं 

कुछ समय पश्चात वह 

मन की आँखों से नाम स्पर्श करता है 

तब माँ कहती-

”तुम्हारा ही घर है, मैं तो बस रखवाली करती हूँ। "

पत्नी देखकर नज़रें चुरा लेती है 

और कहती है -

”एक नाम ही तो है जो आते-जाते टोकता है।”

वह स्वयं को विश्वास दिलाता है 

हाँ!  घर मेरा ही है

बैग में भरा सामान जगह खोजता है 

साथ ही फैलने के लिए आत्मविश्वास

ज्यों ही परायेपन की महक मिटती है 

फिर निकल पड़ता है उसी राह पर

सिमट जाना है सामान को उसी बैग में 

कोने, कोनो में सिमट जाते हैं 

 दीवारें खड़ी रहती हैं मौन  

 चप्पलें भी  करती हैं प्रश्न 

 नेम प्लेट पूछती है कौन ?

पहचानता क्यों नहीं कोई ?

डाकिया न दूधवाला और न ही अख़बारवाला 

कहते हैं - "सर मैम को बुला दीजिए।"

स्वयं को दिलाशा देता 

"हाँ! मेरा नाम चलता है न। "

सभी नाम से पहचानते हैं मुझे 

स्वयं पर व्यंग्य साधता

 हल्की मुस्कान के साथ 

 कहता-”घर तो मेरा ही है!

 हाँ! मेरा ही है! परंतु मैं हूँ कहाँ ?"


@अनीता सैनी 'दीप्ति'