मंगलवार, 15 जून 2021

घुट्टी



उतावलेपन में डूबी इच्छाएँ
दौड़ती हैं
बेसब्री-सी भूख की तरह
 प्रसिद्धि के लिबास में
आत्मीयता की ख़ुशबू में सनी 
पिलाने मर्म-स्पर्शिनी
उफनते क्षणिक विचारों की
घोंटी हुई पारदर्शी घुट्टी
और तुम हो कि
निर्बोध बालक की तरह
भीगे कपासी फाहे को
होठों में दबाए
तत्पर ही रहते हो पीने को
अवचेतन में अनुरक्त हैं 
विवेक और बुद्धि 
चिलचिलाती धूप का अंगवस्त्र 
कंधों पर रहता है तुम्हारे
फिर भी 
नहीं खुलती आँखें तुम्हारी
भविष्य की पलकों के भार से
अनजान हो तुम
उस अँकुरित बीज की तरह
जिसका छिलका अभी भी
रक्षा हेतु उसके शीश पर है
वैसे ही हो तुम
कोमल बहुत ही कोमल
नवजात शिशु की तरह
तभी तुम्हें प्रतिदिन पिलाते हैं
भ्रमिक विचारों की घोंटी हुई घुट्टी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 7 जून 2021

धूलभरे दिनों में



धूलभरे दिनों में
न जाने हर कोई क्यों था रुठा ?
बदहवासी में सोए स्वप्न
शून्य की गोद में समर्पित आत्मा
नींद की प्रीत ने हर किसी को था लूटा
चेतन-अवचेतन के हिंडोले पर
मनायमान मुखर हो झूलता जीवन
मिट्टी की काया मिट्टी को अर्पित
पानी की बूँदों को तरसती हवा
समीप ही धूसर रंगों में सना बैठा था भानु
पलकों पर रेत के कणों की परत
हल्की हँसी मूछों को देता ताव
हुक़्क़े संग धुएँ को प्रगल्भयता से गढ़ता
अंबार मेघों का सजाए एकटक निहारता
साँसें बाँट रहा था उधार।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 2 जून 2021

मौन प्रभाती



पाखी मन व्याकुल है साथी 
खोई-खोई मौन प्रभाती।
भोर धूप की चुनरी ओढ़े 
विकल रश्मियाँ लिखती पाती।।

मसि छिटकी ज्यूँ मेघ हाथ से
पूछ रहे हैं शब्द कुशलता
नूतन कलियाँ खिले आस-सी
मीत तरु संग साथ विचरता
सुषमा ओट छिपी अवगुंठन 
गगरी भर मधु रस बरसाती।।
 
 पटल याद के सजते बूटे
 छींट प्रीत छिटकाती उजले
रंग कसूमल बिखरी सुधियाँ
पीर तूलिका उर से फिसले
स्वप्न नयन में नित-नित भरती
रात  चाँद की जलती बाती।।

शीतल झोंका ले पुरवाई
उलझे-उलझे से भाव खड़े
कुसुम पात सजते मन मुक्ता 
भावों के गहने रतन जड़े 
भीगी पलकें पथ निहारे 
अँजुरी तारों से भर जाती।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 14 मई 2021

आज उदास क्यों है कविता


 धूसर रंग की ओढ़नी ओढ़े 

आज उदास है क्यों कविता?


इतनी उदास 

कि खिलखिलाहट 

ओढ़ने की लालसा में लिपटी 

जतन की भट्टी में 

स्वयं को तपाती है कविता।।

 

मन के किवाड़ों पर

अवसाद की कुंडी के सहारे 

जड़ा है साँकल से मौन!

शिथिल काया की विवशता 

सूनेपन को समीप बैठा  

लाड़ लड़ाती है कविता।।


बादलों के कोलाहल में

खालीपन है दिखावे का

परायेपन की नमी देख 

दामिनी सी हँसी 

खूँटी पर  टँगाऐ 

बैठी है कविता ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

एक यथार्थ


नाद भरा उड़ता जीवन देख 

ठहरी है निर्बोध भोर की चंचलता

दुपहरी में उघती उसकती इच्छाएँ 

उम्मीद का दीप जलाए बैठी साँझ 

शून्य में विलीन एहसास के ठहरे हैं पदचाप।


यकायक जीवन चक्र भी शिथिल होता गया 

एक अदृश्य शक्ति पैर फैलाने को आतुर है 

समय की परिधि से फिसलती परछाइयाँ 

पाँवों को  जकड़े तटस्थ लाचारी 

याचनाओं को परे धकेलती-सी दिखी।


काया पर धधकते फफोले कंपित स्वर  

किसकी छाया ? कौन है ?

सभी प्रश्न तो अब गौण हैं

मेघों का मानसरोवर से पानी लेने जाना 

कपासी बादलों में ढलकर आना भी गौण है।


चिंघाड़ते हाथियों के स्वर में मदद की गुहार

व्याघ्रता से विचलित बस एक दौड़ है 

गौरया की घबराहट में आत्मरक्षा की पुकार 

हरी टहनियों का तड़प-तड़पकर जल जाना 

कपकपाती सांसों का अधीर हो स्वतः ठहर जाना।


एक लोटा  पानी इंद्र देव का लुढ़काना

झूठ का शीतल फोहा फफोलों पर लगाना

दूधिया चाँदनी में तारों का जमी पर उतरना

निर्ममता के चक्रव्यूह में मानव को उलझा देखा 

जलती देह का जमी पर छोड़ चले जाना

कविता की कोपलें बन बिखरा एक यथार्थ है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

कुछ पल ठहर पथिक

 

 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


  सिक्कों की खनक शोहरत की चमक छोड़ 

  मन को दे कुछ पल विश्राम  तुम 

न दौड़ बेसुध, पथ अंगारों-सा जलता है

मृगतृष्णा न जगा बेचैनी दौड़ाएगी

धीरज धर राह शीतल हो जाएगी।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


छँट जाएँगे बादल काल के

काला कोहरा पक्षी बन उड़ जाएगा 

देख! घटाएँ उमड़-घुमड़कर आएँगीं  

 शीतल जल बरसाएगी बरखा-रानी 

जोहड़ ताल-तलैया नहर-नदियाँ भर जाएँगीं।


 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


घायल हैं मुरझाए हैं  उलझन में हैं सुमन 

देख! डालिया फूल पत्तों से लद जाएगी 

धरा के आँचल पर लहराएगा लहरिया 

सावन-भादों न बना नयनों को हिम्मत रख  

अंतस में नवाँकुर प्रीत के खिलजाएँगे।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

मैं और मेरा अक्स



 अँजुरी से छिटके जज़्बात 

मासूम थे बहुत ही मासूम 

पलकों ने उठाया 

वे रात भर भीगते रहे 

ख़ामोशी में सिमटी

लाचारी ओढ़े निर्बल थी मैं। 


तलघर की कोठरी के कोने में

अनेक प्रश्नों को मुठ्ठी में दबाए 

बेचैनियों में सिमटा

 बहुत बेचैन था मेरा अक्स।

 

 आँखों में झिलमिलाती घुटन

 धुएँ-सा  स्वरुप 

 बारम्बार पीने को प्रयासरत 

दरीचे से झाँकती

विफलता की रैन बनी थी मैं। 


निर्बोध प्रश्नों को

बौद्धिकता के तर्क से सुलझाती

असहाय झूलती 

 बरगद की  बरोह का

धरती में धसा स्तम्भ बनी थी मैं। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

ओल्यूं




राजस्थानी बोली में नवगीत


 पोळी ओटाँ  गूँथू स्वप्ना

चूड़लो पाट उलझावे है 

सांकळ जइया मनड़ो खुड़को 

याद घणी थांरी आवे है।।


महंदी रोळी काजल टिकी

करे बिती बातां ऐ थांरी

 बोली बोलय लोग घणेरा 

तुम्ब जईया लागे खारी

बाट जोवता जीवन बित्यो

हिवड़लो थाने बुलावे  है।।


पैंडे माही टूटी गगरी

हाथा में ढकणी रहगी सा

खूँटी पर ईढ़ानी उलझी

पाणी कंईया लाऊँ सा 

घड़ले ऊपर घड़लो ऊंचो 

पणिहारी बात बणावे है।।


बारह मास स थे घर आया 

दो सावण दो जेठ बताया

 आभा गरजी न मेह बरसो 

प्रीत फूल मन का मुरझाया 

धीरज धर  बाता में उलझी

ढ़लतोड़ी साँझ रुलावे है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 4 अप्रैल 2021

समझ के देवता


उन्हें सब पता है

कि कैसे पानी से झाग बनाने हैं ?

उस झाग को कैसे मन पर पोतना है ?

कैसे शब्दों से एहसास चुराने हैं? 

कैसे डर को  पेट में छिपाना है?

सुविधानुरुप कैसे अनेक कहानियाँ गढ़नी हैं?

दिन महीने वर्ष  प्रत्येक पल को कैसे उलझाना है?

सच्चे भोले माणसों को अदृश्य बिसात में 

 रणनीति के तहत कैसे उलझनों में उलझाना है?

वे सब  जानते  हैं  कैसे? कब? कहाँ?

पैरों की बिबाइयों से पेट में झाँकना है

पेट में अन्न की जगह कैसे डर को छिपाना है?

कैसे हवा के वेग से डर को दौड़ाना  है?

कैसे दिमाग़ की शिराओं में डर को चिपकाना है?

कैसे पोषण का अभाव दिखाकर दफ़नाना है?

डर की मृत देह से कैसे बदबू  फैलानी है?

 शरीर के अंगों को कैसे विकृत करना  है?

उन अबोध माणसों की बुद्धि पर

नासमझी को कैसे हावी करना है?

उन्हें पता है कि कैसे  भेदभाव की

गहरी खाई खोदी जाती है?

इस और उस पार के दायरे को कैसे   

सिखाया और समझाया जाता है ?

खाई पर मंशा का तख़ता कैसे  रखा जाता है?

कैसे मनचाहे इरादों के साथ

मन चाहे लोगों को

इस और उस पार लाया ले जाया जाना है?

कब कहाँ डर की डोर का रंग बदला जाना है?

कैसे डर को एक नाम दिया जाना है?

 धर्म कह कैसे नवीनीकरण किया जाना है? 

समझ के देवता यह सब बखूबी जानते हैं। 


@अनीता सैनी  'दीप्ति'