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मंगलवार, अक्तूबर 19

उसके तोहफे

 उसके द्वारा दिए गए 

उपहार 

अनोखे होते हैं 

 जुदा, सबसे अलग 

कुकून में लिपटी

 तितली की तरह।


या कहूँ नंगे पाँव दौड़ती

 दुपहरी की  तरह

या फिर झुंड में बैठी

उदास शाम की तरह

बड़े अनोखे होते हैं

उसके द्वारा दिए उपहार।


कभी-कभार उसका

भूले से

अलगनी पर भूल जाना

भीड़ में भटके

अकेलेपन को 

दीन-दुनिया से बे-ख़बर

एकांत को 

सीली-सी रात में अंकुरित

एहसास को 

बड़े अनोखे होते हैं

उसके द्वारा दिए उपहार।


उन भीगे-से पलो में

सौंप देना ऊँची उड़ान

खुला आसमान

तारों को छूने की ललक

देखते ही देखते 

अंत में

मौली से बाँध देना मन को

अनोखे होते हैं उसके तोहफ़े 

अलग,सबसे अलग।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, अक्तूबर 8

आळा रो दिवलो


आळा माही धधके दिवलो 

पछुआ छेड़ मन का तार।

प्रीत लपट्या जळे पतंगा 

निरख विधना रा संसार।।


रुठ्यो बैठो भाव समर्पण 

नयन कोर लड़ावे  लाड़।

खुड बातां का काढ़ जीवड़ो

टेड़ी-मेडी बाँध बाड़।

 विरह प्रेम री पाट्टी पढ़तो 

चुग-चुग आँसू गुँथे हार।।


 बूझे हिय रो मोल बेलड़ी

 यादा ढोव बिखरा पात।

जीवन क्यारी माँज मुरारी

 रम्या साँझ सुनहरी रात।

अंबर तारा बरकी कोंपल

 चाँद हथेल्या रो शृंगार।।


धवल चाँदनी सुरमो सारा 

 जागी हिय की पीर रही।

 थाल सजाया मनुवारा में 

आव भगत की खीर रही। 

हलवो पूरी खांड खोपरो

 झाबा भर-भर दे उपहार।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्द =अर्थ 

आला -ताख,आळा,ताक़

दिवलो -दीपक 

लपट्या -लौ 

बेलड़ी-बेल 

हथेल्या -हथेली 

झाबा-बाँस या पतली टहनियों का बना हुआ गोल और गहरा पात्र, टोकरी


शनिवार, अक्तूबर 2

ट्रेंड



बारिश की बूँदों का 

फूल-पत्तों की अंजुरी में 

 सिमटकर बैठना

बाट जोहती टहनियों का 

हवा के हल्के झोंके के

स्पर्श मात्र से ही 

निश्छल भाव से बिखरना

डाल पर डोलती पवन का 

समर्पण भाव में डूबना

बिन बादल बरसी बरसात का

यह रुप

कभी  ट्विटर पर

 ट्रेंड ही नहीं करता।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


गुरुवार, सितंबर 23

बोलना चाहिए इसे अब



एक समय पहले अतीत
ताश  के पत्ते खेलता था
 नीम तो कभी
पीपल की छाँव में बैठता था 
न जाने क्यों ?
आजकल नहीं खेलता
 घूरता ही रहता है 
 बटेर-सी आँखों से 
घुटनों पर हाथ
 हाथों पर ठुड्डी टिकाए
 परिवर्तनशील मौसम 
ओले बरसाता 
कभी भूचाल लाता 
अतीत का सर 
फफोलों  से मढ़ जाता 
धूल में सना चेहरा 
पेंटिग-सा लगता
नाक बढ़ती 
कभी घटती-सी लगती 
पेट के आकार का 
भी यही हाल है 
पचहत्तर वर्षों से पलकें नहीं झपकाईं 
 बोलना चाहिए इसे अब
नहीं बोलता।
वर्तमान सो रहा है 
बहुत समय से
आजकल दिन-रात नहीं होते
 पृथ्वी एक ही करवट सोती है
बस रात ही होती है 
पक्षी उड़ना भूल गए 
पशु रंभाना 
दसों दिशाएँ  
एक कतार में खड़ी हैं 
मंज़िल एक दम पास आ गई 
जितना अब आसान हो गया 
न जाने क्यों इंसान भूल गया
वह इंसान है
रिश्ते-नाते सब भूल गया 
 प्रकृति अपना कर्म नहीं भूली
हवा चलती है
पानी बहता है पेड़ लहराते हैं
 पत्ते पीले पड़ते हैं 
धरती से नए बीज अंकुरित होते हैं 
वर्तमान अभी भी गहरी नींद में है
उठता ही नहीं 
उसे उठना चाहिए 
दौड़ना चाहिए
किसी ने कहा बहकावे में है 
 स्वप्न में तारों से सजा
 अंबर दिखता है इसे 
मिनट-घंटे बेचैन हैं वर्तमान के
मनमाने के व्यवहार से
 अगले ही पल
यह अतीत बन जाएगा
फिर घूरता ही रहेगा 
बटेर-सी आँखों से 
घुटनों पर  हाथ
हाथों पर ठुड्डी टिकाए।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, सितंबर 16

ममतामयी हृदय



 ममतामयी हृदय पर

अंकुरित शब्दरुपी कोंपलें 

काग़ज़ पर बिखर

जब गढ़ती हैं कविताएँ 

सजता है भावों का पंडाल 

प्रेम की ख़ुशबू से 

मुग्ध मानव मन का

मुखरित होता है पोर-पोर  

अंजूरी से ढुलती संवेदनाएँ

  स्याही में घुल 

शाख़ पर सरकती हैं 

हरितमय आभा लिए 

सकारात्मकता ओस बन 

चमकती है 

पत्तों पर मोती-सी

बलुआ किणकियाँ 

 घोलती हैं करुणा

कलेज़े में

बंधुत्त्व की बल्लरियों के 

नहीं उलझते सिरे 

वो फैलते ही जाते हैं 

स्वच्छन्द गगन में

वात्सल्य की महक लिए 

रश्मियों के  छोर को थामें।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, सितंबर 9

प्रभा प्रभाती


 प्रभा प्रभाती झूमे गाये 

मुट्ठी मोद स्वप्न लाई।

बैठ चौखट बाँटे उजाला 

बिखरे हैं भाव लजाई।।


चाँद समेटे धवल चाँदनी

अंबर तारे लूट रहा।

प्रीत समीरण दाने छाने  

पाखी साथ अटूट रहा।

भोर तारिका करवट बदले 

पलक पोर पे हर्षाई।।


चहके पंख पसार पखेरू

धरणी आँगन गूँज रहा।

छाँव कुमुद गढ़ आँचल ओढ़ा 

तपस टोहता कूँज  रहा।

नीहार मुकुट पहने धरणी 

सजल दूब है इठलाई।।


 कोंपल मन फूटे इच्छाएँ

 बूँटा रंगे रंगरेज।

डाली सौरभ बन लहराए

गढ़े पुरवाई जरखेज।

होले-होले डोले रश्मियाँ

स्वर्णिम आभा है छाई।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, सितंबर 1

उस रोज़



 उस रोज़ 

घने कोहरे में

भोर की बेला में

सूरज से पहले

तुम से मिलने 

 आई थी मैं

लैंप पोस्ट के नीचे

तुम्हारे इंतज़ार में

घंटो बैठी रही 

एहसास का गुलदस्ता

दिल में छिपाए 

पहनी थी उमंग की जैकेट

विश्वास का मफलर

गले की गर्माहट  बना 

कुछ बेचैनी बाँटना

चाहती थी तुमसे

तुम नहीं आए 

रश्मियों ने कहा तुम

निकल चुके हो

 अनजान सफ़र पर।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, अगस्त 30

भरे भादवों बळ मन माही


 भरे भादवों बळ मन माही 

बैरी घाम झुलसाव है 

बदल बादली भेष घणेरा 

अंबरा चीर लुटाव है।।


उखड़ो-उखड़ो खड़ो बाजरो 

ओ जी उलझा मूँग-ग्वार

 हरा काचरा सुकण पड़ग्या

ओल्या-छाना करे क्वार

सीटा सिर पर पगड़ी बांध्या

दाँत निपोर हर्षाव है।।


हाथ-हथेली बजाव हलधर 

छेड़े रागनी नित नई

गीत सोवणा गाव गौरया

हिवड़े उठे फुहार कई

आली-सीली डोल्य किरण्या

समीरण लाड लडाव है।।


सुख बेला बरसाती आई

कुठलो काजल डाल रयो

 मेडा पार लजायो मनड़ो 

होळ्या-होळ्या चाल रयो

ठंडी साँस भरे पुरवाई

झूला पात झूलाव है।।


@अनीता सैनी 'दिप्ति'

शब्द =अर्थ 
घाणेरा=बहुत अधिक
लुटाव=लुटाना
उखड़ो-उखड़ो=रुठा-रुठा
सुकण=सुखना
ओल्या-छाना =छिपाना
सीटा=बाजरे की कलगी
सोवणा =सुंदर
आली-सीली =भीगी हुई
डोल्य = घूमना
कुठलो =अनाज डालने का मिट्टी का एक पात्र
होळ्या-होळ्या=धीरे -धीरे

बुधवार, अगस्त 25

विश्वास के मुट्ठीभर दाने


 विश्वास के मुट्ठीभर दाने 

छिटके हैं समय की रेत पर

गढ़े हैं धैर्य के छोटे-छोटे धोरे 

निष्ठित जल से सींचती है प्रभात।


सूरज के तेज ने टहनियों पर 

  टाँगा है दायित्त्व भार

चाँदनी के झरते रेशमी तार 

चाँद ने गढ़ा सुरक्षा का सुनहरा जाल।


ज़िम्मेदारियों का अँगोछा

कंधों पर डाल

खुरपी से हटाया है 

हवाओं ने  खरपतवार।


थकान के थकते पदचाप

दुपहरी में ढूँढ़ते शीतल छाँव

भावों की बल्लरियों पर 

लताओं ने बिछाया है बिछौना।


धूप दहलीज़ पर बैठ 

दिनभर करती है रखवाली

अँकुरित कोपलों की हथेली में 

 खिलने लगे हैं सुर्ख़ फूल।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अगस्त 21

आज


 हवाओं में छटपटाहट

धूप में अकुलाहट है 

व्यक्त-अव्यक्त से उलझता

आशंकाओं  का ज्वार है।


तर्क-वितर्क के

 उखड़े-उखड़े चेहरे हैं 

कतारबद्ध उद्गार ढोती विनतियाँ  

आस को ताकता अंबर है।


पलकों से लुढ़कते प्रश्न

मचाया विचारों ने कोहराम है 

अभिमान आँखों से झरता 

कैसा मानवता का तिरस्कार है?


ज़ुकाम के ज़िक्र पर जलसा

खाँसने पर उठता बवाल है 

चुप्पी के कँपकपाते होंठ 

सजता नसीहत का बाज़ार है!


पुकारती इंसानीयत

पाषाण लगाते गुहार हैं

मूर्छित मिट्टी रौंदते अहं के पाँव 

स्वार्थ की रस्सी से बँधे विश्व के हाथ हैं!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अगस्त 14

लू



 तपती बालुका पर दौड़ती लू

फफोलों को पाँव से हटाती है

पदचाप धोरे दामन से मिटाती

सूरज बादलों से ढकती है।


मरुस्थल के मौन को तोड़ती 

 कहानियों के पन्ने झोंके संग पलटती है

पीठ पर लादे गोबर के कंडे 

हिय के संताप से झुलसाती है।


कोई  टीस उठी होगी हृदय में 

पलकों को खारे पानी से धोती है

सूखे पत्तों-सी झरती साँसें उठाए

धूप में गगरी उम्मीद की भरने निकलती है।


अश्रुभार गले में मुक्ताहार 

 स्वछंदता की ओढ़नी ओढ़ा करती है

वर्तमान की पूरती चौकी आटे से

सकारात्मकता का पाठ पढ़ाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, अगस्त 10

खोटी बाताँ बोल्यो सुंटो



 खोटी बाताँ बोल्यो सुंटो

सावण आय भड़काव जी

पात-पात पर नेह लुढ़काव

 विरहण पीर उठावे जी।।


छेकड़ माही मेह झाँकतो 

खुड़कावे हिय पाट झड़ी 

थळियाँ माही मुढ्ढो घाल्याँ 

कामण गाया खाट खड़ी 

भीगो मनड़ो आपे धड़के

लाज घणी मन आवे जी ।।


खारे जल स्यूँ नहाया गाल

कुणा कौडी छिपाई है

यादा सोवे सीली रजनी 

सौत आज पुरवाई है

झींगुर उड़े झाँझर झँकावे

दादुर टेर बुलावे जी ।।


गगरी पाणी लावे बदली 

मुछा ताव दे मेघ धनुष

वसुंधरा रे उजले रुप पर 

सतरंगी झालर इंद्रधनुष  

 रुठ्या-साज शृंगार ढोला 

डाळी फूल लटकाव जी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्द-अर्थ

सुंटो-बरसात की तेज बौछार

लुढ़काव-गिराना

छेकड़-सुराख़

थळियां -दहलीज़

कुणा-कोना

डाळी-टहनी

रुठ्या-रुठ गया

खुड़कावे-आवाज़ करना

पता-पत्ता

खोटी -झूठी,मिथ्या

बोल्यो -बोलना

लटकाव-लटका हुआ

सोमवार, अगस्त 2

अबोलापन

 अबोलापन

बाँधता  है 

संवाद से पहले

होनेवाली 

भावनाओं की

उथल-पुथल को

साँसों की डोरी से ।


मौन भी काढ़ता कसीदा 

आदतन विराजित

एक कोने में 

संवादहीनता ओढ़े

दर्शाता हृदय की गूढ़ता को ।


भाव-भंगिमा का

बिखराव 

एहसास के सेतु पर अकुलाहट 

समयाभाव

अपेक्षा का ज्वार  

गहरे

बहुत गहरे में

है डूबोता।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, जुलाई 31

मनवार करे मनड़ो ढोला


मनवार करे मनड़ो  ढोला
 कद मनावा रुठ्या मीत।
गुड़-शक्कर रो घोळ घौलियो 
 मिठे जल स्यूँ सींची प्रीत।।

 बेल बूंटा बढ्या घणेरा
अंगना मंजरी फूले 
 प्रीत बादली छींटा छलके 
 झड़ी झूमती झुल्या झूले 
 सूना ढोला आज मालियो 
 राचे काजल कुंप गीत।।

गोटा-पत्ती ओढ़ लहरियो 
पछुआ झांझरी झंकाव
गाँव-गलियाँ घूम अडाइयाँ
पाखी पुन मुग्ध लहराव  
धुन छेड़ मन भावन गडरियो
पल्लू पगला उलझ रीत।।

 धरती गोदां सोवे सुपणो
अंग-अंग अनंग उमड़े
सांझ  लालड़ी उजलो मुखड़ो
 अंबर आँचल आस जड़े 
फूला में पद छाप निहारूं 
 प्रेम हृदय पावन पुनीत।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्द-अर्थ

अडाइयाँ-मैदानी भूमि
मालियाँ=  घर के ऊपरी भाग का मुख्य कक्ष 
 ढोला-प्रिय
मनवार - स्वागत करना
घणेरा-बहुत सारे
लहरियों-मिश्रित रंगों का प्रिंट जो दुपट्टे, साड़ी और ओढ़नी में होता है 
गोदां -गोद में
सुपणो- स्वप्न

गुरुवार, जुलाई 22

ऋतु सुवहानी सावण की



बोल कोयलड़ी मीठा बोल्य
ऋतु सुहावनी सावण की।
झड़ी लागी है चौमास की
आहट पाहुन आवण की।।

हरी चुनरिया ओढ़ी धरती
घूम घटायाँ घाल्य घेर
चपला गरजती बाड़ा डोल्य
चूळा फूंक हुई अबेर
डाळी जईया झूम जिवड़ो 
पूर्वा पून सतावण की।। 

अंबर छाई बदरी काली
गोखा चढ़ी उजली धूप
पुरवाई झाला दे बुलाव 
फूल-पता रो निखर रूप
 नाचे पंख पसार मोरनी
 हूक उठी है गांवण की।।

बाग-बगीचा झूल्या पड़ ग्या 
कुआँ ऊपर गूँजे गीत
कसूमल कली पुष्प लहराय
मेह छींटा छिटके प्रीत
गिगनार चढ़ो चाँद ताकतो
मनसा नींद चुरावण की।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, जुलाई 19

समय दरिया



 समय दरिया में डूब न जाऊँ माझी

पनाह पतवार में जीवन पार लगाना है 

भावनाओं के ज्वार-भाटे से टकरा

अंधकार के आँगन में दीप जलाना है।


शांत लहरों पर तैरते पाखी के पंख

परमार्थ के अलौकिक तेज से बिखरे 

चेतना की चमक से चमकती काया

उस पाहुन को  घरौंदे में पहुँचाना है।


चराचर की गिरह से मुक्त हुए हैं स्वप्न

शून्य के पहलू में बैठ लाड़ लड़ाना है 

अंतस छिपी इच्छाओं का हाथ बँटाते

आवरण श्वेत जलजात से करना है।


नदी के गहरे में बहुत गहरे में उतर

अनगढ़ पत्थरों पर कविता को गढ़ते

 सीपी-से सत्कर्म कर्मों को पहनाकर 

झरे मृदुल वाणी ऐसा वृक्ष लगाना है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, जुलाई 15

पगलां माही कांकर चुभया 



 पगलां माही कांकर चुभया 

 जूती बांध्य बैर पीया।

 छागल पाणी छलके आपे 

थकया सांध्य पैर पीया।।


कुआँ जोहड़ा ताल-तलैया

बावड़ थारी जोव बाट

बाड़ करेला पीला पड़ ग्यो 

 सून डागल ढ़ाळी खाट

मिश्री बरगी  बातां थारी 

नींद  होई गैर पीया।।


धरती सीने डाबड़ धँसती 

 खिल्य कुंचा कोरा फूल

मृगतृष्णा मंथ मरु धरा री

खेल घनेरो खेल्य धूल

डूह ऊपर झूंड झूलस्या

थान्ह पुकार कैर पीया।।


 रात सुहानी शीतल माटी 

ठौर ढूंढ़ रया बरखान

दूज चाँद सो सोवे मुखड़ो

आभ तारक सो अभिमान

छाँव प्रीत री बनी खेजड़ी 

चाल्य पथ पर लैर पीया।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति '

रविवार, जुलाई 11

शब्द


 घनिष्ठ तारतम्यता ही कहेंगे 

अशोक के पेड़ का सहचर होना 

 कोयल गौरेया का ढेरों शब्द चोंच में दबाकर लाना 

मीठे स्वर में प्रतिदिन सुबह आस-पास फैलाना 

मन की प्रवृत्ति ही है कि वह 

रखता है शब्दों का लेखा-जोखा

शब्दों का संचय प्रेम को प्राप्त करने जैसा ही है

मौन, मौन ही मौन,मौन में मुखर हुए शब्द

तब तक ही शब्द रहते हैं जब तक कि 

एहसास शून्य से संश्लिष्ट हो नहीं गढ़ता एक चेहरा 

चेहरा बनते ही चिपक जाता है हृदय की भित्ति से 

साँसें छलनी बन छनतीं हैं 

स्वयं के गढ़े सुविधा में पगे विचारों को 

विचारों का तेज शब्दों से छवि गढ़ता है

छवि के प्रति पनपती है प्रीत ज्यों मीरा की। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, जुलाई 9

रुठ्या सावण भादो


बदरी गरजी मेह न बरसो 

घाम घूमतो फिरे गली 

तेज़ ताप-स्यूँ तपती छाया 

जिवड़ो जोवे छाँव भली।।


रीत प्रीत रा झूलस्या पग

आभे ज्वाला बरस रही 

बेला बूटा बाजर सुख्या

मूँग-मोठ ने चैन नही 

पावस बाट जोवता हलधर

कठ रुठ्यो तू इंद्र बली।।


तारा ढलती रात रोवती

मरु धरा री धधके गोद 

सूनी काया उड़ती माट्टी 

पाखी पाणी खोज्य होद 

ताल-तलैया रित्या पोखर

नीर वाहिनी रूठ चली।।


हूँक हुँकारे पपयो पी की 

कोयल मीठा बोल्य बोल 

नाचे पंख पसार मोरनी

सावण भादु है अनमोल 

बादल बदले वेश घनेरा

सब के मन में आस पली।।


@अनीता सैनी  'दीप्ति'

सोमवार, जुलाई 5

संघर्ष





 अमृत कलश से छलकती 

अमृत्व के लिबास में लिपटी 

किसी की धड़कन तो किसी की

सांसें बन जीवन में डोलती 

 धरा के नयनों से उतर 

 कपोलों से लुढ़ककर बोलती 

मिट्टी के कण-कण को बींधती

जिजीविषा की कहानी गढ़ती

साँवली सूरत सन्नाटा ओढ़े

थकती न हारती मंद-मंद मुस्कुराती

चराचर के बीचोबीच पालथी मार बैठी 

ऐसे ही एक संघर्ष की बूँद को

 मैंने अमृतपान करते देखा।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, जुलाई 2

वाकपटु


  [ वाकपटु ]

 बार-बार वर्दी क्यों छिपाती है, माँ ?

मेरे पहनने पर प्रतिबंध 

 इतना क्यों घबराती है, माँ ?

मोह में बँधी है इसलिए या 

किनारा अकेलेपन से करती है, माँ ?


ऊहापोह में उलझी, है उदास

कुछ कहती नहीं क्यों है ख़ामोश

विचारों की साँकल से जड़ी ज़बान 

 कल्पना के पँख पर सवार इच्छाएँ 

क्यों उड़न भरने से रोकतीं हैं, माँ ? 


खुला आसमां पर्वत की छाँव

प्रकृति संग,

 साथ पंछियों का भाता बहुत 

चाँद-सितारों से मिलकर बतियाना 

 बड़े होते अंगजात देख 

क्यों अधीर हो जाती है,  माँ ?


प्रीत के लबादे में लिपटी 

वर्दी खूँटी पर टंगी बुलाती है

 सितारे कतारबद्ध जड़े हों कंधे पर

 ऐसे विचार पर विचारकर

वाकपटु कह 

 क्यों उद्विग्न हो जाती है, माँ ?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, जून 19

भँवरजाल


रीत-प्रीत रा उलझ्या धागा

लिपट्या मन के चारु मेर

लाज-शर्म पीढ़े पर बैठी 

झाँझर-झूमर बाँधे बेर ।।


जेठ दुपहरी ओढ़ आँधी 

बदरी भरके लाव नीर 

 माया नगरी राचे भूरो

छाजा नीचे लिखे पीर 

आतो-जातो शूल बिंधतो 

मरु तपे विधना रो फेर।।


टिब्बे ओट में सूरज छिपियो

साँझ करती पाटा राज

ढलती छाया धरा गोद में

अंबर लाली ढोंव काज

पोखर ऊपर नन्हा चुज्जा

पाखी झूम लगाव टेर।।


एक डोर बंध्यो है जिवड़ो

सांस सींचता दिवस ढलो

पूर्णिमा रा पहर पावणा

शरद चाँदनी साथ भलो

तारा रांची रात सोवणी

उगे सूर उजालो लेर।।


@अनिता सैनी 'दीप्ति' 

मंगलवार, जून 15

घुट्टी



उतावलेपन में डूबी इच्छाएँ
दौड़ती हैं
बेसब्री-सी भूख की तरह
 प्रसिद्धि के लिबास में
आत्मीयता की ख़ुशबू में सनी 
पिलाने मर्म-स्पर्शिनी
उफनते क्षणिक विचारों की
घोंटी हुई पारदर्शी घुट्टी
और तुम हो कि
निर्बोध बालक की तरह
भीगे कपासी फाहे को
होठों में दबाए
तत्पर ही रहते हो पीने को
अवचेतन में अनुरक्त हैं 
विवेक और बुद्धि 
चिलचिलाती धूप का अंगवस्त्र 
कंधों पर रहता है तुम्हारे
फिर भी 
नहीं खुलती आँखें तुम्हारी
भविष्य की पलकों के भार से
अनजान हो तुम
उस अँकुरित बीज की तरह
जिसका छिलका अभी भी
रक्षा हेतु उसके शीश पर है
वैसे ही हो तुम
कोमल बहुत ही कोमल
नवजात शिशु की तरह
तभी तुम्हें प्रतिदिन पिलाते हैं
भ्रमिक विचारों की घोंटी हुई घुट्टी।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, जून 7

धूलभरे दिनों में



धूलभरे दिनों में
न जाने हर कोई क्यों था रुठा ?
बदहवासी में सोए स्वप्न
शून्य की गोद में समर्पित आत्मा
नींद की प्रीत ने हर किसी को था लूटा
चेतन-अवचेतन के हिंडोले पर
मनायमान मुखर हो झूलता जीवन
मिट्टी की काया मिट्टी को अर्पित
पानी की बूँदों को तरसती हवा
समीप ही धूसर रंगों में सना बैठा था भानु
पलकों पर रेत के कणों की परत
हल्की हँसी मूछों को देता ताव
हुक़्क़े संग धुएँ को प्रगल्भयता से गढ़ता
अंबार मेघों का सजाए एकटक निहारता
साँसें बाँट रहा था उधार।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, जून 2

मौन प्रभाती



पाखी मन व्याकुल है साथी 
खोई-खोई मौन प्रभाती।
भोर धूप की चुनरी ओढ़े 
विकल रश्मियाँ लिखती पाती।।

मसि छिटकी ज्यूँ मेघ हाथ से
पूछ रहे हैं शब्द कुशलता
नूतन कलियाँ खिले आस-सी
मीत तरु संग साथ विचरता
सुषमा ओट छिपी अवगुंठन 
गगरी भर मधु रस बरसाती।।
 
 पटल याद के सजते बूटे
 छींट प्रीत छिटकाती उजले
रंग कसूमल बिखरी सुधियाँ
पीर तूलिका उर से फिसले
स्वप्न नयन में नित-नित भरती
रात  चाँद की जलती बाती।।

शीतल झोंका ले पुरवाई
उलझे-उलझे से भाव खड़े
कुसुम पात सजते मन मुक्ता 
भावों के गहने रतन जड़े 
भीगी पलकें पथ निहारे 
अँजुरी तारों से भर जाती।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, मई 14

आज उदास क्यों है कविता


 धूसर रंग की ओढ़नी ओढ़े 

आज उदास है क्यों कविता?


इतनी उदास 

कि खिलखिलाहट 

ओढ़ने की लालसा में लिपटी 

जतन की भट्टी में 

स्वयं को तपाती है कविता।।

 

मन के किवाड़ों पर

अवसाद की कुंडी के सहारे 

जड़ा है साँकल से मौन!

शिथिल काया की विवशता 

सूनेपन को समीप बैठा  

लाड़ लड़ाती है कविता।।


बादलों के कोलाहल में

खालीपन है दिखावे का

परायेपन की नमी देख 

दामिनी सी हँसी 

खूँटी पर  टँगाऐ 

बैठी है कविता ।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

 

गुरुवार, अप्रैल 22

एक यथार्थ


नाद भरा उड़ता जीवन देख 

ठहरी है निर्बोध भोर की चंचलता

दुपहरी में उघती उसकती इच्छाएँ 

उम्मीद का दीप जलाए बैठी साँझ 

शून्य में विलीन एहसास के ठहरे हैं पदचाप।


यकायक जीवन चक्र भी शिथिल होता गया 

एक अदृश्य शक्ति पैर फैलाने को आतुर है 

समय की परिधि से फिसलती परछाइयाँ 

पाँवों को  जकड़े तटस्थ लाचारी 

याचनाओं को परे धकेलती-सी दिखी।


काया पर धधकते फफोले कंपित स्वर  

किसकी छाया ? कौन है ?

सभी प्रश्न तो अब गौण हैं

मेघों का मानसरोवर से पानी लेने जाना 

कपासी बादलों में ढलकर आना भी गौण है।


चिंघाड़ते हाथियों के स्वर में मदद की गुहार

व्याघ्रता से विचलित बस एक दौड़ है 

गौरया की घबराहट में आत्मरक्षा की पुकार 

हरी टहनियों का तड़प-तड़पकर जल जाना 

कपकपाती सांसों का अधीर हो स्वतः ठहर जाना।


एक लोटा  पानी इंद्र देव का लुढ़काना

झूठ का शीतल फोहा फफोलों पर लगाना

दूधिया चाँदनी में तारों का जमी पर उतरना

निर्ममता के चक्रव्यूह में मानव को उलझा देखा 

जलती देह का जमी पर छोड़ चले जाना

कविता की कोपलें बन बिखरा एक यथार्थ है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'