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गुरुवार, 22 जुलाई 2021

ऋतु सुवहानी सावण की



बोल कोयलड़ी मीठा बोल्य
ऋतु सुहावनी सावण की।
झड़ी लागी है चौमास की
आहट पाहुन आवण की।।

हरी चुनरिया ओढ़ी धरती
घूम घटायाँ घाल्य घेर
चपला गरजती बाड़ा डोल्य
चूळा फूंक हुई अबेर
डाळी जईया झूम जिवड़ो 
पूर्वा पून सतावण की।। 

अंबर छाई बदरी काली
गोखा चढ़ी उजली धूप
पुरवाई झाला दे बुलाव 
फूल-पता रो निखर रूप
 नाचे पंख पसार मोरनी
 हूक उठी है गांवण की।।

बाग-बगीचा झूल्या पड़ ग्या 
कुआँ ऊपर गूँजे गीत
कसूमल कली पुष्प लहराय
मेह छींटा छिटके प्रीत
गिगनार चढ़ो चाँद ताकतो
मनसा नींद चुरावण की।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 19 जुलाई 2021

समय दरिया



 समय दरिया में डूब न जाऊँ माझी

पनाह पतवार में जीवन पार लगाना है 

भावनाओं के ज्वार-भाटे से टकरा

अंधकार के आँगन में दीप जलाना है।


शांत लहरों पर तैरते पाखी के पंख

परमार्थ के अलौकिक तेज से बिखरे 

चेतना की चमक से चमकती काया

उस पाहुन को  घरौंदे में पहुँचाना है।


चराचर की गिरह से मुक्त हुए हैं स्वप्न

शून्य के पहलू में बैठ लाड़ लड़ाना है 

अंतस छिपी इच्छाओं का हाथ बँटाते

आवरण श्वेत जलजात से करना है।


नदी के गहरे में बहुत गहरे में उतर

अनगढ़ पत्थरों पर कविता को गढ़ते

 सीपी-से सत्कर्म कर्मों को पहनाकर 

झरे मृदुल वाणी ऐसा वृक्ष लगाना है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

पगलां माही कांकर चुभया 



 पगलां माही कांकर चुभया 

 जूती बांध्य बैर पीया।

 छागल पाणी छलके आपे 

थकया सांध्य पैर पीया।।


कुआँ जोहड़ा ताल-तलैया

बावड़ थारी जोव बाट

बाड़ करेला पीला पड़ ग्यो 

 सून डागल ढ़ाळी खाट

मिश्री बरगी  बातां थारी 

नींद  होई गैर पीया।।


धरती सीने डाबड़ धँसती 

 खिल्य कुंचा कोरा फूल

मृगतृष्णा मंथ मरु धरा री

खेल घनेरो खेल्य धूल

डूह ऊपर झूंड झूलस्या

थान्ह पुकार कैर पीया।।


 रात सुहानी शीतल माटी 

ठौर ढूंढ़ रया बरखान

दूज चाँद सो सोवे मुखड़ो

आभ तारक सो अभिमान

छाँव प्रीत री बनी खेजड़ी 

चाल्य पथ पर लैर पीया।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति '

रविवार, 11 जुलाई 2021

शब्द


 घनिष्ठ तारतम्यता ही कहेंगे 

अशोक के पेड़ का सहचर होना 

 कोयल गौरेया का ढेरों शब्द चोंच में दबाकर लाना 

मीठे स्वर में प्रतिदिन सुबह आस-पास फैलाना 

मन की प्रवृत्ति ही है कि वह 

रखता है शब्दों का लेखा-जोखा

शब्दों का संचय प्रेम को प्राप्त करने जैसा ही है

मौन, मौन ही मौन,मौन में मुखर हुए शब्द

तब तक ही शब्द रहते हैं जब तक कि 

एहसास शून्य से संश्लिष्ट हो नहीं गढ़ता एक चेहरा 

चेहरा बनते ही चिपक जाता है हृदय की भित्ति से 

साँसें छलनी बन छनतीं हैं 

स्वयं के गढ़े सुविधा में पगे विचारों को 

विचारों का तेज शब्दों से छवि गढ़ता है

छवि के प्रति पनपती है प्रीत ज्यों मीरा की। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

रुठ्या सावण भादो


बदरी गरजी मेह न बरसो 

घाम घूमतो फिरे गली 

तेज़ ताप-स्यूँ तपती छाया 

जिवड़ो जोवे छाँव भली।।


रीत प्रीत रा झूलस्या पग

आभे ज्वाला बरस रही 

बेला बूटा बाजर सुख्या

मूँग-मोठ ने चैन नही 

पावस बाट जोवता हलधर

कठ रुठ्यो तू इंद्र बली।।


तारा ढलती रात रोवती

मरु धरा री धधके गोद 

सूनी काया उड़ती माट्टी 

पाखी पाणी खोज्य होद 

ताल-तलैया रित्या पोखर

नीर वाहिनी रूठ चली।।


हूँक हुँकारे पपयो पी की 

कोयल मीठा बोल्य बोल 

नाचे पंख पसार मोरनी

सावण भादु है अनमोल 

बादल बदले वेश घनेरा

सब के मन में आस पली।।


@अनीता सैनी  'दीप्ति'

सोमवार, 5 जुलाई 2021

संघर्ष





 अमृत कलश से छलकती 

अमृत्व के लिबास में लिपटी 

किसी की धड़कन तो किसी की

सांसें बन जीवन में डोलती 

 धरा के नयनों से उतर 

 कपोलों से लुढ़ककर बोलती 

मिट्टी के कण-कण को बींधती

जिजीविषा की कहानी गढ़ती

साँवली सूरत सन्नाटा ओढ़े

थकती न हारती मंद-मंद मुस्कुराती

चराचर के बीचोबीच पालथी मार बैठी 

ऐसे ही एक संघर्ष की बूँद को

 मैंने अमृतपान करते देखा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

वाकपटु


  [ वाकपटु ]

 बार-बार वर्दी क्यों छिपाती है, माँ ?

मेरे पहनने पर प्रतिबंध 

 इतना क्यों घबराती है, माँ ?

मोह में बँधी है इसलिए या 

किनारा अकेलेपन से करती है, माँ ?


ऊहापोह में उलझी, है उदास

कुछ कहती नहीं क्यों है ख़ामोश

विचारों की साँकल से जड़ी ज़बान 

 कल्पना के पँख पर सवार इच्छाएँ 

क्यों उड़न भरने से रोकतीं हैं, माँ ? 


खुला आसमां पर्वत की छाँव

प्रकृति संग,

 साथ पंछियों का भाता बहुत 

चाँद-सितारों से मिलकर बतियाना 

 बड़े होते अंगजात देख 

क्यों अधीर हो जाती है,  माँ ?


प्रीत के लबादे में लिपटी 

वर्दी खूँटी पर टंगी बुलाती है

 सितारे कतारबद्ध जड़े हों कंधे पर

 ऐसे विचार पर विचारकर

वाकपटु कह 

 क्यों उद्विग्न हो जाती है, माँ ?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 19 जून 2021

भँवरजाल


रीत-प्रीत रा उलझ्या धागा

लिपट्या मन के चारु मेर

लाज-शर्म पीढ़े पर बैठी 

झाँझर-झूमर बाँधे बेर ।।


जेठ दुपहरी ओढ़ आँधी 

बदरी भरके लाव नीर 

 माया नगरी राचे भूरो

छाजा नीचे लिखे पीर 

आतो-जातो शूल बिंधतो 

मरु तपे विधना रो फेर।।


टिब्बे ओट में सूरज छिपियो

साँझ करती पाटा राज

ढलती छाया धरा गोद में

अंबर लाली ढोंव काज

पोखर ऊपर नन्हा चुज्जा

पाखी झूम लगाव टेर।।


एक डोर बंध्यो है जिवड़ो

सांस सींचता दिवस ढलो

पूर्णिमा रा पहर पावणा

शरद चाँदनी साथ भलो

तारा रांची रात सोवणी

उगे सूर उजालो लेर।।


@अनिता सैनी 'दीप्ति' 

मंगलवार, 15 जून 2021

घुट्टी



उतावलेपन में डूबी इच्छाएँ
दौड़ती हैं
बेसब्री-सी भूख की तरह
 प्रसिद्धि के लिबास में
आत्मीयता की ख़ुशबू में सनी 
पिलाने मर्म-स्पर्शिनी
उफनते क्षणिक विचारों की
घोंटी हुई पारदर्शी घुट्टी
और तुम हो कि
निर्बोध बालक की तरह
भीगे कपासी फाहे को
होठों में दबाए
तत्पर ही रहते हो पीने को
अवचेतन में अनुरक्त हैं 
विवेक और बुद्धि 
चिलचिलाती धूप का अंगवस्त्र 
कंधों पर रहता है तुम्हारे
फिर भी 
नहीं खुलती आँखें तुम्हारी
भविष्य की पलकों के भार से
अनजान हो तुम
उस अँकुरित बीज की तरह
जिसका छिलका अभी भी
रक्षा हेतु उसके शीश पर है
वैसे ही हो तुम
कोमल बहुत ही कोमल
नवजात शिशु की तरह
तभी तुम्हें प्रतिदिन पिलाते हैं
भ्रमिक विचारों की घोंटी हुई घुट्टी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 7 जून 2021

धूलभरे दिनों में



धूलभरे दिनों में
न जाने हर कोई क्यों था रुठा ?
बदहवासी में सोए स्वप्न
शून्य की गोद में समर्पित आत्मा
नींद की प्रीत ने हर किसी को था लूटा
चेतन-अवचेतन के हिंडोले पर
मनायमान मुखर हो झूलता जीवन
मिट्टी की काया मिट्टी को अर्पित
पानी की बूँदों को तरसती हवा
समीप ही धूसर रंगों में सना बैठा था भानु
पलकों पर रेत के कणों की परत
हल्की हँसी मूछों को देता ताव
हुक़्क़े संग धुएँ को प्रगल्भयता से गढ़ता
अंबार मेघों का सजाए एकटक निहारता
साँसें बाँट रहा था उधार।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 2 जून 2021

मौन प्रभाती



पाखी मन व्याकुल है साथी 
खोई-खोई मौन प्रभाती।
भोर धूप की चुनरी ओढ़े 
विकल रश्मियाँ लिखती पाती।।

मसि छिटकी ज्यूँ मेघ हाथ से
पूछ रहे हैं शब्द कुशलता
नूतन कलियाँ खिले आस-सी
मीत तरु संग साथ विचरता
सुषमा ओट छिपी अवगुंठन 
गगरी भर मधु रस बरसाती।।
 
 पटल याद के सजते बूटे
 छींट प्रीत छिटकाती उजले
रंग कसूमल बिखरी सुधियाँ
पीर तूलिका उर से फिसले
स्वप्न नयन में नित-नित भरती
रात  चाँद की जलती बाती।।

शीतल झोंका ले पुरवाई
उलझे-उलझे से भाव खड़े
कुसुम पात सजते मन मुक्ता 
भावों के गहने रतन जड़े 
भीगी पलकें पथ निहारे 
अँजुरी तारों से भर जाती।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 14 मई 2021

आज उदास क्यों है कविता


 धूसर रंग की ओढ़नी ओढ़े 

आज उदास है क्यों कविता?


इतनी उदास 

कि खिलखिलाहट 

ओढ़ने की लालसा में लिपटी 

जतन की भट्टी में 

स्वयं को तपाती है कविता।।

 

मन के किवाड़ों पर

अवसाद की कुंडी के सहारे 

जड़ा है साँकल से मौन!

शिथिल काया की विवशता 

सूनेपन को समीप बैठा  

लाड़ लड़ाती है कविता।।


बादलों के कोलाहल में

खालीपन है दिखावे का

परायेपन की नमी देख 

दामिनी सी हँसी 

खूँटी पर  टँगाऐ 

बैठी है कविता ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

एक यथार्थ


नाद भरा उड़ता जीवन देख 

ठहरी है निर्बोध भोर की चंचलता

दुपहरी में उघती उसकती इच्छाएँ 

उम्मीद का दीप जलाए बैठी साँझ 

शून्य में विलीन एहसास के ठहरे हैं पदचाप।


यकायक जीवन चक्र भी शिथिल होता गया 

एक अदृश्य शक्ति पैर फैलाने को आतुर है 

समय की परिधि से फिसलती परछाइयाँ 

पाँवों को  जकड़े तटस्थ लाचारी 

याचनाओं को परे धकेलती-सी दिखी।


काया पर धधकते फफोले कंपित स्वर  

किसकी छाया ? कौन है ?

सभी प्रश्न तो अब गौण हैं

मेघों का मानसरोवर से पानी लेने जाना 

कपासी बादलों में ढलकर आना भी गौण है।


चिंघाड़ते हाथियों के स्वर में मदद की गुहार

व्याघ्रता से विचलित बस एक दौड़ है 

गौरया की घबराहट में आत्मरक्षा की पुकार 

हरी टहनियों का तड़प-तड़पकर जल जाना 

कपकपाती सांसों का अधीर हो स्वतः ठहर जाना।


एक लोटा  पानी इंद्र देव का लुढ़काना

झूठ का शीतल फोहा फफोलों पर लगाना

दूधिया चाँदनी में तारों का जमी पर उतरना

निर्ममता के चक्रव्यूह में मानव को उलझा देखा 

जलती देह का जमी पर छोड़ चले जाना

कविता की कोपलें बन बिखरा एक यथार्थ है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

कुछ पल ठहर पथिक

 

 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


  सिक्कों की खनक शोहरत की चमक छोड़ 

  मन को दे कुछ पल विश्राम  तुम 

न दौड़ बेसुध, पथ अंगारों-सा जलता है

मृगतृष्णा न जगा बेचैनी दौड़ाएगी

धीरज धर राह शीतल हो जाएगी।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


छँट जाएँगे बादल काल के

काला कोहरा पक्षी बन उड़ जाएगा 

देख! घटाएँ उमड़-घुमड़कर आएँगीं  

 शीतल जल बरसाएगी बरखा-रानी 

जोहड़ ताल-तलैया नहर-नदियाँ भर जाएँगीं।


 कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


घायल हैं मुरझाए हैं  उलझन में हैं सुमन 

देख! डालिया फूल पत्तों से लद जाएगी 

धरा के आँचल पर लहराएगा लहरिया 

सावन-भादों न बना नयनों को हिम्मत रख  

अंतस में नवाँकुर प्रीत के खिलजाएँगे।


कुछ पल ठहर पथिक

 डगर कठिन  है गंतव्य दूर  तेरा। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

मैं और मेरा अक्स



 अँजुरी से छिटके जज़्बात 

मासूम थे बहुत ही मासूम 

पलकों ने उठाया 

वे रात भर भीगते रहे 

ख़ामोशी में सिमटी

लाचारी ओढ़े निर्बल थी मैं। 


तलघर की कोठरी के कोने में

अनेक प्रश्नों को मुठ्ठी में दबाए 

बेचैनियों में सिमटा

 बहुत बेचैन था मेरा अक्स।

 

 आँखों में झिलमिलाती घुटन

 धुएँ-सा  स्वरुप 

 बारम्बार पीने को प्रयासरत 

दरीचे से झाँकती

विफलता की रैन बनी थी मैं। 


निर्बोध प्रश्नों को

बौद्धिकता के तर्क से सुलझाती

असहाय झूलती 

 बरगद की  बरोह का

धरती में धसा स्तम्भ बनी थी मैं। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

ओल्यूं




राजस्थानी बोली में नवगीत


 पोळी ओटाँ  गूँथू स्वप्ना

चूड़लो पाट उलझावे है 

सांकळ जइया मनड़ो खुड़को 

याद घणी थांरी आवे है।।


महंदी रोळी काजल टिकी

करे बिती बातां ऐ थांरी

 बोली बोलय लोग घणेरा 

तुम्ब जईया लागे खारी

बाट जोवता जीवन बित्यो

हिवड़लो थाने बुलावे  है।।


पैंडे माही टूटी गगरी

हाथा में ढकणी रहगी सा

खूँटी पर ईढ़ानी उलझी

पाणी कंईया लाऊँ सा 

घड़ले ऊपर घड़लो ऊंचो 

पणिहारी बात बणावे है।।


बारह मास स थे घर आया 

दो सावण दो जेठ बताया

 आभा गरजी न मेह बरसो 

प्रीत फूल मन का मुरझाया 

धीरज धर  बाता में उलझी

ढ़लतोड़ी साँझ रुलावे है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 4 अप्रैल 2021

समझ के देवता


उन्हें सब पता है

कि कैसे पानी से झाग बनाने हैं ?

उस झाग को कैसे मन पर पोतना है ?

कैसे शब्दों से एहसास चुराने हैं? 

कैसे डर को  पेट में छिपाना है?

सुविधानुरुप कैसे अनेक कहानियाँ गढ़नी हैं?

दिन महीने वर्ष  प्रत्येक पल को कैसे उलझाना है?

सच्चे भोले माणसों को अदृश्य बिसात में 

 रणनीति के तहत कैसे उलझनों में उलझाना है?

वे सब  जानते  हैं  कैसे? कब? कहाँ?

पैरों की बिबाइयों से पेट में झाँकना है

पेट में अन्न की जगह कैसे डर को छिपाना है?

कैसे हवा के वेग से डर को दौड़ाना  है?

कैसे दिमाग़ की शिराओं में डर को चिपकाना है?

कैसे पोषण का अभाव दिखाकर दफ़नाना है?

डर की मृत देह से कैसे बदबू  फैलानी है?

 शरीर के अंगों को कैसे विकृत करना  है?

उन अबोध माणसों की बुद्धि पर

नासमझी को कैसे हावी करना है?

उन्हें पता है कि कैसे  भेदभाव की

गहरी खाई खोदी जाती है?

इस और उस पार के दायरे को कैसे   

सिखाया और समझाया जाता है ?

खाई पर मंशा का तख़ता कैसे  रखा जाता है?

कैसे मनचाहे इरादों के साथ

मन चाहे लोगों को

इस और उस पार लाया ले जाया जाना है?

कब कहाँ डर की डोर का रंग बदला जाना है?

कैसे डर को एक नाम दिया जाना है?

 धर्म कह कैसे नवीनीकरण किया जाना है? 

समझ के देवता यह सब बखूबी जानते हैं। 


@अनीता सैनी  'दीप्ति'

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

बहनापा खलता है आज


उम्र के तीसरे पड़ाव पर 

 शिथिल पड़ चुकी देह से सुलगतीं सांसें 

उसका बार-बार स्वयं से उलझना

  बेचैनियों में लिपटी तलाशती है जीवन

 ज्यों राहगीर सफ़र में तलाशता छाँव है।

 

  समय की चोट के गहरे निशान

  चेहरे की झुर्रियों से झाँकते रहते हैं  

  झुर्रियाँ मिटाने को तत्पर है आज 

 ज्यों वर्तमान के अतीत के लगे पाँव हैं ।


 प्रेम से किए अनेकों प्रेम के प्रतिकार 

 घुटनों की जकड़न से जकड़े हुए हैं 

  जकड़न को तोड़ने की अभिलाषा 

 भोर टिमटिमाते प्रश्नों के प्रतिउत्तर 

 उससे सौंपती है पात पर।

 

शब्दों में समझ की दूरदर्शिता और 

अँकुरित मंशा को बारीकी से पढ़ना

 इच्छा-अनिच्छा की रस्सी से जीवन को 

 पालना झुलाती ज़िंदगी का कोलाहल

 लिप्त है मौन में ।

 

 पेड़ के  सहारे फूलों को निहारती 

 रोज़ सुबह इंतज़ार में आँखें गड़ाती  

हल्की मुस्कुराहट के साथ क़दम 

 स्वतः साथ-साथ चल पड़ते 

बिछड़कर बहनापा खलता है आज।

 

  कील में अटके कुर्ते को निकालना 

 खुसे धागे को ठीक करते हुए कहना-

  सुगर और बीपी ने किया बेजान है 

 मॉर्निग वाक की सलाह डॉ.की है। 


अनुदेश की अनुपालना अवमानना में ढली 

उसके पदचाप आज-कल दिखते नहीं है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 25 मार्च 2021

फाग



 फाग में हर्षित हैं पुष्प 

 आसमां अबीर बरसा गया 

पात-पात भीगे प्रीत में 

 चेतना पर सौरभ छा गया।


पलाश पैर में बँधी झाँझरी

 हो मुग्ध,रागनी गुनगुना रहा

 शृंगार सुशोभित पुलकित है मन  

 बाट जोहती देहरी गान अनुतान में गा रही।


सुमन सेमल पथ पर बिछाती पवन 

पग-ध्वनि को झोंका तरसता रहा 

 अभिलाषित मन की हूक

 देखो! चकोर चाँद को निहारता रहा।

 

 गोरी कोरी  हथेलियों पर 

  रंग मेंहदी का कसूमल भा गया 

  कर्तव्य भार अंतस गहराया 

 पलक कोर स्मृति नीर बहा गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


रविवार, 21 मार्च 2021

दोहे


 श्याम श्याम राधे कहे

श्याम रंग शृंगार।

श्याम रंग ने ठग लिया

जोगन कह संसार।।


श्याम रंग का लहरिया

स्याह  प्रीत परिधान।

मोह साँवले ने लिया

बने श्याम अभिमान।।


मनमोहन मन में बसे

मन बहोत अनमोल।

मुरलीधर मन को हरे

नहीं प्रीत का मोल।।


छलिया छल की कोठरी 

मायावी है नाम।

कान्हा कान्हा जग कहे

मीरा के हैं श्याम।।


सुख-समृद्धि जग खोजता 

मिला न सुख का छोर।

 जिस मन में कान्हा बसे 

थामे सुख की डोर ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 17 मार्च 2021

माँ कहती है


 औरतें बालकनी में टंगे 

 मिट्टी के झूमर की तरह होतीं हैं 

तभी वे हवा के हल्के स्पर्श से

 मोहनी सुर लहर-सी बिखर जातीं हैं।

 

  कभी मौळी तो कभी कँगन डोरी में

  जड़ी दीं जातीं हैं कोड़ियों के रुप में

  कभी-कभार बंदनबार में जड़ दी जातीं हैं 

  दहलीज़ की शोभा बढ़ाने के लिए।


वात्सल्य ममता की दात्री को

कभी रख दिया जाता है छत की मुँडेर पर

पानी से भरे मिट्टी के पात्र की तरह जो

अनेक पक्षियों को पुन: जीवनदान देता है।

  

  कुछ लोग उन्हें उपवस्त्र समझ 

 किवाड़ों  के पीछे हेंगर में टाँग देतें  हैं 

  विचारों में आई खिन्नता ही कहेंगे

  कि धूल-मिट्टी की तरह उन्हें झाड़ा जाता है।


 परंतु माँ कहती है

 औरतें गमले में भरी मिट्टी की तरह होतीं हैं

 खाद की पुड़िया उनकी आत्मा की तरह होती है 

 जो पौधे को पोषित कर हरा-भरा करती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 14 मार्च 2021

निर्वाण (खग मनस्वी संवाद )


भाग-4 निर्वाण (खग मनस्वी संवाद )


वृक्ष पर बैठ खग  डाल से पँख खुजाते

मद्धिम स्वर में किस्सा पर्वत पार का सुनाया 

एक नगरी मानव की छाया है अविश्वास

मसी के छींटे उद्गार अंतस में उभर आया। 


 विरक्तता भाव बरसा था धरा के आँचल पर 

लो ! प्रकृति न दौंगरा समर्पण का बिछाया

अतृप्ति के भटके भाव में बिखरी चेतना

ज्यों पुष्प मोगरे पर रंग धतूरे का छाया। 


अहं द्वेष क्रोध अंतस के है कुष्ट रोग 

पीड़ा से मती मनोभावों की भ्रष्टता में भारी हुई 

नीलांबर के वितान पर उभरी कलझांईयाँ सी

वेदना की भीगी पंखुड़ियाँ क्षारी हुई। 


तीसरे पहर की पीड़ा क्षितज की लालिमा 

कपासी मेघों का हवा संग बिखर  जाना  

एकाएक झरने-से बहते जीवन में  ठहराव

हलचल अवचेतन की नयनों में उतर आना ।


 संवेदन हीन हैं विचार कलुषित मानव के 

पंख फैलाए व्याकुल मन से खग बोले 

  पलकों की पालकी पर भाव सजाए  

कहो न खग! मनस्वी ने नयनों के पट खोले।


हे सखी! गाथा विश्व में वैभव सम्पन्नता संग 

समझ के दरिया में डूबे मानव व्यवहार की

आत्मछटपटाहट प्राबल्यता प्राप्ती की मंशा 

खंडित चित्त के किवाडों के दुर्व्यवहार की।


 अनभिज्ञ मानव समझे स्वयं को आत्मज्ञानी

ज्यों कर्म कारवाँ बढ़े कोलाहल की झंकार 

सत,रज, तम ठूँठ हुए उजड़े चित्त के मनोभाव 

भ्रम यवनिका मन-दर्पण,धूल-मिट्टी मोह भार।


द्वेष क्रोध को धार लगाते, छूटा प्रीत का हार 

हृदय पाषाण, भाव मरु,लू के थपेड़े हैं स्वभाव

ताप बढ़े काया का ज्यों  किरणों का प्रहार 

स्वार्थसिद्धता पट्टी आँखों पर अतृप्त हैं भाव।


नहीं!नहीं!!नहीं!!!खग,मानव ज्ञाता, है विश्वास

जीवन कलाएँ अर्जित करना,है इसका स्वभाव

बोध-निर्बोध भाव तत्त्व बाँधे, बंधुत्त्व अंबार

पीड़ित पीड़ा में उलझा समझे न विकारों का प्रभाव।


निर्मल-निश्छल स्वभाव,है करुणा का अवतार 

भावों-अभावों से जूझता,टाटी सुखों की बाँधता 

बंजर जीवन भाता किसको? हे खग!

विचार उचटते अंतरमन के,सुख का छप्पर टूटता!


अविश्वास बढ़ा भू पर,देख! छाए बादल विश्वास के

पुरवाई प्रीत, बरसात आस्था के नवांकुर खिलाएगी

वृक्षों पर पात संबंधों के अंकुरित हो खिल जाएँगे 

डाली-डाली लदी फूलों से धरा दुल्हन-सी सज जाएँगी।


द्वेष धुलेगा एक दिन,मन-दर्पण रश्मियों-सा चमकेगा  

हे खग!आभा मुख पर,पुलकित मानवता हर्षाएगी

निश्छल झरना झरे कर्मण्यता का, हैं सौरभ से भाव 

शब्द सुमन सुवासित हो हृदय शीतल कर जाएँगी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


'निर्वाण'

प्रथम द्वितीय एवं तृतीय भाग के लिंक 👇

१. निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

२. निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज) 

३ निर्वाण (चित्त की भित्तियाँ) 

बुधवार, 10 मार्च 2021

निर्वाण (चित्त की भित्तियाँ)


(चित्त की भित्तियाँ -३ )


 विस्मित हो कहे मनस्वी!


फूलों ने स्वरुप स्वयं का बदला!

निशा से नीरस थे प्रभात में खिलखिलाए!

उषा में रंग कसूमल किसने है उड़ेला!

तेज़ रश्मियों ने या सुमन स्वयं मुस्कुराए।


आहा! एक बदरी आई स्नेह सजल हो

करुणा के सुमन खिलाए! ममता बरसाई

मिथ्या स्वप्न की डोरी में था चित्त उलझा

हर्षित पलों की दात्री प्रीत अँजुरी भर लाई।

 

झरना मानवता का मन की परतें भिगोता

वात्सल्यता की सुवास सृष्टि में उतर आई

करुणा की मूरत  उतरी मन आँगन में 

भोर की लालिमा आँचल में स्नेह भर लाई।


रश्मियों का तेज़ ज्यों डग भरती मानवता

चुनड़ी पर धूप ने जड़े सतरंगी सितारें

रेत पर पद-चिन्ह बरखान से उभर आए

दर्शनाभिलाषी भोर का तारा स्वयं को निहारे। 


शीतलता लिए था एक झोंका मरुस्थल पर 

ममत्व की प्रतीति निर्मलता शब्दों से संजोए

भाव-विभोर  मनस्वी के अंतस पर छवि उभर आई

नवाँकुर को छाँव संवेदना की बौछार से पात भिगोए।


 सहसा चिंतन में विघ्न!

 

वृक्ष पर बैठ खग  डाल से पँख खुजाते

मद्धिम स्वर में किस्सा पर्वत पार का सुनाया 

एक नगरी मानव की छाया है अविश्वास

मसी के छींटे उद्गार अंतस में उभर आया। 


 विरक्तता भाव बरसा था धरा के आँचल पर 

लो ! प्रकृति न दौंगरा समर्पण का बिछाया

अतृप्ति के भटके भाव में बिखरी चेतना

ज्यों पुष्प मोगरे पर रंग धतूरे का छाया। 


अहं द्वेष क्रोध अंतस के है कुष्ट रोग 

पीड़ा से मती मनोभावों की भ्रष्टता में भारी हुई 

नीलांबर के वितान पर उभरी कलझांईयाँ सी

वेदना की भीगी पंखुड़ियाँ क्षारी हुई। 


तीसरे पहर की पीड़ा क्षितज की लालिमा 

कपासी मेघों का हवा संग बिखर  जाना  

एकाएक झरने-से बहते जीवन में  ठहराव

हलचल अवचेतन की नयनों में उतर आना ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

'निर्वाण'

प्रथम द्वितीय भाग के लिंक 

१. निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

२. निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज) 

शनिवार, 6 मार्च 2021

निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज)

भाग -२ 

 स्वप्न की अनुगूँज


बुद्धतत्त्व की अन्वेषणा,मनस्वी कानन-कानन डोले

बुद्ध छाँव बने, बुद्ध ही बहता झरना बन बोले

हे प्रिय! पहचानो नियति जीवनपथ की

कंकड़-पत्थर झाड़-झंकार गति जीवनरथ की।


गरजते मेघों से क्यों चोटिल स्वयं को करना 

हवा की प्रीत बरसात के भावों को समझाना 

भांति-भांति के भ्रम भ्रमित कर भटकाएँगे

मृगतृष्णा नहीं जीवन में, ठहराव दीप जलाएँगे।


परीक्षा पृथ्वी पर प्रीत के अटूट विश्वास की

यों व्यर्थ न गँवाओ प्रिय! अमूल्य लड़ियाँ श्वाँस की

तुम पुष्प बन खिल जाना मैं बनूँगा सौरभ 

तुम पेड़ बन लहराना मैं छाँव बनूँगा पथ गौरव।


परोपकार में निहित मानवता की  सुवास हूँ मैं

फल न समझना प्रिय! रसों में मिठास हूँ मैं

काया के शृंगार का न बोझ बढ़ाना तुम 

जीवन के अध्याय विरह को लाड़ लड़ाना तुम।


हे प्रिय! तुम करुणा के दीप जलाना 

दग्ध हृदय पर मधुर शब्दों के फूल बरसाना 

अँकुरित पौध सींचना स्नेह के सागर से

प्रेम पुष्प खिलेंगे छलकाओ सुधा मन गागर से।


सहसा निंद्रा से विचलित हो उठी मनस्वी 

हाय! भोर रश्मियों ने क्यों लूटी मेरे स्वप्न की छवि 

प्रिय!प्रिय!! कह पुकार बौराई बियाबान में

अनुगूँज से सहमी ध्वनि थी स्वयं के अंतरमन में।


ओह! कलरव की गूँज लालिमा धरा पर छाई 

पात-पात हर्षाए ज्यों प्रकृति दुग्ध से नहाई 

मन चाँदनी झरी ज्यों शीतल आभा-सी बरस आई  

प्रीतम की पीर नहीं मद्धिम हँसी होठों ने छलक आई।


अंतस ज्योत्स्ना मुख पर दीप्ति उभर आई थी 

उलझी-उलझी फिरे अकुलाहट निख़र आई थी 

पर्वत पाषाण पादप पात जहाँ दृष्टि वहीं बुद्ध

 काँटों की चुभन से प्रीत, प्रतीति में गवाई सुध।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


प्रथम भाग का लिंक 

भाग-१  निर्वाण  

 निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

मंगलवार, 2 मार्च 2021

निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत)


अंतस के विचारों  में मग्न मनस्वी

स्मृति पन्नों में टोहती स्वयं की छवि

आत्मलीन हो कहे- बियाबान ही साथी

एकांतवास विधना की थाती।


   जीवनपथ के सब साथी झरे 

ज्यों पतझड़ पेड़ से पाती झरे 

उलझीं-उलझीं जब जीवन लताएँ 

  रथ खींचे संग सत गाथाएँ ।

 

झाड़-झंकार के काँटे चुभे,जले पाँव 

वृक्षों की न छाँव मिली न मिली ठाँव 

जेठ दोपहरी की तपती रेत पर  

ज्यों हल जोते खेतिहर अदृश्य खेत पर।


कोरे आसमान ने सहलाया

चाँद-सितारे संगी-साथी सबने बहलाया।

पवन ने प्रीत से लाड़ लड़ाया 

रश्मियों ने पथ पर उजास छलकाया।


हाय! काली रात डराती बहुत थी

गोद चाँदनी की सुहाती बहुत थी

इच्छा-अनिच्छा का खेल था भारी

मुक्त हुई कैसे,न जानूँ क्रम अभी था जारी।


फिर-फिर दुख रुलाता रहता

हृदय भी नीर बहाता रहता

दुख बीता या नयना सूखे  

दुख-सुख हुए पाषाण अब न जीवन दुखे।


  कामना रही न कोई शेष  न कोई चाह   

 मन के संतोष को  मिली थी राह  

व्यग्र छलना अति चतुर रहती सवार 

हाय! उसी डगर पर मिलती बारंबार।


मन टूटा, तन टूटा,टूटा न अटूट विश्वास

मोह-माया का टूटा पिंजर मुक्त हुई हर श्वास

देह धरती पर जले दीप-सी आत्मा में उच्छवास

मनस्वी को मिला बुद्धत्व पहना उन्हीं-सा लिबास।


बुद्धतत्त्व की अन्वेषणा,मनस्वी कानन-कानन डोले

बुद्ध छाँव बने, बुद्ध ही बहता झरना बन बोले

हे प्रिय! पहचानो नियति जीवनपथ की

कंकड़-पत्थर झाड़-झंकार गति जीवनरथ की।


गरजते मेघों से क्यों चोटिल स्वयं को करना 

हवा की प्रीत बरसात के भावों को समझाना 

भांति-भांति के भ्रम भ्रमित कर भटकाएँगे

मृगतृष्णा नहीं जीवन में, ठहराव दीप जलाएँगे।


परीक्षा पृथ्वी पर प्रीत के अटूट विश्वास की

यों व्यर्थ न गँवाओ प्रिय! अमूल्य लड़ियाँ श्वाँस की

तुम पुष्प बन खिल जाना मैं बनूँगा सौरभ 

तुम पेड़ बन लहराना मैं छाँव बनूँगा पथ गौरव।


परोपकार में निहित मानवता की  सुवास हूँ मैं

फल न समझना प्रिय! रसों में मिठास हूँ मैं

काया के शृंगार का न बोझ बढ़ाना तुम 

जीवन के अध्याय विरह को लाड़ लड़ाना तुम।


हे प्रिय! तुम करुणा के दीप जलाना 

दग्ध हृदय पर मधुर शब्दों के फूल बरसाना 

अँकुरित पौध सींचना स्नेह के सागर से

प्रेम पुष्प खिलेंगे छलकाओ सुधा मन गागर से।


सहसा निंद्रा से विचलित हो उठी मनस्वी 

हाय! भोर रश्मियों ने क्यों लूटी मेरे स्वप्न की छवि 

प्रिय!प्रिय!! कह पुकार बौराई बियाबान में

अनुगूँज से सहमी ध्वनि थी स्वयं के अंतरमन में।


ओह! कलरव की गूँज लालिमा धरा पर छाई 

पात-पात हर्षाए ज्यों प्रकृति दुग्ध से नहाई 

मन चाँदनी झरी ज्यों शीतल आभा-सी बरस आई  

प्रीतम की पीर नहीं मद्धिम हँसी होठों ने छलक आई।


अंतस ज्योत्स्ना मुख पर दीप्ति उभर आई थी 

उलझी-उलझी फिरे अकुलाहट निख़र आई थी 

पर्वत पाषाण पादप पात जहाँ दृष्टि वहीं बुद्ध

 काँटों की चुभन से प्रीत, प्रतीति में गवाई सुध।


फूलों ने स्वरुप स्वयं का बदला!

निशा से नीरस थे प्रभात में खिलखिलाए!

उषा में रंग कसूमल किसने है उड़ेला!

तेज़ रश्मियों ने या सुमन स्वयं मुस्कुराए।


आहा! एक बदरी आई स्नेह सजल हो

करुणा के सुमन खिलाए! ममता बरसाई

मिथ्या स्वप्न की डोरी में था चित्त उलझा

हर्षित पलों की दात्री प्रीत अँजुरी भर लाई।

 

झरना मानवता का मन की परतें भिगोता

वात्सल्यता की सुवास सृष्टि में उतर आई

करुणा की मूरत  उतरी मन आँगन में 

भोर की लालिमा आँचल में स्नेह भर लाई।


रश्मियों का तेज़ ज्यों डग भरती मानवता

चुनड़ी पर धूप ने जड़े सतरंगी सितारें

रेत पर पद-चिन्ह बरखान से उभर आए

दर्शनाभिलाषी भोर का तारा स्वयं को निहारे। 


शीतलता लिए था एक झोंका मरुस्थल पर 

ममत्व की प्रतीति निर्मलता शब्दों से संजोए

भाव-विभोर  मनस्वी के अंतस पर छवि उभर आई

नवाँकुर को छाँव संवेदना की बौछार से पात भिगोए।

 

वृक्ष पर बैठ खग  डाल से पँख खुजाते

मद्धिम स्वर में किस्सा पर्वत पार का सुनाया 

एक नगरी मानव की छाया है अविश्वास

मसी के छींटे उद्गार अंतस में उभर आया। 


 विरक्तता भाव बरसा था धरा के आँचल पर 

लो ! प्रकृति न दौंगरा समर्पण का बिछाया

अतृप्ति के भटके भाव में बिखरी चेतना

ज्यों पुष्प मोगरे पर रंग धतूरे का छाया। 


अहं द्वेष क्रोध अंतस के है कुष्ट रोग 

पीड़ा से मती मनोभावों की भ्रष्टता में भारी हुई 

नीलांबर के वितान पर उभरी कलझांईयाँ सी

वेदना की भीगी पंखुड़ियाँ क्षारी हुई। 


तीसरे पहर की पीड़ा क्षितज की लालिमा 

कपासी मेघों का हवा संग बिखर  जाना  

एकाएक झरने-से बहते जीवन में  ठहराव

हलचल अवचेतन की नयनों में उतर आना ।


 संवेदन हीन हैं विचार कलुषित मानव के 

पंख फैलाए व्याकुल मन से खग बोले 

  पलकों की पालकी पर भाव सजाए  

कहो न खग! मनस्वी ने नयनों के पट खोले।


हे सखी! गाथा विश्व में वैभव सम्पन्नता संग 

समझ के दरिया में डूबे मानव व्यवहार की

आत्मछटपटाहट प्राबल्यता प्राप्ती की मंशा 

खंडित चित्त के किवाडों के दुर्व्यवहार की।


 अनभिज्ञ मानव समझे स्वयं को आत्मज्ञानी

ज्यों कर्म कारवाँ बढ़े कोलाहल की झंकार 

सत,रज, तम ठूँठ हुए उजड़े चित्त के मनोभाव 

भ्रम यवनिका मन-दर्पण,धूल-मिट्टी मोह भार।


द्वेष क्रोध को धार लगाते, छूटा प्रीत का हार 

हृदय पाषाण, भाव मरु,लू के थपेड़े हैं स्वभाव

ताप बढ़े काया का ज्यों  किरणों का प्रहार 

स्वार्थसिद्धता पट्टी आँखों पर अतृप्त हैं भाव।


नहीं!नहीं!!नहीं!!!खग,मानव ज्ञाता, है विश्वास

जीवन कलाएँ अर्जित करना,है इसका स्वभाव

बोध-निर्बोध भाव तत्त्व बाँधे, बंधुत्त्व अंबार

पीड़ित पीड़ा में उलझा समझे न विकारों का प्रभाव।


निर्मल-निश्छल स्वभाव,है करुणा का अवतार 

भावों-अभावों से जूझता,टाटी सुखों की बाँधता 

बंजर जीवन भाता किसको? हे खग!

विचार उचटते अंतरमन के,सुख का छप्पर टूटता!


अविश्वास बढ़ा भू पर,देख! छाए बादल विश्वास के

पुरवाई प्रीत, बरसात आस्था के नवांकुर खिलाएगी

वृक्षों पर पात संबंधों के अंकुरित हो खिल जाएँगे 

डाली-डाली लदी फूलों से धरा दुल्हन-सी सज जाएँगी।


द्वेष धुलेगा एक दिन,मन-दर्पण रश्मियों-सा चमकेगा  

हे खग!आभा मुख पर,पुलकित मानवता हर्षाएगी

निश्छल झरना झरे कर्मण्यता का, हैं सौरभ से भाव 

शब्द सुमन सुवासित हो हृदय शीतल कर जाएँगी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

प्रथम द्वितीय एवं तृतीय भाग के लिंक 👇

१. निर्वाण (मनस्वी की बुद्ध से प्रीत) 

२. निर्वाण ( स्वप्न की अनुगूँज) 

३ निर्वाण (चित्त की भित्तियाँ)