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शुक्रवार, जनवरी 21

छोरो शेखावाटी रो


सैनिक बणु माँ,भारत माँ रो 

वर्दी परण रो चाव घणों।।

सीमा प्रहरी  महि रो बेटो 

जाण देश रो जणों-जणों।।


लूँ रा झोंका बणे साथिड़ा

थार थपेड़ा हैं बापू।

पूत धोराँ रो माटी जायो 

सीमा ऊँट पैरा  नापू।

साथ घणेरो दे आशीषा 

जीवण कद जाणो थकणों।।


मरुधरा र मनड़े रो मणको 

माणस जगाऊं सुतेडा।

वीर फोगाँ रा हेलो मारे 

फूला उचके टूटेड़ा।

सूर वीर योद्धा कह लाऊं 

माथ टिको लोहित सोवणों।।


मातृ भूमि रो मान बढ़ाऊँ

जग माह ऊंचो नाम करुँ।

रीढ़ बणु मैं अपणे देश री 

इह जन्म एसो काम करुँ।

गळियाँ गूंजे मेर नाम री

आँखड़ल्यां रो है सुपणों।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्द =अर्थ
परण=पहनने 
चाव=च्छा 
जाण=जानना 
जणों-जणों=प्रत्यक व्यक्ति 
घणेरो=बहुत ज्यादा 
थकणों=थकना 
मणको =मोती 
माणस=मानस 
सुतेडा=सोए हुए 
फोगाँ =बीहड़ भूमि 
हेलो=तेज आवाज 
टिको=तिलक 
अपणे=अपने 
बणु=बनु  
आँखड़ल्यां=आँखें 
सुपणों=स्वप्न 

रविवार, जनवरी 16

भाव लहरी



साँझ-सकारे उठे बादळी 

काळी घिरी घटा गहरी।।

काळजड़े पर चले कटारी

मीठी बोली बण ठहरी।।


पल्लू पाटा ओल्यू बाँधी 

घुंघरियाँ-सी बिखर रही।

टुग-टुग चाले लारे-लारे

 देख प्रीत भी निखर रही।

पीळे फूलां सरसों छाई 

 चाँदणियाँ बरसे दहरी।।


पुरवाई रा ठंडा झोंका 

साथ समीरण रा छुट्या।

परदेशा री घूमे गळियाँ

हिवड़े रा फाला फुट्या 

ओळी-सोळी डूबे भँवरा 

भाट्ठा भारी भव लहरी।।


 किणे सुणावा बिसरी बातां

किरणा रा बिछता गोटा।

मन री मूडण बाला देवे 

होवे है बादळ ओटा।

नैणा झरते खारे मणके

प्रीत पपोटा री कहरी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्द =अर्थ

साँझ-सकारे=सुबह-शाम 

काळी =काली 

काळजड़े=कलेजा 

ओल्यू =याद 

घुंघरियाँ=घुघरी 

टुग-टुग =ठुमक-ठुमक 

लारे-लारे=पीछे पीछे 

पीळे फूलां=पीले फूल 

 चाँदणियाँ=चाँदनी 

ओळी-सोळी=उल्टी-सुल्टी 

भँवरा =भँवर 

बातां=बातें  

मन री मूडण=स्वेच्छाचारी

बादळ=बादल 

मणके=मोती ,मनके  

पपोटा=पलकें

कहरी =कहर ढाने वाली 

मंगलवार, जनवरी 11

हिवड़ो झूले हिण्डोला



फूल बिछाया आँगण माही
माट्टी पोतयो बारणों।।
घणी बेग्या काज करया 
 तारिका ढळतो चानणों।।

दीवल रो काजळियो काड्यो 
काळी आटी जुड़ा जड़ी।
कुण्या पार चड्यो चूड़लो 
बिछुड़ी डसती घड़ी-घड़ी।
बिंदी होळ्या-होळ्या पूछे 
घरा साजन रो आवणों।।

दाल चूरमो हलवो पूरी
साँगरिया रो साग करो।
बाल्या देवे सखी सहेल्याँ
झोळा विरहण भाग भरो।
 दूब्ल्याँ डोल्ये माटी मनड़ा 
फीकी ऋतु रो जावणों।।

तितर-बितर बिखरेड़ा भांडा 
मोर मनड़े रा उड़ रह्या।
फाला होरी धड़कन बेरण
भाव मोतीड़ा गुड़ रह्या।
दिन ढळे चढ़े धूप डागळा
हिवड़ हिंडोला तारणों।।

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्द =अर्थ
पोतयो =पुताई 
बारणों=दरवाजा 
बेग्या=जल्दी 
काज=काम काज 
काजळियो =काजल 
होळ्या-होळ्या =धीरे-धीरे 
पूछे =पूछना 
आवणों=आना 
बाल्या=झूठ बोलना 
झोळा=झोला  
दूब्ल्याँ=दूब ,दूर्वा 
जावणों=जाना
तितर-बितर=अस्त-व्यस्त 
फाला=बहुत तेज दौड़ना 
हिंडोला=झूला 
तारणों=उतारना 

रविवार, जनवरी 9

सुन रहे हो न तुम!


यों हीं नहीं;कोई बुनकर बनता 

यों हीं नहीं;कोई कविता पनपती 

कविता साधना है 

तपस्या; तप है किसी का

भूलोक पर देह छोड़

भावों के अथाह सागर में 

मिलती है कविता 

भाव उलझते हैं देह से

देह सहती है असहनीय पीड़ा

तब बहती है कविता 

अंतस की परतों में छिपे भाव

बिंबों के सहारे तय करते हैं 

अपना अस्तित्त्व 

तब धड़कती है कविता 

कविता कोरी कल्पना नहीं है 

उसमें प्राण हैं

आत्मा है किसी की 

वह देह है

किसी के प्रेम की 

किसी के स्वप्न की

किसी के त्याग की

 वर्षों की तपस्या है किसी की 

 कविता मीरा है

 बार-बार विष का प्याला पीती है

कविता राधा है

थिरकती है अपने कान्हा के लिए 

कविता सीता है

बार-बार अग्नि-परीक्षा से गुज़रती है 

कविता प्रकृति है 

तुम रौंधते हो वह रो लेती है 

तुम सहारा देते हो वह उठ जाती है

तुम प्रेम करते हो वह खिलखिला उठती है 

कविता शब्द नहीं है

शब्दों की अथाह गहराई में छिपे भाव है

 भाव जो जीना चाहते हैं 

पसीजते हैं

व्यवहार में ढलने के लिए 

वह भूलोक पर नहीं उतरते 

क्योंकि वह कविता है

कविता 

कुकून में लिपटी तितली है 

उड़ती है  

बस उड़ती ही रहती है

कभी मेरे कभी तुम्हारे साथ

 सुन रहे हो न तुम!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, जनवरी 8

मायड़ भाषा


राजस्थान सिरमोड जड्यो 

मायड़ भाषा माण सखी।।

किरणा झरतो चानणियो है

ऊँचों है सनमाण सखी।।


चाँद चांदणी ढ़ोळ्य ढ़ाँकणा 

मुठ्या भर अनुराग धरे।

शब्द अलंकार छंदा माह

भाव रस रा झरणा झरे।

लोक गीत लुभावे रागणी 

 माट्टी रो अभिमाण सखी।।


जण-जण रे कंठा री वाणी 

जातक कथाएँ काणियाँ।

इतिहास र पन्ना री शोभा 

वीरांगणा रज राणियाँ।

सेना माह सपूत घणेरा 

भाग बड़ो बलवाण सखी।।


भोर बुहार अंबर आँगणा 

झोंका चाले पछुआ रा।

सोना चमके बालू धोरा

राज छिपावे बिछुआ रा।

मरूभूमि री बोली मीठी

प्रीत घणी धणमाण सखी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्द अर्थ 

सिरमोड=सिर का ताज 
चानणियो=उजाला 
सनमाण=सम्मान 
ढ़ोळ्य =फैलाना 
मुठ्या=मुट्ठी 
रागणी =राग, धुन
अभिमाण =अभिमान 
बलवाण=बलवान 
घणी=बहुत अधिक 
धणमाण=धनमान 
काणियाँ=कहानियाँ 
मरूभूमी= रेगिस्तान

मंगलवार, जनवरी 4

चीखती साठा



हाड़ तोड़ती पछुआ डोल्ये 

 लूट सूरज रो सिंगार।

घड़ी-घड़ी परिधान बदळती 

 दिन हफ्ता महीना चार।।


तिरछी चाले चाल बैरणी 

साँझ-सवेरे मिलण आव।

सिळा पान धूणी सिलगावे 

काळजड़ में दाह जळाव।

घणी सतावे सौतण म्हारी

आँखमिचोली खेल्य द्वार।।


बोरा भर ओल्यू रा लावे

बाँट्य पहर पखवाड़ा में।

भीगी पलका पला सुखावे 

फिरे उळझती बाड़ा में।

डाळा डागळ डोळ्या फिरती

सुना सूखा हैं  दरबार।।


शोर साचो चीखती साठा

पात फसल रा बिंध रही

सोव जागे घणी लहरावे

 मनड़ा माचा डाल रही।

पेड़ा फूँगी धुँध बरसावे 

धूप उतारे बारम्बार।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्द =अर्थ 

सिळा=नम 

धूणी =आलावा

काळजड़=कलेजा

जळाव=जलाना

घणी =बहुत अधिक

ओल्यू =याद

उळझती=उलझाना

डाळा=तहनियाँ 

 डागळ=छत 

डोळ्या =दीवार 

चीखती साठा =60 डिग्री दक्षिणी अक्षांश के पास पछुआ को 'चीखती साठा' नाम से पुकारा जाता है।

शनिवार, जनवरी 1

२०२२ कहता है



२०२२ कहता है

तुम भावों में शब्दों को 

होंठो पर मुस्कुराहट जड़ो

मैं उल्लास लाया हूँ।


यों मायूसी में न सिमटो

खो जाओ स्वप्न में  

दौड़ गंतव्य की ओर 

मैं पता साहस का लाया हूँ।


चाँद की शीतलता

चाँदनी का लेप बनकर 

दंभ को धोने धरा से

मैं कटोरा उजास का लाया हूँ।


अंतस की परतों में ढूँढ

सब्र के बाँध में तलाशो 

प्रभात की किरणों में ढला 

प्रीत के लिबास में आया हूँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'