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सोमवार, मई 16

बुद्ध



निर्विकार के उठते हिलकोरे 

पग-पग पर करते प्रबुद्ध 

उर बहती प्रीत सरित 

ममता के पदचाप में बुद्ध।


श्वेत कपोत आलोक बिखेरे 

 मौन वाणी करुणा की शुद्ध 

बोधि-वृक्ष  बाँह फैलाए 

मानवता की छाप में बुद्ध।


मिलन-बिछोह न भेदे मन 

आकुलता संतोषी अबिरुद्ध 

दुःख दिगंबर भाव भरता 

पंछी के आलाप में बुद्ध।


हवा परतों में शील-प्रज्ञा

गीत कल्याणी गूँजे अनिरुद्ध 

मधु घुलता जन-जन हृदय में 

समता के हर जाप में बुद्ध।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, मई 12

विरह



समय का सोता जब 
धीरे-धीरे रीत रहा था 
मैंने नहीं लगाए मुहाने पर पत्थर
न ही मिट्टी गोंदकर लगाई 
भोर घुटनों के बल चलती 
दुपहरी दौड़ती 
साँझ फिर थककर बैठ जाती 
दिन सप्ताह, महीने और वर्ष
कालचक्र की यह क्रिया 
 स्वयं ही लटक जाती 
अलगनी पर सूखने 
स्वाभिमान का कलफ अकड़ता 
कि झाड़-फटकार कर
रख देती संदूक के एक कोने में
प्रेम के पड़ते सीले से पदचाप  
वह माँझे में लिपटा पंछी होता 
विरक्ति से उनमुख मुक्त  करता
मैं उसमें और उलझ जाती 
कौन समझाए उसे 
सहना मात्र ही तो था 
ज़िंदगी का शृंगार
विरह मुक्ति नहीं 
इंतज़ार का सेतु चाहता था।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'


शनिवार, मई 7

संकेत


यों ही अकारण, अकस्मात 

चैत्र-बैसाख महीने के अंबर में

दौड़ती बिजली का कौंधना

गरजते बादलों का झुंड में बैठ

बेतुकी बातों को तुक देते हुए

भेद-भाव भरी तुकबंदियाँ गढ़ना 

यही खोखलापन लीलता है

खेजड़ी के वृक्ष से सांगर

उनकी जगह उभरती गठानें 

खेजड़ी का  ठूँठ में बदलना 

शक्ति प्रदर्शन का अति विकृत रूप 

दरख़्त की छेकड़ से फूट-फूटकर बहना 

प्रकृति का असहनीय पीड़ा को

भोगी बन भोगते ही जाना 

संकेत हैं धरती की कोख में 

मानवता की पौध सूखने का।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'