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रविवार, जून 26

जीवण जेवड़ी


जीवण जेवड़ी रहट घूमे 

चौमासे री रात गळे।।

नाच नचावै है मृगतृष्णा 

ताती माटी पैर तळे।।


राग अलापे पंछी भोळा 

मूक-बधिर पाहुण ठहरा।

झंझावात जंजाळ बुणावै

धी  बूंटा काडे गहरा।

प्रेम आभै रै पगती बुई

आभ निरखे आपे ढळे।।


लौ लपट्या झूलस्य धरती 

लुट्य तरवर रौ सिणगार।

पून सुरमो सारया थिरके 

काग सिळगावै अंगार।

छाँव रूँख री रूँख रै मथै

दो सूरज अक साथ जळे।।


ओढ़ ओढ़णी चाले टेडी

 रंग बुरकावै नुआँ-नुआँ।

दिण दोपहरी सूरज ढळता 

धूणी सिळगे धुआँ-धुआँ।

काळी-पीळी सज सतरंगी

फिरती-घिरती हिया छळे।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

जेवड़ी /रस्सी, रहट/ कुएँ से पानी निकालने का एक ऐसा यंत्र, जिस से रस्सी से पानी निकाल जाता है, ताती/गर्म,तळे/नीचे,लौ लपट्या/ आग की लपटे,सुरमो/ काजल,रूँख/वृक्ष,मथै/ऊपर,अक/एक,बुरकावै/बरसाना,नुआँ-नुआँ/नया-नया, बुई / छोटा मरुस्थली पौधा होता है जो बदल जैसा सफ़ेद दिखता है।

बुधवार, जून 22

नेह बाखळ रौ

 

टळ-टळ टळके पळसा पाणी 

नीम निमोळ्या पान झड्या।।

नैणां नेह बाखळ रौ उमड्य

दुबड़ हिवड़ा जाल गढ्या।।


बादळ मुठ्या जल सागर रौ 

जीवण सुपणा बौ रौ है।

रोहीड़ रा रूड़ा फूलड़ा

मनड़ा उठ्य हिलोरौ है।

कांगारोळ काळजड़ माथै

सुर-ताळ परवाण चड्या।।


 प्रीत च्यानणा जळे पंतगा

दिवलौ पथ रौ काज करे।

रात चाले ओढ्या अंधेरों

 ताख खूद पै नाज करे।

 समय सोता सिणधु स्यूं गहरा  

 जग नीति रौ पाठ पढ्या।।


ओल्यूं घुळै दूर दिसावरा 

 जोग रूळै ताज जड्यो।

चाँद-चाँदणी मांड-मांडणा 

धुरजी देख्य ठौड़ खड्यो।

गाँव गळी बदळा घर झूपां 

 पँख पसार पखेरू उड्या।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

पळसा/पोळ के भीतर का स्थान, मुख्य द्वार के अंदर का स्थान, निमोळ्या/नीम के फल,बाखळ/घर के सामने खुली जगह या धोरीमोडा के बाहर का स्थान, रूड़ा/रूखा,कांगारोळ/कौवे के ज्यों चिल्लाना, माथै/ऊपर,सिणधु/ सिंधु, च्यानणा/उजाला, घुळै/घुलना या मिश्रित होना, रूळै/मिटी में मिलना, धुरजी/धुर्व तारा, ठौड/एक ही स्थान पर खड़े रहना 

राजस्थानी शब्द एवं उनके अर्थ मैं अपनी स्मृति के आधार पर लिखती हूँ।

बाखळ घर के सामने खुली जगह को कहते हैं। आज-कल न बाखळ रहे न वह बचपन, उमड़ आया हृदय में वह घर, आँगन उम्मीद है आप भाव और भाषा को अवश्य समझेंगे।

जब कोई लिखता है तब वह उस कविता का बहुत ही वृहद रूप जीता है।  एक-एक भाव को शब्दों में गढ़ता है। उसे अनुवाद में कैसे समेटे? मुझे कुछ समय दे मैं प्रयास करुँगी।

सारांश... 'बाखळ जीवन और प्रेम का प्रतीक है' 'बाखळ' घर के बाहर का स्थान है जहाँ बच्चे खेला करते हैं घर के बुजुर्ग बैठे रहते हैं। घर आँगन की स्मृतियों में खोई नायिका के भाव ऐसे हैं जैसे बारिश के समय पळसे से पानी टपकता है यादें हृदय में दूब के ज्यों  जाळ गढ़ रही है। सब कुछ छूटने के बाद नायिका अपने जीवण की कल्पना करती है कि  उसके जीवन ऐसे है जैसे बादल अपनी अंजूरी में पानी लिए खड़ा है और वह स्वप्न बौ रही। रोहिड़े के रूखे फूलों के जैसे स्मृतियाँ हृदय में हिलोरे-सी उठ रही है ये घटनाएँ ऐसे है जैसे कागा, कागारोळ मचा रहा है सुर ताल सातवें आसमान को छू रहें हो।

इसके बाद नायिका कहती है दीपक तो अपने काम में व्यस्त है वह तो पथ पर उजाला कर रहा है प्रीत में  पतंगा अपना जीवन स्वतः गवा रहा है

स्वयं पर व्यंग्य साधती नायिका कहती है रात अंधेरा ओढ़े चलती है परंतु वहीं एक ताख स्वयं पर कितन नाज़ करता है कि मेरे पास उजाला है। वैसे ही वह कहती है जग पग पग पर नीति का पाठ पढ़ाता है परंतु किसने देखा समय का सोता कितना गहरा है अगले ही पल उसकी कोख़ में क्या छिपा है।

यह सभी स्मृतियाँ दूर बैठी नायका के हृदय में घुल रही हैं वह स्वयं के भाग पर हँसती है। रात के इस पहर में वह देखती है चाँद चांदनी कल्पनाओं के सुंदर फूल गुंथ रहें है और धुर्व तारा यह दृश्य चुप चाप खड़ा देख रहा है। वह कहती है समय के साथ सब बदल जाता है गाँव गळी घर…बाखळ में खेलते पंछी को तो एक दिन उड़ना ही होता है वह बाखळ में कितने दिन रुकेगा।


शुक्रवार, जून 17

नेम प्लेट



मुख्य द्वार पर लगी

नेम प्लेट पर उसका नाम है 

परंतु वह उस घर में नहीं रहता

 माँ-बाप,पत्नी; बच्चे रहते हैं 

हाँ! रिश्तेदार भी आते-जाते हैं 

 कभी-कभार आता है वह भी 

नेम प्लेट पर लिखा नाम देखता है 

नाम उसे देखता है 

 दोनों एक-दूसरे को घूरते हैं 

कुछ समय पश्चात वह 

मन की आँखों से नाम स्पर्श करता है 

तब माँ कहती-

”तुम्हारा ही घर है, मैं तो बस रखवाली करती हूँ। "

पत्नी देखकर नज़रें चुरा लेती है 

और कहती है -

”एक नाम ही तो है जो आते-जाते टोकता है।”

वह स्वयं को विश्वास दिलाता है 

हाँ!  घर मेरा ही है

बैग में भरा सामान जगह खोजता है 

साथ ही फैलने के लिए आत्मविश्वास

ज्यों ही परायेपन की महक मिटती है 

फिर निकल पड़ता है उसी राह पर

सिमट जाना है सामान को उसी बैग में 

कोने, कोनो में सिमट जाते हैं 

 दीवारें खड़ी रहती हैं मौन  

 चप्पलें भी  करती हैं प्रश्न 

 नेम प्लेट पूछती है कौन ?

पहचानता क्यों नहीं कोई ?

डाकिया न दूधवाला और न ही अख़बारवाला 

कहते हैं - "सर मैम को बुला दीजिए।"

स्वयं को दिलाशा देता 

"हाँ! मेरा नाम चलता है न। "

सभी नाम से पहचानते हैं मुझे 

स्वयं पर व्यंग्य साधता

 हल्की मुस्कान के साथ 

 कहता-”घर तो मेरा ही है!

 हाँ! मेरा ही है! परंतु मैं हूँ कहाँ ?"


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, जून 12

धरती धोरा री



वीर भूमि धरती धोरा री

 सोन्य बरगो भळके रूप।

भाळ रै पैर घुँघरू बंध्या 

पाणी प्यासा कुआँ कूप।।


शूरवीर बेटा अण जाया

बेटियाँ जाई  प्रतिमाण।

देव लोक ईं गाथा गावै

मरु सो दूजो न बलवाण।

धीर-गंभीर  पाठ पढ़ावै

प्रीत छाया अणद अरूप।।


दादू-कबीर सबद सुणाया 

 वीराणे सूं उपजे बोल।

 मीरां प्रीत सुणावै भाटा

लगन कान्हा री अनमोल।

मरू धरा रौ कण-कण गावै

जीवण माटी रौ स्तूप।।


कुल-कुणबा काणयाँ सुणावै

रूँख जड्या है अभिमाण।

रेत समंदर साहस सीपी

हिया सोवै है सम्माण।

मोती मिणियाँ चमक चाँदणी 

सतरंगी-सी बरस धूप।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

बरगो-जैसा 

भाळ-हवा 

अणद अरूप-अत्यंत सुंदर, आनंद से भरा या आनंदित

 वीराणे-वीराना 

भाटा-पत्थर 

कुणबा -कुटुंब, बाल-बच्चे, परिवार।

काणयाँ-कहानियाँ 

रूँख-पेड़ 

सतरंगी-सात रंग 


गुरुवार, जून 9

आख्यां



आख्यां हैं ऊणमादी ढोला 

ढ़ोळै  खारो पाणी।

मुंडो मोड़ै टेढ़ी चाल्ये 

खळके तीखी वाणी।।


काळै कोसां आया बादळ 

भाळा छेकड़ा छिपे।

रूंख उकसे पगडंडिया जद

गळयां बीजड़ा बिछे।

कै जाणे बरसती छाट्या

आखर हिवड़ा साणी।।


कुआँ पाळ मरवा री ओटा 

घट गढ़ती घड़ी-घड़ी।

बात सगळी जाणे जीवड़ो 

 अज सूखै खड़ी-खड़ी।

पीर पिछाणे टेम चाल री

ओल्यूं घाल्ये घाणी।।


बेगा-बेगा घर आइज्यो 

काळज रा पान झड़ै।

ओज्यूँ बिखरी धूप आँगणा 

लू दुपहरी रै गड़ै।

पून पूछे पुन्याई बैरण

 गीणावै जग जाणी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शब्दार्थ

उणमादी- मानसिक संभ्रांति, नटखट 

ढ़ोळै- ढुलना,गिराना 

खळके- घूमना 

काळै कोसां-बहुत दूर से 

भाळ -पून, हवा 

छेकड़ा-सुराख़

घट - घड़ा 

रूंख- पेड़ 

उकसे- बढ़ना

गळया- भीग हुआ 

छाट्या-छांट 

पाळ-जगत,कुएँ के ऊपर चारों तरफ़ बना हुआ चबूतरा

सगळी-सभी

मरवा -कुएँ के बुर्ज

सूखै-सूखे 

पिछाणे-पहचानना 

ओल्यूं-याद 

घाल्ये- करना 

घाणी-बार-बार घूमना 

बेगा-बेगा-जल्दी -जल्दी 

आइज्यो -आना 

काळज रा -कलेजा 

पान-पत्ता 

ओज्यूँ-फिर, दुबारा 

पूछे- हालचाल पूछना 

पुन्याई- पुण्य 

गीणावै-गिनवाना 

शनिवार, मई 28

माई! पंछी प्रेम पुगायो



माई! पंछी प्रेम पुगायो 

उण ही पीर सुणा बैठी।।

भाव बोल्या न बदळी गरजी

आभे देख गुणा बैठी।


 जैठ जावते रा भाग जळे

आंधी ख़्याळ रचावे है।

किण बोया कांटा कैरा रा

आँचळ आप छुड़ावे है।

नैण नीर दिण-रात बहाया 

बिकी ही बाड़ बणा बैठी।।


चाँद चाँदणी प्रीत लुटावे 

माथ चूम तकदीरा रा।

आखर आँगणा जदे उग्या 

 पात झरा तकबीरा रा।

ठाठ-बाठ रो पसर चानणो

 काळजड़ो भूणा बैठी।


  रूप ढुलै ढळते सूरज रो 

सिंझ्या थबकी दे दहरी।

  जग खेल रचावे नित न्यारा 

मार फावड़ा री गहरी।

लाडा भूखी हिये बसायो

जीवण बिरह बुणा बैठी।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

पुगाना =देना 

उण = उसको 

सुणा = सुना 

बोल्या= बोलना 

बदळी =बदली

सिंझ्या=सांध्या 

आभे= अंबर 

जळाव=जलाव 

जावतो=जाना 

ख़्याळ=ख़्याल, चैतना 

किण= किन 

आँचळ=आँचल 

आँगणा=आँगन 

जद = जब 

 उग्या= उगना

तकबीर= प्रर्थना 

पसर= फैलना

चानणो=उजाला

काळजड़ो=कलेजा 

 भूणा= भूनना, जलना

ढुलै= ढुलना 

 ढळते= ढलना

फावड़ा= फावड़ा

बुधवार, मई 25

तुम मत बोलना !


ये जो सन्नाटा पसरा पड़ा है 

 इसकी परतें तुम मत खोलना।

विरह की रड़क थामे है मौन

 टूटना-रुठना तुम मत घोलना।

 मत बोलना! तुम मत बोलना!!


अव्यक्त नयन सोते में डूबा

जिह्वा का हठयोग रहा।

व्यक्त आजीवन एकदम उत्सर्ग

विधना का सुयोग रहा।

बैठ  छाँव में निरख ढोलना

 मत बोलना! तुम मत बोलना!!


व्यूह में उलझे अभिमन्यु के 

 अनकहे भाव  सुलगते हैं।

न कहने की पीड़ा को पीते

 कितने ही प्रश्न झुलसते हैं।

 जीवन तराजू में न तौलना 

 मत बोलना! तुम मत बोलना!!


कोरे पन्नों पर बिखेर बेल-बूँटे 

शीतल माटी गाँव गढ़े।

क़लम उकेरे तत्समता भावों की  

उजड़े चित्त की ठाँव पढ़े।

उस पथ पर पथिक तुन दोलना

मत बोलना! तुम मत बोलना!!


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, मई 16

बुद्ध



निर्विकार के उठते हिलकोरे 

पग-पग पर करते प्रबुद्ध 

उर बहती प्रीत सरित 

ममता के पदचाप में बुद्ध।


श्वेत कपोत आलोक बिखेरे 

 मौन वाणी करुणा की शुद्ध 

बोधि-वृक्ष  बाँह फैलाए 

मानवता की छाप में बुद्ध।


मिलन-बिछोह न भेदे मन 

आकुलता संतोषी अबिरुद्ध 

दुःख दिगंबर भाव भरता 

पंछी के आलाप में बुद्ध।


हवा परतों में शील-प्रज्ञा

गीत कल्याणी गूँजे अनिरुद्ध 

मधु घुलता जन-जन हृदय में 

समता के हर जाप में बुद्ध।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, मई 12

विरह



समय का सोता जब 
धीरे-धीरे रीत रहा था 
मैंने नहीं लगाए मुहाने पर पत्थर
न ही मिट्टी गोंदकर लगाई 
भोर घुटनों के बल चलती 
दुपहरी दौड़ती 
साँझ फिर थककर बैठ जाती 
दिन सप्ताह, महीने और वर्ष
कालचक्र की यह क्रिया 
 स्वयं ही लटक जाती 
अलगनी पर सूखने 
स्वाभिमान का कलफ अकड़ता 
कि झाड़-फटकार कर
रख देती संदूक के एक कोने में
प्रेम के पड़ते सीले से पदचाप  
वह माँझे में लिपटा पंछी होता 
विरक्ति से उनमुख मुक्त  करता
मैं उसमें और उलझ जाती 
कौन समझाए उसे 
सहना मात्र ही तो था 
ज़िंदगी का शृंगार
विरह मुक्ति नहीं 
इंतज़ार का सेतु चाहता था।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शनिवार, मई 7

संकेत


यों ही अकारण, अकस्मात 

चैत्र-बैसाख महीने के अंबर में

दौड़ती बिजली का कौंधना

गरजते बादलों का झुंड में बैठ

बेतुकी बातों को तुक देते हुए

भेद-भाव भरी तुकबंदियाँ गढ़ना 

यही खोखलापन लीलता है

खेजड़ी के वृक्ष से सांगर

उनकी जगह उभरती गठानें 

खेजड़ी का  ठूँठ में बदलना 

शक्ति प्रदर्शन का अति विकृत रूप 

दरख़्त की छेकड़ से फूट-फूटकर बहना 

प्रकृति का असहनीय पीड़ा को

भोगी बन भोगते ही जाना 

संकेत हैं धरती की कोख में 

मानवता की पौध सूखने का।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, अप्रैल 29

मरुस्थल


तुम्हें पता है?

मरुस्थल डकार मारता

नंगे पाँव दौड़ता

चाँद की ओर कूच कर रहा है।

साँप की लकीरें नहीं

 इच्छाएँ दौड़ती हैं

 देह पर उसकी!

पैर नहीं जलते लिप्सा के ?

तुम्हें पता है क्यों?

घूरना बंद करो!

मुझे नहीं पता क्यों?


पेड़-पौधों पर चलाते हो 

वैसे रेगिस्तान पर आरियाँ 

कुल्हाड़ियाँ क्यों नहीं चलाते हो ?

इसकी भी शाख क्यों नहीं काटते हो ?

चलो जड़ें उखाड़ते हैं!

मौन क्यों साधे हो?

कुछ तो कहो ?

चलो आँधियों का व्यपार करते हैं!

उठते बवंडर को मटके में ढकते हैं!

धरती का आँगन उजाड़ा 

उस पर किताब ही लिखते हैं!

घूर क्यों रहे हो?

चलो तुम्हारी ही जी-हुजूरी करते हैं

क्यों?

तुम्हें नहीं पता क्यों?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, अप्रैल 22

कैसा करतब है साहेब?



प्रयोगशाला की 

परखनली में गर्माती राजनीति

अब गलियों के नुक्कड़ पर 

घुलने लगी है साहेब!

दो वक़्त रोटी की फ़िक्र में 

भटकती देह 

हथियारों के ज़िक्र में

सूखने लगी है 

इंसानियत नहीं साहेब!

कूटनीति फूट-फूटकर

करतब दिखाती 

ताड़ के पेड़-सी सर उठने  लगी है 

 बुद्धि को लगने लगा है 

 वो धरती घुमाने लगी है

तराजू में तुलती मानवता 

 ईमान-धर्म टूट-टूटकर बिखरने लगा है 

 माया का रचाया तूने कैसा खेल?

 पाषाण उचक-उचककर खेलने लगें हैं 

जगह बताते रिश्तों की 

समझदार हो गए बच्चे साहेब!

अँगुली पकड़कर चलने वाले 

 बूढ़े माँ-बाप को अब 

दुनियादारी समझाने लगे हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


सोमवार, अप्रैल 18

उल्लास अधरों पर टाँगते हैं


सम्मोहन नश्वर नहीं प्रभात का

रचा-रचाया इन्द्रजाल है रात का

देखो!सहर सँवर आई चौखट पर 

उठो! पथ पर फूल बिछाते हैं

सूरज ढलने का बहाना छिपाते हैं।


जीवन ललाट पर भोर बिखेरते हैं 

टनियों से छनती धूप को हेरते हैं 

पाखी कलरव से झरते भाव  

प्रीत फल हृदय को पुगाते हैं

चलो!उजास के वृक्ष उगाते हैं।


अनमने से खोये-खोये न बैठो तुम

उफनते भाव-हिलोरों को न ऐंठो तुम 

पहर पखवाड़े में सिमटती ज़िंदगी के 

चलो! उल्लास अधरों पर टाँगते हैं 

यों निढाल न बनो स्वप्न हाँकते हैं।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, अप्रैल 9

आडावाळी



मरू देश री आडावाळी 

विधणा री हिळकोरी है।।

दादी बणके भाग जगायो

काळजड़े री लोरी है।।


प्रीत पाठ पाषाण पढ़ावे 

आभौ बोव हिवड़ा माण।

जुगा-जुगा री काणी कहवे 

बाँह पसार लुटाव जाण।

छटा सोवणी बादळ चूमे

टेम-टेम री जोरी है।।


पिढ्या तक रो गौरव गाडो

माथ टिकलो सोह रह्या।

धनधान्या से भरा आँगणा 

राजस्थान रो मोह रह्या।

दुर्ग-किला री करे रखवाळी 

चाँद सूरज री छोरी है।।


साखी लूणी जीवण सरवर

गळियाँ पाणी री थेथर।

ठंडा झोंका लू रा थपेड़ा

गोदी माह खेल्य खेचर।

भाग बळी रो बाळू बरगो 

लेरा आँधी होरी है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, अप्रैल 6

हे कवि!



बगुला-भक्तों की मनमानी

कब विधाता की लेखनी ने जानी?

गौण होती भविष्य की रूपरेखा

हे कवि! तुमने कुछ नहीं देखा?


जन जीवन के, हृदय के फफोले 

भक्तों ने पैर रख-रखकर टटोले।

दबे कुचलों की मासूम चीखें

हे कवि! निष्पक्ष होकर लिखें।


बच्चों के हाथों से छीनते रोटी

जात-पात की फेंकते गोटी।

ग़रीबों का उजड़ता देख चूल्हा 

हे कवि! तुम्हारा पेट नहीं फूला?


कैसा मनचाहा खेल रचा?

ख़ुदा बनने का यही रास्ता बचा?

शक्तिमान बनने का कैसा जुनून?

हे कवि! क्यों नहीं टोकता क़ानून?


तुम भाव प्रकृति के पढ़ते हो

भावनाओं को शब्दों में गढ़ते हो?

वर्तमान देख भविष्य लिखते हो

हे कवि!  तुम कैसे दिखते हो?


दर्द लिखते हो? या दर्द  जैसा ही कुछ

अंतरमन में अपने झाँक कर पूछ।

सरहद-सी बोलती लकीर का खींचना

हे कवि! कर्कश होता है युद्ध का चीख़ना।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शुक्रवार, मार्च 25

भावों की लहर कविता


रोम-रोम मेरे रमती  

श्वांसें कहती हैं कविता

साज सरगम हृदय सजती 

जैसे बहती है सरिता।।


मरु में नीर टोह भटकी 

मौन धार अविरल बहती।

धूप तपे आकुल मन में 

सुधियाँ मट्टी-सी ढहतीं ।

शब्द बंधे सुर-ताल में 

उर बहे बनके गर्विता।।


मेघमाला-सी बिखरती 

खेलती घर-घर गगन में।

बाट जोहती जोगनियाँ  

सांसें सींचती लगन में।

ओढ़ चाँदनी उतरी निशि 

ज्यों भाव लहरी नंदिता।।


रंग तितलियों को देती  

फूलों में मकरंद भरती।

बाँह लिपटी हैं रश्मियाँ 

तरूवर-सी छाँव झरती।

भाल वसुधा के सजाती 

कवित अरुणोंदय अर्पिता।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, मार्च 17

टोह


स्मृति पन्नों पर बिखेर गुलाल

  हृदय से उन्हें लगाऊँ।

जोगन बन खो जाऊँ प्रीत में 

रूठें तो फिर-फिर मनाऊँ।


 साँझ लालिमा-सी संवरूँ 

टूट तारिका-सी लिपटू गलबाँह में।

धवल चाँदनी झरे चाँद से

अबीर बन सुख लूटूँ प्रीत छाँह में।


एक-एक पन्ने पर वर्षों ठहरुँ

मुँदे द्वार खोल माँडू माँडने।

अल्हड़ मानस की टाँगू लड़ियाँ

टूटे भावों को बैठूँ साँठने।


प्रीत पैर बँधु बन पैजनियाँ

थिरक बजूँ पी आँगन में।

टोह अन्तहीन पारावार-सी

व्याकुल पाखी की अंबर में।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, मार्च 8

परछाई एक अकेली-सी



 हाथ दीप धर ढूँढे पगडंडी 

परछाई एक अकेली-सी।

बादल ओट छिपी चाँदनी 

जुगनू बुझाए पहेली-सी।


धीरज पैर थके न हारे 

सृजन नित नया रचाती।

होले-होले डग धरती भरे 

पथ सुमन छाँव जँचाती।


अनथके भावों की पछुआ 

घन गोद खिलखिलाती।

पानी बूँद बन धरा बरसे 

सुषुप्त स्वप्न को जगाती।


वह परछाई आग है

है बहते जल की धारा।

नहीं बँधी अब बेड़ियों में

नहीं ढूँढ़ती सहारा।


मिट्टी बन मिट्टी को साधे

प्राण फूँकती मिट्टी में।

सृष्टि, सृष्टा के पथ चलती 

मुक्त परछाई धरा मुट्ठी में।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


रविवार, फ़रवरी 27

सौभाग्य


जब कभी न चाहते हुए भी

सौभाग्य वर्दी में मुझसे मिलता है

तब उसका दृष्टिकोण

प्रेम नहीं त्याग ढूँढता है 

अंतरयुद्ध को ठहराव 

समुंदर से विस्तृत विचार 

पाषाण-सा कठोर हृदय 

 कोरी किताब लाता है 

तब एक पिता पति नहीं

बल्कि वह एक बेटा होता है

उसकी आँखों में माँ की सेवा 

वह कृत्तिव्यनिष्ट होता है

कल्पना की सौम्यता से दूर

जमीनी सचाई का रंग भरता 

यथार्थ के फूलों का उपहार 

शब्द में आकुलता बिखेरता

वह एक झोंका-सा होता है 

 मैं स्वयं को जब 

उसकी आँखों में ढूँढ़ती हूँ

वह मुझे अपनी सांसों के 

उठते बवंडर से ढक लेता है 

आँखों की पुतलियों को फेर

पानी की हल्की परत में

 डूबो देता है 

तब वह एक पत्नी प्रेमिका नहीं

बल्कि एक सिपाही ढूंढ़ता है। 


@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

रविवार, फ़रवरी 20

कैसे लिखूँ?


प्रेम लिखूँ! हठ बौराया है 

कैसे?शब्दों का टोकना लिखूँ 

उपमा उत्प्रेक्षा का रूठना 

कैसे स्मृतियों में ढूंढ़ना लिखूँ ?


 कैसे लिखूँ?

मनोभावों के झोंके को

ठहरे जल में उठती हिलोरों को 

कैसे कुहासे-सी चेतना लिखूँ?


अकेलेपन के अबोले शब्द 

अधीर चित्त की छटपटाहट

उफनती भावों की नदी को 

कैसे अल्पविराम पर ठहरना लिखूँ?


इक्के-दुक्के तारों की चमक 

गोद अवचेतन की चेतना 

अकुलाहट मौन हृदय की

कैसे रात्रि का संवरना लिखूँ?


निरुत्तर हुई व्याकुलता

अन्तर्भावना वैराग्य-सी 

प्रेमी प्रेम का प्रतिरूप

कैसे मौन स्पंदन में डूबना लिखूँ?


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, फ़रवरी 16

साथी



ढलती साँझ विदाई की बेला

अकुलाए भावों का उफनना।

आँखों से ओझल धुँधराए 

ख्याल से घट का छलकना।


पाखी! धड़कनों का कलरव

उपहार में हृदय बिछाया है।

पैरों को हौले-हौले रखना

फूलों में प्रीत को छिपाया है।


उमगते-निमगते चाँद-सूरज

चाँदनी आँचल फैलाएगी।

टेडी-मेढी पगडंडियों पर

प्रीत जुगनुओं-सी जगमगाएगी।


अविराम शून्य में डूबती लहर 

 या हो बीते पलों का एहसास।

 गीत ग़म के न गुनगुना साथी 

 खुशियों का पहनना लिबास।


तुम चले हो नए पथ की ओर

मिले छाँव हँसती भोर साथी।

हृदय हमारा सुनता रहेगा अब

स्मृतियों की उठती हिलोर साथी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, फ़रवरी 14

आखरी कागद


पुलवामा शहीदों की शहादत की तीसरी बरसी पर सादर श्रद्धांजलि!

 

गाँव पुकारे साथी म्हाने

हिवड़े आग ळगावे है।।

धुँधळी-धुँधळी गळियाँ दीसे

सुण! चौपाळ बुळावे है।।


आख्यां बाळू किणकी रड़के 

बाटा जोवे ब्यायेड़ी।

जेठ भीगियो चौमासे सो

छपरा टाटी टूटेड़ी।

काळजड़ा हिळकोरा उठ्ये 

गोड्या नींद सुळावे है।। 


ओल्यू ऊँटा टोळा सरीखी

धरती मनड़ तापड़ पड़े।

खुड़के रेवड़ टाळी बणके

गडरियो शब्दा सुर जड़े।

ढळतो सूरज मनड़ो मोस्ये 

आकुळ मन भरमावे है।।


तारा जड्यो आँचळ ओढ्या 

झोंका लेख लारे खड़ा।

बाँह पकड़ झुळाबै बैरी

काची कोंपळ ठूँठ जड़ा।

छोड़ घरौंदा पाखी उडिया

माँ, लाडो बिळखावे  है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति' 


शब्दार्थ 

ळगावे-लगाना 

धुँधळी-धुँधळी=धुँधली-धुँधली 

गळियाँ-गलियाँ  

बुळावे-बुलाना 

बाळू किणकी-रेत के कण 

ब्यायेड़ी-ब्याहता स्त्री 

काळजड़ा-हृदय ,कलेजा 

हिळकोरा-लहर 

गोड्या-गोदी 

सुळावे-सुलाना 

टोळा -समूह या टोला 

सरीखी-जैसे 

तापड़-पैरों की ध्वनि

ढळतो-ढलना 

लेख -विधना के लेख या लेखा 

लारे -पीछे 

बिळखावे-बिलखना 

बुधवार, फ़रवरी 9

बसंती बेला



मरू धरा रे आँगण माही

सज बसंती संसार है।।

मोर-पपीहा झूमे-गावे 

बरस रह्या मद्यसार है।।


भाव पखेरू मुग्ध मगण हो 

डाळ-डाळी पर झूळतो।

कोपळ सतरंगा री फुट्ये

कसूमळ बदळा घूळतो।

कण-कण राग आलाप सोवे 

बदळी ढके आसार है।।


भूंगळ भेरी मशका तुरही

होंठा बाँसुरी ताण है।

हिवड़े हिलोर अळगोजा री 

पूँगी साध री शाण है।

दशुं दिशायाँ भर हिळकोरा 

जळ तरंगी अपसार है।।


उपवण धोरा लाग्य सोवणा

डाळ्य-डागळ कोंपल फूट।

खेत-खळिहान कुआँ-बावड़ी

 लिपट्य बेल-बूटा टूट।

दोणों हाथ लुटावे कुदरत

मंगळ  घड़ी अभिसार है।।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शब्दार्थ 

आँगण -आँगन।

मद्यसार- शब्द मुग्ध होने के भाव से है।

मगण-मगन।

हिलोर-ऊँची लहर।  

डाळ-डाळ-डाल डाल।

कोपळ-कोंपल।

फुट्ये-नव अंकुर आना।

डूबयों-डूबना।

बादळ-बादल।

भूंगळ, भेरी,मशका,तुरही,अळगोजा-

यह राजस्थान के प्रशिद्ध वाद्य यंत्र हैं।

हिळकोरे-तरंग।

मंगळ-मंगल।

लिपटी,लिपटना-आलिंगन करना।