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बुधवार, नवंबर 9

स्त्री भाषा



 

परग्रही की भांति

धरती पर नहीं समझी जाती

स्त्री की भाषा

भविष्य की संभावनाओं से परे 

किलकारी की गूँज के साथ ही 

बिखर जाते हैं उसके पिता के सपने

बहते आँसुओं के साथ 

सूखने लगता है

माँ की छाती का दूध

बेटी के बोझ से ज़मीन में एक हाथ 

धँस जाती हैं उनकी चारपाई 

दाई की फूटती नाराज़गी 

दायित्व से मुँह मोड़ता परिवार

माँ कोसने लगती हैं 

 अपनी कोख को 

उसके हिस्से की ज़मीन के साथ

छीन ली जाती है भाषा भी 

चुप्पी में भर दिए जाते हैं

मन-मुताबिक़ शब्द 

सुख-दुख की परिभाषा परिवर्तित कर  

जीभ काटकर

 रख दी जाती है उसकी हथेली पर 

चीख़ने-चिल्लाने के स्वर में उपजे

शब्दों के अर्थ बदल दिए जाते हैं

ता-उम्र  ढोई जाती है उनकी भाषा

एक-तरफ़ा प्रेम की तरह।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अक्तूबर 29

मेरी दहलीज़ पर



भोर का बालपन

घुटनों के बल चलकर आया था

उस रोज़ मेरी दहलीज़ पर

गोखों से झाँकतीं रश्मियाँ

ममता की फूटती कोंपलें

उसकने लगी थीं मेरी हथेली पर

बदलाव की उस घड़ी में

छुप गया था चाँदबादलों की ओट में

सांसें ठहर गई थीं हवा की

बदल गया था

भावों के साथ मेरी देह का रंग

मैं कोमल से संवेदनशील

और पत्नी से माँ बन गई।

 

आँचल से लिपटी रातें सीली-सी रहतीं

मेरे दिन दौड़ने लगे थे

उँगलियाँ बदलने का खेल खेलते पहर

वे दिन-रात मापने लगे

सूरज का तेज विचारों में भरता

मेरा प्रतिबिम्ब अंबर में चमकने लगा

नूर निखरता भावनाओं का

मैं शीतल चाँदनी-सी झरती रही

बदल गया था

भावों के साथ मेरी देह का रंग

मैं कोमल से संवेदनशील

और पत्नी से माँ बन गई। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


बुधवार, अक्तूबर 26

काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर




मेरी मानस पुत्री के जन्म पर मेरी माँ उतनी ही ख़ुश है जितनी पहली बार वह नानी बनने पर थी। क़लम के स्पर्श मात्र से झरता है प्रेम अब हम दोनों के बीच। माँ के हृदय में उठती हैं हिलोरें भावों कीं जो मेरी क़लम में शब्द बनकर उतर आते हैं।

आज मेरे नवीनतम काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर Bodhi Prakashan जयपुर के कार्यालय में अपने-अपने क्षेत्र के स्वनामधन्य महानुभावों
श्री माया मृग जी (संचालक:बोधि प्रकाशन, जयपुर )

श्री  M.P. Saini 
(वरिष्ठ अधिवक्ता व पूर्व अध्यक्ष सैनी समाज, जयपुर 
अध्यक्ष: सिविल राइट्स सोसायिटी, जयपुर)

श्री डॉ.कमल सिंह जी (प्राचार्य एवं वरिष्ठ शिक्षाविद, जयपुर)
एवं मेरे प्रिय पुत्र-पुत्री
का सानिध्य, स्नेह, उत्साहवर्धन, आशीर्वाद व मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
यह ख़ुशी आपके साथ साझा करते हुए साहित्यिक जवाबदेही का एहसास होते हुए मन प्रफुल्लित है।
पुस्तक के आकार लेने तक की प्रक्रिया में शामिल समस्त महानुभावों का हृदय से आभार।

कविता संग्रह 'टोह'  प्राप्त करने हेतु अमेज़ॉन लिंक-




@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, अक्तूबर 23

बिरला गान



समय ने सफ़ाई से छला  

उस सरल-हृदय ने मान लिया 

कि गृहस्थ औरतों का क़लम पर 

दूर-दूर तक कोई अधिकार नहीं।


अतृप्त निगाहों से घूरती किताबों को

ज्यों ज़िंदगी ने सारे अनसुलझे रहस्य

 स्याही में लिप इन्हीं पन्नों में छुपाए हैं

 उसकी ताक़त से रू-ब-रू

 क़लम सहेजकर रखती है।


क़लम के अपमान पर खीझती 

सीले भावों की बदरी-सी बरसती  

उसके स्पर्श मात्र से झरता प्रेम

वह वियोगिनी-सी  तड़प उठती है।


 पंन्नों पर उँगली घुमाती

एक-एक पंक्ति को स्पर्शकर

बातें कविता-कहानियों-सी गढ़ती 

शब्द नहीं

आँखें बंदकर अनगढ़ भावों को पढ़ती है।


 अनपढ़ नहीं है वह 

गृहस्थी की उलझनों में उलझी 

 शब्दों से मेल-जोल कम रखती है 

 उनसे जान-पहचान का अभाव 

बढ़ती दूरियों से बेचैनी में सिमटी 

आत्म  छटपटाहट से लड़ती है।


शब्दों को न पहचानना खलता है उसे

आत्मविश्वास की उठती हिलोरों संग

 साँझ की लालिमा-सी 

भोर का उजाला लिए कहती है-

 लिखती है मेरी बेटी

क्या लिखती है वह नहीं जानती

जानती है बस इतना कि लिखती है मेरी बेटी

पहाड़-सी कमी

 छोटे से वाक्य में पूर्णकर लेती है माँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, अक्तूबर 9

मैं जब तुम बनकर जीती हूँ


मैं जब, तुम बनकर जीती हूँ

तब मैं जी रही होती हूँ आकाश

हृदय पर उगते उन्मुक्त भाव

धूप के टुकड़ों से सींचती 

भोर के क़दमों की आहट पर 

क्षितिज-सा समर्पण जी रही होती हूँ 


मैं जब तुम बनकर जीती हूँ

तब मैं लिख रही होती हूँ पहाड़

दरारों से झाँकती सदियाँ 

पाषाण के फूटते बोल 

जीवन काढ़े का अनुभव 

परिवर्तन पी रही होती हूँ


जब मैं तुम बनकर जीती हूँ

तब मैं, मैं कहाँ रहती हूँ

बिखर रही होती हूँ काग़ज़ पर

भावों की परछाई शब्दों में ढलती 

उस वक़्त कविता-कहानियों का 

अनकहा ज़िक्र जी रही होती हूँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, सितंबर 24

दायित्व


मुझे सुखाया जा रहा है

सड़क के उस पार खड़े वृक्ष की  तरह

ठूँठ पसंद हैं इन्हें

वृक्ष नहीं!

वृक्ष विद्रोह करते हैं!

जो इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं

समय शांत दिखता है

परंतु विद्रोही है 

इसका स्वयं पर अंकुश नहीं है 

तुम्हारी तरह, उसने कहा।

उसकी आँखों से टपकते

आँसुओं की स्याही से भीगा हृदय 

उसी पल कविता मन पड़ी थी मेरे 

सिसकते भावों को ढाँढ़स बँधाया

कुछ पल उसका दर्द जिया

उसकी जगह

खड़े होने की हिम्मत नहीं थी मुझ में 

मैंने ख़ुद से कहा-

मैं अति संवेदनशील हूँ!

और अगले ही पल

मैंने अपना दायित्वपूर्ण किया!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, सितंबर 15

भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई


सांसों से उलझते भाव 

जीभ से लिपटते स्वर

होंठों का कंपन 

समय की कोख में सदियों ठहरे 

कितनी ही बोलियों ने गर्भ बदले 

असंख्य चोटें खाईं 

अभावों को भोग 

भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई 

अथाह गहराई हृदय की अकुलाहट 

हवा में तैरते मछलियों से शब्द 

एक-एक शब्द में प्राण फूँके 

टहलता जीवन, जीवन जो

स्वयं कहानी कहता है अपनी 

कहता है-

विरासत के भोगियों !

प्रेम है मुझसे!

तब ढूँढ़ लो उस ठठेरे को

भोगी जिसने प्रथम शब्द की प्रसव-पीड़ा 

गढ़ा जिसने पहला शब्द

ऊँ शब्द में पुकार 

माँ शब्द में दुनिया 

पिता शब्द में छाँव गढ़ी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, सितंबर 13

कर्तव्य पथ



उनके लिए घर नहीं बना?

वह घर पर नहीं रह सकता ?

मैंने कुएँ से पूछा, उसने भी यही कहा!

उनके लिए घर नहीं बना

वह घर पर नहीं रह सकता 

सदियों से कुआँ ऐसा ही बोलता आया है

माँ ने कहा -

घर पर रहने से नाकारा, निकम्मा

होने की मुहर लगा दी जाती है 

वह ठप्पा उसे बहुत चुभता है 

चुभन से काया पर फफोले पड़ जाते हैं

जिससे उसे कोढ़ का आभास होता है

तू जानती है न?

कोढ़ी मरीज़ से सब दूर भागते हैं!

समाज से कटकर

वह जीवित नहीं रह सकता 

 टूटने-रूठने, आँखों में पानी भरने के 

किस गुनाह पर पता नहीं

परंतु ऐसे अधिकतर अधिकार

उससे छीन लिए गए हैं।

माँ की हाँ में 

गर्दन नहीं झुकाना चाहती थी 

स्वतः झुक गई

एक स्मृति के साथ 

एक बार उसने कहा था -

पंद्रह लोग गए थे हम 

दस सफ़र में छूट गए

पाँचो के नाम दिल्ली में लिखें हैं 

तब वह टूटना चाहता था, नहीं टूटा 

घर पर रुकना चाहता था, नहीं रुका!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, सितंबर 1

स्वेटर



” औरत हो! कभी अपने हृदय में झाँककर

अपने अंदर की औरत से भी मिल लिया करो 

पूछ लिया करो! दुख-दर्द उसके भी।”


कहते हुए-

उसांस के साथ हाथ बढ़ाएँ 

 और सीने से लगा लिया।


कुछ समय पश्चात चुपचाप उठकर चला गया।

कहते हुए-

”ख़याल रखना, जल्दी मिलते हैं।”


वह नहीं बोलता कभी

आँखें ही बोलती हैं उसकी

 एक छोर भी न पकड़ा और 

वर्षों से बुना

शिकायतों का स्वेटर एक पल में उधेड़ गया।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, अगस्त 29

वीरानियों में सिमटी धरती


वीरानियों में सिमटी धरती 

चाँद, सूरज टंगा अंबर 

मरुस्थल पैर नहीं जलाता

उस पर चलनेवालों के

बच्चे नंगे पाँव दौड़ते हैं!

प्यास गला नहीं घोंटती

 पशु-पक्षियों का 

बादलों की छाँव होती है! 


न जाने क्यों पुरुष दिन-रात

सिसकते  हैं?

सूखे कुएँ-तालाबों को देखकर

मरुस्थल भी रोता हुआ 

दहाड़ मारता है!

गर्भ में सूखते शिशुओं को देख 

माताएँ भूल गई हैं सिसकना!


राजस्थान घूमने आए सैलानी

कवि-लेखक भी मुग्ध हो

कविता-कहानियाँ लिखते हैं

 पानी के मटके लातीं औरतों की

तस्वीर निकाली जाती है

मजबूरियों हृदय को छूती हैं

संवेदनाएँ ज़िंदा रहती हैं उनसे 

बरखान, धोरों में प्रेम ढूँढ़ा जाता है

दूर- दूर तक फैले टीलों को

निहारा जाता है

खंडहर बनी बावड़ियों

 गाँव और ग्रामीणों में 

सभ्य हो,

 सभ्यता तलाशी जाती है।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, अगस्त 25

मौन से मौन तक



ऐसा नहीं है कि.

बहुत पहले पढ़ना नहीं आता था उसे 

उस वक़्त भी पढ़ती थी 

वह सब कुछ जो कोई नहीं पढ़ पाता था

 बुज़ुर्गोँ का जोड़ों से जकड़ा दर्द 

उनका बेवजह पुकारना 

समय की भीत पर आई सीलन

सीलन से बने भित्ति-चित्रों को 

पिता की ख़ामोशी में छिपे शब्द 

माँ की व्यस्तता में बहते भाव 

भाई-बहनों की अपेक्षाएँ

वर्दी के लिबास में अलगनी पर टँगा प्रेम

उस समय ज़िंदा थी वह

स्वर था उसमें 

हवा और पानी की तरह

बहुत दूर तक सुनाई देता था 

ज़िंदा हवाएँ बहुधा अखरती हैं 

परंतु तब वह प्राय: बोलती थी

गाती-गुनगुनाती

सभी को सुनाती थी

पसंद-नापसंद के क़िस्से 

 क्या सोचती है

उसकी इच्छाएँ क्या हैं?

ज़िद करती थी ख़ुद से 

रुठे सपनों को मनाने की 

अब भी पढ़ती है निस्वार्थ भाव से 

स्वतः पढ़ा जाता है

आँखें बंद करने पर भी पढ़ा जाता है

परंतु अब वह बोलती नहीं है।



@ अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, अगस्त 18

ग्रामीण औरतें

आपके साथ यह ख़ुशी साझा करते हुए मन प्रफुल्लित है कि अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैश्विक हिंदी पत्रिका 'अनन्य' जो भारतीय कौंसलावास (न्यूयार्क,संयुक्त राज्य अमेरिका ) से निकलती है, उसमें मेरी कविता 'ग्रामीण औरतें' को स्थान मिला है l
आप भी पढ़िए मेरी कविता और पत्रिका 'अनन्य' का विस्तृत विवरण व लिंक-

https://twitter.com/jagdishvyom/status/1582432743954165760?t=zbfL9XKyOkxkIgMsbI1_hg&s=08

न्यूयॉर्क में स्थित भारतीय कौंसलावास  से निकलने वाली वैश्विक हिंदी पत्रिका ‘अनन्य’ (अनन्य मुख्य पत्रिका) का अक्टूबर अंक आप के हाथों में सौंपते हुए हर्ष हो रहा है । 
 
 
इस अंक में शामिल हैं -
 
 विनय मिश्र और जगदीश पंकज के नवगीत

प्रत्यक्षा और अशोक मिश्र की कहानियाँ 

महेश शर्मा और राम करन की लघु कथा 
दुष्यंत कुमार की कविता – गाँधी जी के जन्म दिन पर, प्रस्तुति अनूप भार्गव 
अनीता सैनी ‘दीप्ति’ की कविता 
डा. अनिता कपूर के हाइकु 
दीपक गुप्ता का लोक कला पर आलेख 
पवन कुमार जैन का व्यंग्य
हरेराम समीप और डा. भावना की ग़ज़लें   
मनोज मोहन  का कला पर आलेख : एकांत घर का रहवासी-रामकुमार  
चित्र और चित्रकार – मुकेश साह 
 
-डा० जगदीश व्योम
Jagdish Vyom 
संपादक
अनन्य


ये कागद की लुगदी से

मटके पर नहीं गढ़ी जाती

और न ही

मिट्टी के लोथड़े-सी चाक पर

चलाई जाती हैं।


माताएँ होती हैं इनकी

ये ख़ुद भी माताएँ होती हैं किसी की 

इनके भी परिवार होते हैं

परिवार की मुखिया होती हैं ये भी।


सुरक्षा की बाड़ इनके आँगन में भी होती है 

 सूरज पूर्व से पश्चिम में इनके लिए भी डूबता है

रात गोद में लेकर सुलाती  

भोर माथा चूमकर इनको भी जगाती है।


 गाती-गुनगुनाती प्रेम-विरह के गीत

पगडंडियों पर डग भरना इन्हें भी आता है 

काजल लगाकर शर्मातीं 

स्वयं की बलाएँ लेती हैं ये भी।


भावनाओं का  ज्वार इनमें भी दौड़ता है

ये भी स्वाभिमान के लिए लड़ती हैं

काया के साथ थकती सांसें 

उम्र के पड़ाव इन्हें भी सताते हैं ।


छोटी-सी झोपड़ी में 

चमेली के तेल से महकता दीपक

सपने  पूरे  होने के इंतज़ार में

 इनकी भी चौखट से झाँकता है।


सावन-भादों इनके लिए भी बरसते हैं

ये भी धरती के जैसे सजती-सँवरती हैं 

चाँद-तारों की उपमाएँ इन्हें भी दी जाती हैं 

प्रेमी होते हैं इनके भी,ये भी प्रेम में होती हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


सोमवार, जुलाई 25

दोहे



1.बैरागी री ओढ़णी,

    सजै सावणा साथ।

    डग डागळा चार भरै,

    पकडे कजरी हाथ।।


2. पथ री पीड़ा कुण पढ़े,

   लुळ-लुळ  चालै आप।

  भाटा जद आवै पगां,

    मन पीड़ावै धाप ।।


3.आभै आँगणा झुमती,

      बुणे बादळी जाल। 

    गाज गिरावै काळजौ,

     सुथरी चालै-चाल ।।


4.  छज्जे माथे मोरियो,

   बुणे सुखां री छाँव।

  सूत करम रौ कातता, 

   छळे समै रौ दाँव।।


5.धीर धरम धीमे चले,

   गीत गावता मौण।

  घणा लुभावै चालता, 

   होवै तिसणा गौण।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, जुलाई 22

कैसी हवा बुन रहे हो साहेब?


”साहेब!

मख़ौल उड़ाना नहीं भूले।"

कहते हुए-

माँओं ने दुधमुँहे बच्चों की आँखों से 

काजल से सने स्वप्न पोंछे 

पिताओं ने भाईचारे का खपरैल तोड़ा 

ये देख बुज़ुर्गों ने भी चुप्पी साधी  

गाय की पहली रोटी छीनी 

तो कहीं कौवों की मुंडेर

किसान का कलेवा छूटा तो 

वहीं हल ठहर-ठहरकर चलने लगा 

अभावग्रस्त संपन्नता को ताकते 

 सभ्यता के इस दौर में 

संभ्रांतों  की वृद्धि में इज़ाफ़ा  हुआ

शब्द, विचारों में

वर्तमान निखर कर बाहर आया 

मुँह फेरने की नई रीत चल पड़ी 

"भव्यता का स्वाद क्या चखा साहेब!

घर की नींव न देखी महलों के नक़्शे बना दिए!"

कहते हुए-

फिर समय झुँझलाया 

और सूखे पत्तों-सा झड़ने लगा 

धैर्य आशाएँ टाँकता-टाँकता खो चुका विवेक 

जवान काया कॉम्पिटिशन के नाम पर

कुढ़-कुढ़कर टूटती है 

गीली लकड़ी-कंडे भी भीगे-से

मिट्टी का चूल्हा मिट्टी की हांडी 

कैसी हवा बुन रहे हो साहेब?

लोग जीवन जीना भूलकर

चने की दाल-से धुएँ में पकने लगे हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


रविवार, जुलाई 17

सैनिकों की बेटियाँ



सैनिकों की बेटियाँ

पिता के स्नेह की परिभाषा 

माँ के शब्दों में पढ़ती हैं।

भावों से पिता शब्द तराशतीं 

 पलक झपकते ही बड़ी हो जाती हैं। 


पिता शब्द में रंग भरतीं 

माँ को सँवारतीं 

स्वप्न के बेल-बूँटों को स्वतः सींचतीं 

टूटने और रूठने से परे वे 

न जाने कब सैनिक बन जाती हैं। 


बादलों की टोह लेतीं 

धूप-छाँव के संगम में पलीं वल्लरियाँ 

रश्मियों-सी निखर जाती हैं। 

हृदय-भीत पर मिट्टी का लेप लगातीं 

न जाने कब घर का स्तंभ बन जाती हैं। 


जटायू हूँ मैं 

कह काल के रावण को डरातीं 

छोटे जूतों में बढ़ते पैरों को छिपातीं 

माँ की ढाल बनते-बनते 

न जाने कब पिता की परछाई बन जाती हैं। 

सैनिकों की बेटियाँ

 पलक झपकते ही बड़ी हो जाती हैं। 



@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, जुलाई 14

सिरजणहार



राम-रमौवळ खग री वाणी 

माणस मोती जूणा है।।

पीड़ा सहे सीप-सी स्रिस्टा

टेम घड़ी री हूणा है।।


रास रचावै सोनल किरणां

डिगै नहीं दोपहरा ईं।

कोनी जाणै लाण रूसणों

तड़के उठे सबेरा ईं।

बादळियै री छेड़े छांटां

सूरज आभै थूणा है।।


चानणों रंग सात रचावै 

नैणा हिवड़ा घोळे हेत।

पग ध्वणियां असाढ़-सावण री

बाट जोवती नाचे रेत।

दूब उचके काळजे माथे 

 फले फूलती कूणा है।।


पता घूळे रोळी हींगळू

मेदिणी निरखे सिणगार।

जोत जळावै बादळ चूंखा

पून पांखा सिलग आंगार।

काळ घट गड्या ईबकाळै

 भाव सागरा सूणा है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

राम-रमौवळ/राम में रमे स्वर या राम मयी स्वर,जूणा/योनि,हूणा/समय,सोनल किरणां/सूर्य की किरण,डिगै/ बैठना ,कोनी /नहीं,जाणै/जानना ,रूसणों/नाराज होना,तड़के/भोर का समय ,बादळियै/बादल,छांटां/बारिस की बुँदे,आभै/आकाश , थूणा/स्तूप,चानणियो/उजाला ,हेत/प्रेम,चूंखा/रुई ,ईबकाळै/इस बार , स्रिस्टा /सृष्टि का निर्माण करने वाला

गुरुवार, जुलाई 7

बापू



भाव सरिता बहती आखरा 

मौण रौ माधुर्य बापू।।

बढ़े-घटे परछाई पहरा

दुख छळे सहचर्य बापू।।


हाथ आंगळी पग पीछाणै

सुख रौ जाबक रूखाळो।

सूत कातता उळझ रया जद 

सुळझावै नित निरवाळो।

तिल-तिल जळती दिवला बाती 

च्यानण स्यूं अर्य बापू।।


काळजड़े रै कूंणा फूटै 

अणभूतयां री कूंपळां।

सूरज किरण्या जीवण सींचे 

खारे समंदर दीप्तोपळा 

खरे ज्ञान रो खेजड़लो है 

देवदूत अनुहार्य बापू।।


टेम  खूंटी आभै टांगता 

 इंदर धणुष थळियां उग्या।

मरू माथे छाया रूंख री 

मोती मणसा रा पुग्या।

सगळां री संकळाई ओटै 

मेदिणी रौ धैर्य बापू।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

छळे/छलना,आंगळी/अंगुली,पीछाणै/पहचाने,जाबक/संपूर्ण; एकदम,रूखाळो/रखवाला,सुळझावै/सुलझाना,निरवाळो/एकांत,अनुहार्य/अनुकरण  करने योग्य,कूंणा/कोना,अणभूतयाँ /अनुभूति,कूंपळा/कोंपल,च्यानण /उजाला,अर्य/(श्रेष्ठ,पूज्य ),दीप्तोपळा/सूर्य कांत मणि,खेजड़लो/खेजड़ी का वृक्ष,टेम/समय,आभै /अंबर,सगळां /सभी,संकळाई/समस्या,ओटै /समाधान करना

सारांश -पिता में छिपे ममता रूपी भावों को दर्शाता यह नवगीत, इसमें नायिका कहती की पिता का स्नेह ऐसे है जैसे शब्दों में भाव हो और मौन में माधुर्य, वह कहती है समय के साथ दिन दोपरा परछाई बढ़ती घटती जैसे सुख के साथी बहुत होते हैं परंतु पिता तो दुख में भी आपने साथ होता है।

अगले अंतरे में नायिका कहती हैं पिता अंगुलियों के स्पर्श मात्र से या पैरों की आहट से पहचान लेता है, वह आपके सुख का बहुत ध्यान रखता है, अगर वह ज़िंदगी की उलझनों में उलझ भी जाता है तब भी किसी को कुछ नहीं कहता अगल एकांत में बैठ उसे सुलझाता रहता है, पिता बाती के जैसे आजीवन तिल-तिल जलता है, इसी पर नायिका ने पिता को उजाले से भी श्रेष्ठ और महान बताया है

अगले अंतरे में नायिका कहती है -हृदय के कोने में यादों की कोंपल फूटती  है, स्मृति में डूबी कहती है जैसे सूरज जग में समंदर रूपी खारे जीवन को सींचता है वैसे ही पिता परिवार में सूर्य कांत मणि के समान है,

वह कहती है पिता शुद्ध ज्ञान का भंडार है, वह देवदूत अनुकरण  करने योग्य है,

वह कहती है- पिता ही है वह जो समय की खूँटी पर अंबर टांग देता है और इंद्र धनुष आँगन में उतार देता है, पिता मरुस्थल के माथे पर छाँव है वह हमारी इच्छाओं का मोती है, सम्पूर्ण परिवार के दुख-दर्द अपने हृदय पर रखकर जीता है तभी नायिका कहती है पिता तो धरती का धैर्य  है।

सभी पिताओं को समर्पित यह नवगीत अगर आप पाठकगण अपने-अपने दृष्टिकोण से पढ़ेंगे तब मुझे बहुत ख़ुशी होगी, हमेशा सारांश संभव नहीं है 🙏

गुरुवार, जून 30

तुम्हें पता है?



तुम्हें पता है?

उधमी बादलों का यों

गाहे-बगाहे उधम मचाना 

सूरज को हथेली से ढकना 

ज़िद्दीपन ओढ़े गरजना 

संस्कारहीनता है दर्शाता

चहुँ ओर फैले अंधकार के

स्वर कोंधते हैं कानो में 

वृक्षों का मौन मातम

कोंपलें करता है कलुषित

आँखों से बहता हाहाकार

धड़कनों पर रहता है सवार 

अवचेतन की गोद में क़लम

 स्थूल पड़े शब्दों का ज्वर

आशंकाओ में उलझी बुद्धि 

 घोंसले में दुबके पखेरू 

अँधेरा बुझाता पहेलियाँ 

चेतना टटोलती उजाला 

दीपक हवाओं की क़ैद में हैं!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, जून 26

जीवण जेवड़ी


जीवण जेवड़ी रहट घूमे 

चौमासे री रात गळे।।

नाच नचावै म्रग तिसणा।

ताती माटी पैर तळे।।


राग अलापे पंछी भोळा 

मूक-बधिर पाहुण ठहरा।

झंझावात जंजाळ बुणावै

धी  बूंटा काडे गहरा।

प्रेम आभै रै पगती बुई

आभ निरखे आपे ढळे।।


लौ लपट्या झूलस्य धरती 

लुट्य तरवर रौ सिणगार।

पून सुरमो सारया थिरके 

काग सिळगावै अंगार।

छाँव रूँख री रूँख रै मथै

दो सूरज अक साथ जळे।।


ओढ़ ओढ़णी चाले टेडी

 रंग बुरकावै नुआँ-नुआँ।

दिण दोपहरी सूरज ढळता 

धूणी सिळगे धुआँ-धुआँ।

काळी-पीळी सज सतरंगी

फिरती-घिरती हिया छळे।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

जेवड़ी /रस्सी, रहट/ कुएँ से पानी निकालने का एक ऐसा यंत्र, जिस से रस्सी से पानी निकाल जाता है, ताती/गर्म,तळे/नीचे,लौ लपट्या/ आग की लपटे,सुरमो/ काजल,रूँख/वृक्ष,मथै/ऊपर,अक/एक,बुरकावै/बरसाना,नुआँ-नुआँ/नया-नया, बुई / छोटा मरुस्थली पौधा होता है जो बदल जैसा सफ़ेद दिखता है।

बुधवार, जून 22

नेह बाखळ रौ

 

टळ-टळ टळके पळसा पाणी 

नीम निमोळ्या पान झड्या।।

नैणां नेह बाखळ रौ उमड्य

दुबड़ हिवड़ा जाल गढ्या।।


बादळ मुठ्या जल सागर रौ 

जीवण सुपणा बौ रौ है।

रोहीड़ रा रूड़ा फूलड़ा

मनड़ा उठ्य हिलोरौ है।

कांगारोळ काळजड़ माथै

सुर-ताळ परवाण चड्या।।


 प्रीत च्यानणा जळे पंतगा

दिवलौ पथ रौ काज करे।

रात चाले ओढ्या अंधेरों

 ताख खूद पै नाज करे।

 समय सोता सिणधु स्यूं गहरा  

 जग नीति रौ पाठ पढ्या।।


ओल्यूं घुळै दूर दिसावरा 

 जोग रूळै ताज जड्यो।

चाँद-चाँदणी मांड-मांडणा 

धुरजी देख्य ठौड़ खड्यो।

गाँव गळी बदळा घर झूपां 

 पँख पसार पखेरू उड्या।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

पळसा/पोळ के भीतर का स्थान, मुख्य द्वार के अंदर का स्थान, निमोळ्या/नीम के फल,बाखळ/घर के सामने खुली जगह या धोरीमोडा के बाहर का स्थान, रूड़ा/रूखा,कांगारोळ/कौवे के ज्यों चिल्लाना, माथै/ऊपर,सिणधु/ सिंधु, च्यानणा/उजाला, घुळै/घुलना या मिश्रित होना, रूळै/मिटी में मिलना, धुरजी/धुर्व तारा, ठौड/एक ही स्थान पर खड़े रहना 

राजस्थानी शब्द एवं उनके अर्थ मैं अपनी स्मृति के आधार पर लिखती हूँ।

बाखळ घर के सामने खुली जगह को कहते हैं। आज-कल न बाखळ रहे न वह बचपन, उमड़ आया हृदय में वह घर, आँगन उम्मीद है आप भाव और भाषा को अवश्य समझेंगे।

जब कोई लिखता है तब वह उस कविता का बहुत ही वृहद रूप जीता है।  एक-एक भाव को शब्दों में गढ़ता है। उसे अनुवाद में कैसे समेटे? मुझे कुछ समय दे मैं प्रयास करुँगी।

सारांश... 'बाखळ जीवन और प्रेम का प्रतीक है' 'बाखळ' घर के बाहर का स्थान है जहाँ बच्चे खेला करते हैं घर के बुजुर्ग बैठे रहते हैं। घर आँगन की स्मृतियों में खोई नायिका के भाव ऐसे हैं जैसे बारिश के समय पळसे से पानी टपकता है यादें हृदय में दूब के ज्यों  जाळ गढ़ रही है। सब कुछ छूटने के बाद नायिका अपने जीवण की कल्पना करती है कि  उसके जीवन ऐसे है जैसे बादल अपनी अंजूरी में पानी लिए खड़ा है और वह स्वप्न बौ रही। रोहिड़े के रूखे फूलों के जैसे स्मृतियाँ हृदय में हिलोरे-सी उठ रही है ये घटनाएँ ऐसे है जैसे कागा, कागारोळ मचा रहा है सुर ताल सातवें आसमान को छू रहें हो।

इसके बाद नायिका कहती है दीपक तो अपने काम में व्यस्त है वह तो पथ पर उजाला कर रहा है प्रीत में  पतंगा अपना जीवन स्वतः गवा रहा है

स्वयं पर व्यंग्य साधती नायिका कहती है रात अंधेरा ओढ़े चलती है परंतु वहीं एक ताख स्वयं पर कितन नाज़ करता है कि मेरे पास उजाला है। वैसे ही वह कहती है जग पग पग पर नीति का पाठ पढ़ाता है परंतु किसने देखा समय का सोता कितना गहरा है अगले ही पल उसकी कोख़ में क्या छिपा है।

यह सभी स्मृतियाँ दूर बैठी नायका के हृदय में घुल रही हैं वह स्वयं के भाग पर हँसती है। रात के इस पहर में वह देखती है चाँद चांदनी कल्पनाओं के सुंदर फूल गुंथ रहें है और धुर्व तारा यह दृश्य चुप चाप खड़ा देख रहा है। वह कहती है समय के साथ सब बदल जाता है गाँव गळी घर…बाखळ में खेलते पंछी को तो एक दिन उड़ना ही होता है वह बाखळ में कितने दिन रुकेगा।


शुक्रवार, जून 17

नेम प्लेट



मुख्य द्वार पर लगी

नेम प्लेट पर उसका नाम है 

परंतु वह उस घर में नहीं रहता

 माँ-बाप,पत्नी; बच्चे रहते हैं 

हाँ! रिश्तेदार भी आते-जाते हैं 

 कभी-कभार आता है वह भी 

नेम प्लेट पर लिखा नाम देखता है 

नाम उसे देखता है 

 दोनों एक-दूसरे को घूरते हैं 

कुछ समय पश्चात वह 

मन की आँखों से नाम स्पर्श करता है 

तब माँ कहती-

”तुम्हारा ही घर है, मैं तो बस रखवाली करती हूँ। "

पत्नी देखकर नज़रें चुरा लेती है 

और कहती है -

”एक नाम ही तो है जो आते-जाते टोकता है।”

वह स्वयं को विश्वास दिलाता है 

हाँ!  घर मेरा ही है

बैग में भरा सामान जगह खोजता है 

साथ ही फैलने के लिए आत्मविश्वास

ज्यों ही परायेपन की महक मिटती है 

फिर निकल पड़ता है उसी राह पर

सिमट जाना है सामान को उसी बैग में 

कोने, कोनों में सिमट जाते हैं 

 दीवारें खड़ी रहती हैं मौन  

 चप्पलें भी  करती हैं प्रश्न 

 नेम प्लेट पूछती है कौन ?

पहचानता क्यों नहीं कोई ?

डाकिया न दूधवाला और न ही अख़बारवाला 

कहते हैं - "सर मैम को बुला दीजिए।"

स्वयं को दिलाशा देता 

"हाँ! मेरा नाम चलता है न। "

सभी नाम से पहचानते हैं मुझे 

स्वयं पर व्यंग्य साधता

 हल्की मुस्कान के साथ 

 कहता-”घर तो मेरा ही है!

 हाँ! मेरा ही है! परंतु मैं हूँ कहाँ ?"


@अनीता सैनी 'दीप्ति'