मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

कुछ पल ठहर पथिक

 

 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


  सिक्कों की खनक शोहरत की चमक छोड़ 

  मन को दे कुछ पल विश्राम  तुम 

न दौड़ बेसुध, पथ अंगारों-सा जलता है

मृगतृष्णा न जगा बेचैनी दौड़ाएगी

धीरज धर राह शीतल हो जाएगी।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


छँट जाएँगे बादल काल के

काला कोहरा पक्षी बन उड़ जाएगा 

देख! घटाएँ उमड़-घुमड़कर आएँगीं  

 शीतल जल बरसाएगी बरखा-रानी 

जोहड़ ताल-तलैया नहर-नदियाँ भर जाएँगीं।


 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


घायल हैं मुरझाए हैं  उलझन में हैं सुमन 

देख! डालिया फूल पत्तों से लद जाएगी 

धरा के आँचल पर लहराएगा लहरिया 

सावन-भादों न बना नयनों को हिम्मत रख  

अंतस में नवाँकुर प्रीत के खिलजाएँगे।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

मैं और मेरा अक्स



 अँजुरी से छिटके जज़्बात 

मासूम थे बहुत ही मासूम 

पलकों ने उठाया 

वे रात भर भीगते रहे 

ख़ामोशी में सिमटी

लाचारी ओढ़े निर्बल थी मैं। 


तलघर की कोठरी के कोने में

अनेक प्रश्नों को मुठ्ठी में दबाए 

बेचैनियों में सिमटा

 बहुत बेचैन था मेरा अक्स।

 

 आँखों में झिलमिलाती घुटन

 धुएँ-सा  स्वरुप 

 बारम्बार पीने को प्रयासरत 

दरीचे से झाँकती

विफलता की रैन बनी थी मैं। 


निर्बोध प्रश्नों को

बौद्धिकता के तर्क से सुलझाती

असहाय झूलती 

 बरगद की  बरोह का

धरती में धसा स्तम्भ बनी थी मैं। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

ओल्यूं




राजस्थानी बोली में नवगीत


 पोळी ओटाँ  गूँथू स्वप्ना

चूड़लो पाट उलझावे है 

सांकळ जइया मनड़ो खुड़को 

याद घणी थांरी आवे है।।


महंदी रोळी काजल टिकी

करे बिती बातां ऐ थांरी

 बोली बोलय लोग घणेरा 

तुम्ब जईया लागे खारी

बाट जोवता जीवन बित्यो

हिवड़लो थाने बुलावे  है।।


पैंडे माही टूटी गगरी

हाथा में ढकणी रहगी सा

खूँटी पर ईढ़ानी उलझी

पाणी कंईया लाऊँ सा 

घड़ले ऊपर घड़लो ऊंचो 

पणिहारी बात बणावे है।।


बारह मास स थे घर आया 

दो सावण दो जेठ बताया

 आभा गरजी न मेह बरसो 

प्रीत फूल मन का मुरझाया 

धीरज धर  बाता में उलझी

ढ़लतोड़ी साँझ रुलावे है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 4 अप्रैल 2021

समझ के देवता


उन्हें सब पता है

कि कैसे पानी से झाग बनाने हैं ?

उस झाग को कैसे मन पर पोतना है ?

कैसे शब्दों से एहसास चुराने हैं? 

कैसे डर को  पेट में छिपाना है?

सुविधानुरुप कैसे अनेक कहानियाँ गढ़नी हैं?

दिन महीने वर्ष  प्रत्येक पल को कैसे उलझाना है?

सच्चे भोले माणसों को अदृश्य बिसात में 

 रणनीति के तहत कैसे उलझनों में उलझाना है?

वे सब  जानते  हैं  कैसे? कब? कहाँ?

पैरों की बिबाइयों से पेट में झाँकना है

पेट में अन्न की जगह कैसे डर को छिपाना है?

कैसे हवा के वेग से डर को दौड़ाना  है?

कैसे दिमाग़ की शिराओं में डर को चिपकाना है?

कैसे पोषण का अभाव दिखाकर दफ़नाना है?

डर की मृत देह से कैसे बदबू  फैलानी है?

 शरीर के अंगों को कैसे विकृत करना  है?

उन अबोध माणसों की बुद्धि पर

नासमझी को कैसे हावी करना है?

उन्हें पता है कि कैसे  भेदभाव की

गहरी खाई खोदी जाती है?

इस और उस पार के दायरे को कैसे   

सिखाया और समझाया जाता है ?

खाई पर मंशा का तख़ता कैसे  रखा जाता है?

कैसे मनचाहे इरादों के साथ

मन चाहे लोगों को

इस और उस पार लाया ले जाया जाना है?

कब कहाँ डर की डोर का रंग बदला जाना है?

कैसे डर को एक नाम दिया जाना है?

 धर्म कह कैसे नवीनीकरण किया जाना है? 

समझ के देवता यह सब बखूबी जानते हैं। 


@अनीता सैनी  'दीप्ति'

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

बहनापा खलता है आज


उम्र के तीसरे पड़ाव पर 

 शिथिल पड़ चुकी देह से सुलगतीं सांसें 

उसका बार-बार स्वयं से उलझना

  बेचैनियों में लिपटी तलाशती है जीवन

 ज्यों राहगीर सफ़र में तलाशता छाँव है।

 

  समय की चोट के गहरे निशान

  चेहरे की झुर्रियों से झाँकते रहते हैं  

  झुर्रियाँ मिटाने को तत्पर है आज 

 ज्यों वर्तमान के अतीत के लगे पाँव हैं ।


 प्रेम से किए अनेकों प्रेम के प्रतिकार 

 घुटनों की जकड़न से जकड़े हुए हैं 

  जकड़न को तोड़ने की अभिलाषा 

 भोर टिमटिमाते प्रश्नों के प्रतिउत्तर 

 उससे सौंपती है पात पर।

 

शब्दों में समझ की दूरदर्शिता और 

अँकुरित मंशा को बारीकी से पढ़ना

 इच्छा-अनिच्छा की रस्सी से जीवन को 

 पालना झुलाती ज़िंदगी का कोलाहल

 लिप्त है मौन में ।

 

 पेड़ के  सहारे फूलों को निहारती 

 रोज़ सुबह इंतज़ार में आँखें गड़ाती  

हल्की मुस्कुराहट के साथ क़दम 

 स्वतः साथ-साथ चल पड़ते 

बिछड़कर बहनापा खलता है आज।

 

  कील में अटके कुर्ते को निकालना 

 खुसे धागे को ठीक करते हुए कहना-

  सुगर और बीपी ने किया बेजान है 

 मॉर्निग वाक की सलाह डॉ.की है। 


अनुदेश की अनुपालना अवमानना में ढली 

उसके पदचाप आज-कल दिखते नहीं है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 25 मार्च 2021

फाग



 फाग में हर्षित हैं पुष्प 

 आसमां अबीर बरसा गया 

पात-पात भीगे प्रीत में 

 चेतना पर सौरभ छा गया।


पलाश पैर में बँधी झाँझरी

 हो मुग्ध,रागनी गुनगुना रहा

 शृंगार सुशोभित पुलकित है मन  

 बाट जोहती देहरी गान अनुतान में गा रही।


सुमन सेमल पथ पर बिछाती पवन 

पग-ध्वनि को झोंका तरसता रहा 

 अभिलाषित मन की हूक

 देखो! चकोर चाँद को निहारता रहा।

 

 गोरी कोरी  हथेलियों पर 

  रंग मेंहदी का कसूमल भा गया 

  कर्तव्य भार अंतस गहराया 

 पलक कोर स्मृति नीर बहा गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


रविवार, 21 मार्च 2021

दोहे


 श्याम श्याम राधे कहे

श्याम रंग शृंगार।

श्याम रंग ने ठग लिया

जोगन कह संसार।।


श्याम रंग का लहरिया

स्याह  प्रीत परिधान।

मोह साँवले ने लिया

बने श्याम अभिमान।।


मनमोहन मन में बसे

मन बहोत अनमोल।

मुरलीधर मन को हरे

नहीं प्रीत का मोल।।


छलिया छल की कोठरी 

मायावी है नाम।

कान्हा कान्हा जग कहे

मीरा के हैं श्याम।।


सुख-समृद्धि जग खोजता 

मिला न सुख का छोर।

 जिस मन में कान्हा बसे 

थामे सुख की डोर ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 17 मार्च 2021

माँ कहती है


 औरतें बालकनी में टंगे 

 मिट्टी के झूमर की तरह होतीं हैं 

तभी वे हवा के हल्के स्पर्श से

 मोहनी सुर लहर-सी बिखर जातीं हैं।

 

  कभी मौळी तो कभी कँगन डोरी में

  जड़ी दीं जातीं हैं कोड़ियों के रुप में

  कभी-कभार बंदनबार में जड़ दी जातीं हैं 

  दहलीज़ की शोभा बढ़ाने के लिए।


वात्सल्य ममता की दात्री को

कभी रख दिया जाता है छत की मुँडेर पर

पानी से भरे मिट्टी के पात्र की तरह जो

अनेक पक्षियों को पुन: जीवनदान देता है।

  

  कुछ लोग उन्हें उपवस्त्र समझ 

 किवाड़ों  के पीछे हेंगर में टाँग देतें  हैं 

  विचारों में आई खिन्नता ही कहेंगे

  कि धूल-मिट्टी की तरह उन्हें झाड़ा जाता है।


 परंतु माँ कहती है

 औरतें गमले में भरी मिट्टी की तरह होतीं हैं

 खाद की पुड़िया उनकी आत्मा की तरह होती है 

 जो पौधे को पोषित कर हरा-भरा करती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 14 मार्च 2021

निर्वाण (खग मनस्वी संवाद )


भाग-4 निर्वाण (खग मनस्वी संवाद )


वृक्ष पर बैठ खग  डाल से पँख खुजाते

मद्धिम स्वर में किस्सा पर्वत पार का सुनाया 

एक नगरी मानव की छाया है अविश्वास

मसी के छींटे उद्गार अंतस में उभर आया। 


 विरक्तता भाव बरसा था धरा के आँचल पर 

लो ! प्रकृति न दौंगरा समर्पण का बिछाया

अतृप्ति के भटके भाव में बिखरी चेतना

ज्यों पुष्प मोगरे पर रंग धतूरे का छाया। 


अहं द्वेष क्रोध अंतस के है कुष्ट रोग 

पीड़ा से मती मनोभावों की भ्रष्टता में भारी हुई 

नीलांबर के वितान पर उभरी कलझांईयाँ सी

वेदना की भीगी पंखुड़ियाँ क्षारी हुई। 


तीसरे पहर की पीड़ा क्षितज की लालिमा 

कपासी मेघों का हवा संग बिखर  जाना  

एकाएक झरने-से बहते जीवन में  ठहराव

हलचल अवचेतन की नयनों में उतर आना ।


 संवेदन हीन हैं विचार कलुषित मानव के 

पंख फैलाए व्याकुल मन से खग बोले 

  पलकों की पालकी पर भाव सजाए  

कहो न खग! मनस्वी ने नयनों के पट खोले।


हे सखी! गाथा विश्व में वैभव सम्पन्नता संग 

समझ के दरिया में डूबे मानव व्यवहार की

आत्मछटपटाहट प्राबल्यता प्राप्ती की मंशा 

खंडित चित्त के किवाडों के दुर्व्यवहार की।


 अनभिज्ञ मानव समझे स्वयं को आत्मज्ञानी

ज्यों कर्म कारवाँ बढ़े कोलाहल की झंकार 

सत,रज, तम ठूँठ हुए उजड़े चित्त के मनोभाव 

भ्रम यवनिका मन-दर्पण,धूल-मिट्टी मोह भार।


द्वेष क्रोध को धार लगाते, छूटा प्रीत का हार 

हृदय पाषाण, भाव मरु,लू के थपेड़े हैं स्वभाव

ताप बढ़े काया का ज्यों  किरणों का प्रहार 

स्वार्थसिद्धता पट्टी आँखों पर अतृप्त हैं भाव।


नहीं!नहीं!!नहीं!!!खग,मानव ज्ञाता, है विश्वास

जीवन कलाएँ अर्जित करना,है इसका स्वभाव

बोध-निर्बोध भाव तत्त्व बाँधे, बंधुत्त्व अंबार

पीड़ित पीड़ा में उलझा समझे न विकारों का प्रभाव।


निर्मल-निश्छल स्वभाव,है करुणा का अवतार 

भावों-अभावों से जूझता,टाटी सुखों की बाँधता 

बंजर जीवन भाता किसको? हे खग!

विचार उचटते अंतरमन के,सुख का छप्पर टूटता!


अविश्वास बढ़ा भू पर,देख! छाए बादल विश्वास के

पुरवाई प्रीत, बरसात आस्था के नवांकुर खिलाएगी

वृक्षों पर पात संबंधों के अंकुरित हो खिल जाएँगे 

डाली-डाली लदी फूलों से धरा दुल्हन-सी सज जाएँगी।


द्वेष धुलेगा एक दिन,मन-दर्पण रश्मियों-सा चमकेगा  

हे खग!आभा मुख पर,पुलकित मानवता हर्षाएगी

निश्छल झरना झरे कर्मण्यता का, हैं सौरभ से भाव 

शब्द सुमन सुवासित हो हृदय शीतल कर जाएँगी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


'निर्वाण'

प्रथम द्वितीय एवं तृतीय भाग के लिंक 👇

१. निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

२. निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज) 

३ निर्वाण (चित्त की भित्तियाँ) 

बुधवार, 10 मार्च 2021

निर्वाण (चित्त की भित्तियाँ)


(चित्त की भित्तियाँ -३ )


 विस्मित हो कहे मनस्वी!


फूलों ने स्वरुप स्वयं का बदला!

निशा से नीरस थे प्रभात में खिलखिलाए!

उषा में रंग कसूमल किसने है उड़ेला!

तेज़ रश्मियों ने या सुमन स्वयं मुस्कुराए।


आहा! एक बदरी आई स्नेह सजल हो

करुणा के सुमन खिलाए! ममता बरसाई

मिथ्या स्वप्न की डोरी में था चित्त उलझा

हर्षित पलों की दात्री प्रीत अँजुरी भर लाई।

 

झरना मानवता का मन की परतें भिगोता

वात्सल्यता की सुवास सृष्टि में उतर आई

करुणा की मूरत  उतरी मन आँगन में 

भोर की लालिमा आँचल में स्नेह भर लाई।


रश्मियों का तेज़ ज्यों डग भरती मानवता

चुनड़ी पर धूप ने जड़े सतरंगी सितारें

रेत पर पद-चिन्ह बरखान से उभर आए

दर्शनाभिलाषी भोर का तारा स्वयं को निहारे। 


शीतलता लिए था एक झोंका मरुस्थल पर 

ममत्व की प्रतीति निर्मलता शब्दों से संजोए

भाव-विभोर  मनस्वी के अंतस पर छवि उभर आई

नवाँकुर को छाँव संवेदना की बौछार से पात भिगोए।


 सहसा चिंतन में विघ्न!

 

वृक्ष पर बैठ खग  डाल से पँख खुजाते

मद्धिम स्वर में किस्सा पर्वत पार का सुनाया 

एक नगरी मानव की छाया है अविश्वास

मसी के छींटे उद्गार अंतस में उभर आया। 


 विरक्तता भाव बरसा था धरा के आँचल पर 

लो ! प्रकृति न दौंगरा समर्पण का बिछाया

अतृप्ति के भटके भाव में बिखरी चेतना

ज्यों पुष्प मोगरे पर रंग धतूरे का छाया। 


अहं द्वेष क्रोध अंतस के है कुष्ट रोग 

पीड़ा से मती मनोभावों की भ्रष्टता में भारी हुई 

नीलांबर के वितान पर उभरी कलझांईयाँ सी

वेदना की भीगी पंखुड़ियाँ क्षारी हुई। 


तीसरे पहर की पीड़ा क्षितज की लालिमा 

कपासी मेघों का हवा संग बिखर  जाना  

एकाएक झरने-से बहते जीवन में  ठहराव

हलचल अवचेतन की नयनों में उतर आना ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

'निर्वाण'

प्रथम द्वितीय भाग के लिंक 

१. निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

२. निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज) 

शनिवार, 6 मार्च 2021

निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज)

भाग -२ 

 स्वप्न की अनुगूँज


बुद्धतत्त्व की अन्वेषणा,मनस्वी कानन-कानन डोले

बुद्ध छाँव बने, बुद्ध ही बहता झरना बन बोले

हे प्रिय! पहचानो नियति जीवनपथ की

कंकड़-पत्थर झाड़-झंकार गति जीवनरथ की।


गरजते मेघों से क्यों चोटिल स्वयं को करना 

हवा की प्रीत बरसात के भावों को समझाना 

भांति-भांति के भ्रम भ्रमित कर भटकाएँगे

मृगतृष्णा नहीं जीवन में, ठहराव दीप जलाएँगे।


परीक्षा पृथ्वी पर प्रीत के अटूट विश्वास की

यों व्यर्थ न गँवाओ प्रिय! अमूल्य लड़ियाँ श्वाँस की

तुम पुष्प बन खिल जाना मैं बनूँगा सौरभ 

तुम पेड़ बन लहराना मैं छाँव बनूँगा पथ गौरव।


परोपकार में निहित मानवता की  सुवास हूँ मैं

फल न समझना प्रिय! रसों में मिठास हूँ मैं

काया के शृंगार का न बोझ बढ़ाना तुम 

जीवन के अध्याय विरह को लाड़ लड़ाना तुम।


हे प्रिय! तुम करुणा के दीप जलाना 

दग्ध हृदय पर मधुर शब्दों के फूल बरसाना 

अँकुरित पौध सींचना स्नेह के सागर से

प्रेम पुष्प खिलेंगे छलकाओ सुधा मन गागर से।


सहसा निंद्रा से विचलित हो उठी मनस्वी 

हाय! भोर रश्मियों ने क्यों लूटी मेरे स्वप्न की छवि 

प्रिय!प्रिय!! कह पुकार बौराई बियाबान में

अनुगूँज से सहमी ध्वनि थी स्वयं के अंतरमन में।


ओह! कलरव की गूँज लालिमा धरा पर छाई 

पात-पात हर्षाए ज्यों प्रकृति दुग्ध से नहाई 

मन चाँदनी झरी ज्यों शीतल आभा-सी बरस आई  

प्रीतम की पीर नहीं मद्धिम हँसी होठों ने छलक आई।


अंतस ज्योत्स्ना मुख पर दीप्ति उभर आई थी 

उलझी-उलझी फिरे अकुलाहट निख़र आई थी 

पर्वत पाषाण पादप पात जहाँ दृष्टि वहीं बुद्ध

 काँटों की चुभन से प्रीत, प्रतीति में गवाई सुध।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


प्रथम भाग का लिंक 

भाग-१  निर्वाण  

 निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

मंगलवार, 2 मार्च 2021

निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत)


भाग-१ 

मनस्वी की  बुद्ध  से प्रीत


अंतस के विचारों  में मग्न मनस्वी

स्मृति पन्नों में टोहती स्वयं की छवि

आत्मलीन हो कहे- बियाबान ही साथी

एकांतवास विधना की थाती।


   जीवनपथ के सब साथी झरे 

ज्यों पतझड़ पेड़ से पाती झरे 

उलझीं-उलझीं जब जीवन लताएँ 

  रथ खींचे संग सत गाथाएँ ।

 

झाड़-झंकार के काँटे चुभे,जले पाँव 

वृक्षों की न छाँव मिली न मिली ठाँव 

जेठ दोपहरी की तपती रेत पर  

ज्यों हल जोते खेतिहर अदृश्य खेत पर।


कोरे आसमान ने सहलाया

चाँद-सितारे संगी-साथी सबने बहलाया।

पवन ने प्रीत से लाड़ लड़ाया 

रश्मियों ने पथ पर उजास छलकाया।


हाय! काली रात डराती बहुत थी

गोद चाँदनी की सुहाती बहुत थी

इच्छा-अनिच्छा का खेल था भारी

मुक्त हुई कैसे,न जानूँ क्रम अभी था जारी।


फिर-फिर दुख रुलाता रहता

हृदय भी नीर बहाता रहता

दुख बीता या नयना सूखे  

दुख-सुख हुए पाषाण अब न जीवन दुखे।


  कामना रही न कोई शेष  न कोई चाह   

 मन के संतोष को  मिली थी राह  

व्यग्र छलना अति चतुर रहती सवार 

हाय! उसी डगर पर मिलती बारंबार।


मन टूटा, तन टूटा,टूटा न अटूट विश्वास

मोह-माया का टूटा पिंजर मुक्त हुई हर श्वास

देह धरती पर जले दीप-सी आत्मा में उच्छवास

मनस्वी को मिला बुद्धत्व पहना उन्हीं-सा लिबास।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

हूक



 नील समंदर नीर को तरसे

नयना नील गगन निहारे

व्याकुल पपीहा प्रीत में 

पीहू-पीहू की हूक हुंकारे।


 घुमड़-घुमड़ घटाएँ बरसें 

 बादल ओट छिपे चंचला 

शुष्क तरु खिलीं कोपलें

अहसास अंतस पर मचला

घट प्रेम का फूटा समीर पर 

 मुग्ध मध्यम पवन दुलारे।।


चपल चंचल अल्हड़ बूँदें 

पलकों पर सपना बन उतरी 

कर्म रेख का झूले झूलना

 चक्षु कोर में उलझी झरी 

अजब खेल है विधना का भी

लगन सीप की स्वाति पुकारे।।


पीर हृदय को मंथती रहती

 तपता रहता है ज्यों फाग

 सूनी अँखियाँ राह निहारे 

 जाग रहा मन का अनुराग

 विरह हूक ऐसी उठती  

 सूर्य ताप से जलधर कारे।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

ऋतु वसंत


 वासंती परिधान पहनकर

क्षिति दुल्हन-सी शरमाई है 

शीश मुकुट मंजुल सुमनों का 

मृदुल हास ले मुसकाई है ।।


पोर-पोर शृंगार सुशोभित

ज्यों सुरबाला कोई आई है

मुग्ध घटाएँ बहकीं-बहकीं 

घट भर सुषमा छलकाई है।।


शाख़-शाख़ बजती शहनाई 

सौरभ  गंध उतर आई  है

मंद मलय मगन लहराए

पात झाँझरी झनकाई है ।।


कली कुसुम की बाँध कलंगी

रंग कसूमल भर लाई है 

वन-उपवन सजीं बल्लरियाँ

ऋतु वसंत ज्यों बौराई है। ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

साथी


शीतल झरना झरे प्रीत का

बहता अनुराग हूँ साथी

सींचू सुमन समर्पण से 

कभी न बग़िया सूखे साथी।


मैं तेरे बागों  की शोभा

दूर्वा बनकर लहराऊँ 

रात चाँदनी तारों वाली

सपना बनकर सज जाऊँ 

बिछ जाऊँ बन प्रेम पुष्प 

पाँव चुभे न काँटे साथी ।।


 देहरी सजती भाव से

 प्रीत बसंत के साथ

आस कोंपले नित सींचू

पीव सतत थामना हाथ

ऋतुएँ  बदले पहनावा

यही जीवन शृंगार साथी।।


झड़े साख़ से पात सभी 

धूप-छाँव का खेल

जीवन में संताप हरुंगी 

नीर मेघ का मंजु मेल 

अमर बेल-सी सांस बढ़े 

 रहे न विरह साथ साथी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

अनमनापन

अनमनेपन का

प्रकृति से अथाह प्रेम

झलकता है 

उसकी आँखों से 

प्रेम में उठतीं  

ज्वार-भाटे की लहरें 

किनारों को अपने होने का 

एहसास दिलाने का प्रयत्न 

बेजोड़पन से करती हैं  

एहसास के छिंटों से 

भिगोती हैं जीवन

जीवनवाटिका में

फूल बनने की अभिलाषा को 

समझकर भी मैं नासमझी की 

डोर से ही खींचती हूँ 

और धीरे-धीरे समझ को 

उसमें डुबो देती हूँ।


उसकी फ़ाइल पेपर की 

उलझन से इतर

अक्षर बनने की लालसा का 

पनपते जाना 

और फिर 

वाक्य बन

समाज को छूकर देखना

कविता बन

हृदय में उतरना 

तो कहानी बन

 आँखों से लुढ़कने की

 अथाह चाह

तो कभी 

उपन्यास के प्रत्येक पहलू को 

घटित होते देखना

उसकी उस लालसा को

 न सींच पाने की पीड़ा

मैं भोगी बन हर दिन जीती हूँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

प्रेम


 हर कोई आज-कल प्रेम में है

जैसे भोर की प्रीत में लिप्त हैं रश्मियाँ

त्याग की पराकाष्ठा के पार उतरती मद्धिम रौशनी

सूर्य को आग़ोश में भर नींद में जैसे है सुलाती 

वैसे ही हर नौजवान आजकल प्रेम में है।


गलियों में भटकता प्रेम भी प्रेम है 

समर्पण की भट्टी में अपनापन कुरेदता 

कुछ पल का सुकून दिलों की जेब में भरता  

आत्मीयता में भीगे चंद पल हैं  लहराते 

वैसे ही हर नौजवान आज-कल प्रेम में है।


भविष्य का दरदराया  चेहरा अनदेखाकर

 अनदेखा करते हैं मुँह में पड़े अनगिनत छाले

आत्मभाव में डूबे स्वप्न के पँखों पर सवार 

आत्मविभोर हो मन की उड़ान जैसे हैं उड़ते 

वैसे ही हर नौजवान आज-कल प्रेम में है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

वर्तमान


 एकाकीपन में डूबी चुप्पी

शब्द तलाश ही रही थी कि

अचानक चोट खाया वर्तमान 

हृदय से लिपटकर  रोया।


आत्मभाव से जकड़ी हथेलियाँ  

आपबीती अक्षर बन बिखरी 

अवंतस के लूटने का प्रमाण 

पक्षियों का स्वर बन चहचहाया।


अहं पँखों पर सवार हो आया 

तारों की कतार ज्योति को बुझाया 

चाँद की धवल चाँदनी पर देखो!

स्याह  रात का पर्दा लगाया।


बसंत में पल्लवित पौधे को 

बुहार अग्नि पुष्प खिलाए 

नदियों को तितर-बितर कर 

साज़िश से समंदर को सुखाया।


 एकाधिकार की कसौटी पर

 मनमाने व्यवहार से जीवन कसा 

 ज़िद स्वभाव की चटकनी से जड़ी 

 मुख्य-द्वार पर देखो! भविष्य टँगवाया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

मधुमास अंगना का मेरे

 तमसा के पथ पर उजियारा

जुगनू है जीवन का मेरे ।

हृदय शाख पर खिले फूल सा

मधुमास अंगना का मेरे।


उजली भोर गाती प्रभाती

गुनगुनी धूप सी मृदु बोली

तारक दल से मंजुल चितवन

शाँत चित्त मन्नत की मोली

संवेदन अंतस तक पैंठा

मानस कोमल सुत का मेरे  ।।


आँगन खिलता है शतदल सा

नयना निरख निरख कर सरसे

शीतल धार प्रवाह स्रोत सा

शुष्क राह पर पियूष बरसे

स्वप्न चढ़े ज्यों दृग पलकों पर

राज दुलारा मन का मेरे।।


चन्द्र रश्मियाँ तेज़ उड़ेले 

और चाँदनी करे शृंगार

मुखमंडल आभा से चमके

सौंपे ममता धीर उपहार

करूं निछावर सब कुछ उस पर

कंठ हार मोती का मेरे ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

आंख्यां सूनी जोवे बाट




 राजस्थानी लोक भाषा में एक नवगीत।


गोधुली की वेला छंटगी

साँझ खड़ी है द्वार सखी

मन री बाताँ मन में टूटी 

बीत्या सब उद्गार सखी।।


मन मेड़ां पर खड़ो बिजूको

झाला देर बुलावे है 

धोती-कुरता उजला-उजला 

हांडी  शीश हिलावे है

तेज़ ताप-सी जलती काया 

विरह कहे  शृंगार सखी।।


पाती कुरजां कहे कुशलता 

नैना चुवे फिर भी धार

घड़ी दिवस बन संगी साथी

चीर बदलता बारम्बार 

घूम रह्यो जीवन धुरी पर

विधना रो उपहार सखी ।।


आती-जाती सारी ऋतुआँ

छेड़ स्मृति का जूना पाट  

झड़ी लगी है चौमासा की

 आंख्यां सूनी जोवे बाट 

कोंपल जँइया आस खिलाऊँ 

प्रीत नवलखो हार सखी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


अनुवाद 

गोधुली की घड़ियाँ बीत गई

साँझ खड़ी है द्वार सखी

मन की बातें मन में टूटी 

बीते सब उद्गार सखी।।


हृदय मेड़ पर खड़ा बिजूका

दे आवाज बुलाता है

धोती-पहने उजली-उजली 

गगरी शीश हिलाता है

तेज़ ताप-से जलती काया 

विरह करे शृंगार सखी।।


पाती कुरजां कहे कुशलता 

नैन छूट रही जल धार

घड़ी दिवस बन संगी साथी

चीर बदलते बारम्बार 

घूम रहा जीवन धुरी पर

विधना का उपहार सखी ।।


आती-जाती सारी ऋतुएं

खोलें क्यों स्मृति के पाट  

झड़ी लगी है चौमासे की

सूने दृग निहारे बाट 

कोंपल जैसे आस खिलाऊँ 

प्रीत नौ लखा हार सखी।।

रविवार, 31 जनवरी 2021

घटना


 मैं यह नहीं कहूँगी

कि उसकी समझ के पिलर

उखड़ चुके हैं और वह

जीवन से इतर भटक चुकी थी।  

कदाचित मन की नीरवता

रास्ते के छिछलेपन में उलझी 

भूख की खाई को भरते हुए 

समय के साथ ही विचर रही।  

इसलिए मैं यह कहूँगी

कि भय से अनभिज्ञ दौड़ते हुए 

वाकिया घटित होने पर 

ज़ख़्मी और हताश अवस्था में भी

इंतज़ार करती रही उपचार का 

ज़िंदगी में मिली बहुताए

 ठोकरों के उपरांत

 चोट खाने पर शाँत अवस्था में 

आँखों में मदद की गुहार लिए 

वह वहीं ज़मीन पर ही पड़ी रही।   

किसी की संपति नहीं होने पर

आवारापन की पीड़ा भोगते हुए 

 घटित घटना घायल हो घबराई नहीं 

कुछ नहीं थी मेरी अपनी हो गई।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 24 जनवरी 2021

समर्पण



 दुआ बन निखरुँ जीवन में 

रोळी-मौळी-सी सजूँ।

हँसी बन बिखरुँ होठों पर

बाती-सी जल धीर धरुँ।


लोकगीतों का गुलदस्ता

मधुर धुन की बाड़ मढूँ ।

आँगन में छिड़कूँ प्रीत पुष्प

सोनलिया पद छाप गढ़ूँ।


अपलक हँसती आँखों को

नमी से कोसों  दूर रखूँ ।

बुझे मन पर दीप्ति बन

थार अँजुरियों में बन स्रोत झरुँ।


लजाए पग समर्पण के 

डगर पर हौले-हौले धरुँ।

लहराऊँ स्वच्छंद गगन में 

अहाते में नभ के तारे भरुँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

दुछत्ती


 मन दुछत्ती पर अक्सर छिपाती हूँ 

 अनगिनत ऊँघती उमंगों की चहचाहट

 एहसास में भीगे सीले से कुछ भाव

 उड़े-से रंगो में लिपटी अनछुई-सी

  बेबसियों का अनकहा-सा ज़िक्र

  व्यर्थ की उपमा पहने दीमक लगे

  भाव विभोर अकुलाए-से कुछ प्रश्न

ढाढ़स के किवाड़ यवनिका का आवरण

कदाचित शालीनता के लिबास में 

ठिठके-से प्रपंचों से दूर शाँत दिखूँ

ऊँघते आत्मविश्वास का हाथ थामे

उत्साह की छोटी-छोटी सीढ़ियों के सहारे 

अनायास ही झाँक लेती हूँ बेमन से

कभी-कभार मन दुछत्ती के उस छोर पर

उकसाए विचार चेतना के ज्वार की सनक में 

स्वयं के अस्तित्त्व को टटोलने हेतु।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 10 जनवरी 2021

बिछोह


बड़े दिनों बाद आवाज़ लगाई 
सूखे पत्तों से सजे आँगन ने
बाहें फैलाए  स्मृतियाँ 
स्वागत में प्रीत दीप जलाए 
वात्सल्य वीरानियों में
दहलीज़ पर सीलन अपनेपन की 
दीवारों की दरारों से झाँकता स्नेह
मन की आवाज़ में मैं बह चली
घर के सामने गली के नुकड़ पर
छोटा-सा नीम का पेड़ अब 
बड़ा हो अँग्रेज़ी बोलने लगा
विशाल टहनियाँ मुस्कुराती
कुछ कहकर लहराने लगतीं  
मैं उसकी यादों को छिपाती
दिखावे की व्यस्तता से
फुटकर हँसी सम्पन्नता के शृंगार से 
मन के दरीचों पर
आवरण करती यवनिका से
कि मन पटल पर बिछोह उभर न आए
फिर आज मन की आवाज़ में बह चली मैं?

@अनीता सैनी 'दीप्ति'