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गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

तुम देख रहे हो साहेब



 उजड़ रहा है
 साहेब 
धरा के दामन से 
विश्वास 
सुलग रही हैं 
साँसें 
कूटनीति जला रही है ज़िंदा 
मानस 
  सुख का अलाव
 जला भी नहीं 
दर्द धुआँ बन आँखों में
 धंसता गया  
निर्धन प्रति पल हुआ
 बेचैन 
 वक़्त वहीं गया 
ठहर  
झगड़ता रहा
 मैं, मेरे का कारवां  
बिखर गये घरौंदे 
 परिवेश में घुलता रहा 
ज़हर 
सौंप गये थे जो धरोहर 
देश को 
छल रही है उसे 
सत्ता-शक्ति 
मोह देखो उसका 
अंधी बन स्वार्थ के हुई 
वह अधीन  
बिखर रहा है 
बंधुत्व का 
स्वप्न 
झुलस रहा है 
हिंद के दामन में 
प्रेम 
प्रकृति को रौंद रहे हैं  
दिन दहाड़े 
पग-पग पर हो रहा है
 भावनाओं का 
क़त्ल-ए-आम 
तुम देख रहे हो साहेब
 कितना बदल गया है 
इंसान |

©अनीता सैनी 

26 टिप्‍पणियां:

  1. गंभीर सवाल उठाती चिंतनपरक रचना।
    कूटनीति जब अपनों को ही छलने लगती है तब उसका सर्वाधिक विकृत रूप उभरता है।
    राजनीति और कूटनीति जब बेकाबू होकर मानवता को रौंदने लगते हैं तब क़लम उठती है संवेदना के स्वर लेकर और सार्थक सृजन के ज़रिये मंथन की भावभूमि का निर्माण करती है तब सामाजिक जीवन में चेतना का संवाहक बनकर नई दिखाएं खुलती हैं।
    भाव गांभीर्य से लबरेज़ विचारणीय सृजन के लिये बधाई एवं शुभकामनाएं।
    लिखते रहिए।

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    1. सादर नमन आदरणीय रवीन्दर जी.कभी-कभी आप की समीक्षा देख अवाक रह जाती हूँ.भाव गांभीर्य समेटे रचना का मर्म स्पष्ट करती सार्थक और सुन्दर समीक्षा के लिए सहृदय आभार आपका.
      प्रणाम
      सादर

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  2. बहुत ही सार्थक काव्य चित्र प्रिय अनिता। राजनीति कीे कुटिल चालॉं के साथ साथ प्रकृति के अनावश्यक दोहन् के रूप में भावी पीढी कीे अनमोल धरोहर को लीलती नीतियां समाज और सृष्टि में असन्तुलन कीे जिम्मेवार हैं । सब कुछ देखकर कवि हृदय विदीर्ण तो होगा ही। अत्यंत संवेदनशील रचना हैं, जिसके लिए शुभकामनाएं ।

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    1. सादर नमन आदरणीय रेणु दी जी.आपका स्नेह और सानिध्य की कायल हूँ मैं.साहित्य के प्रति अपार स्नेह आप का, आपको ब्लॉग की ओर खींच ही लता है.रचना का मर्म स्पष्ट करती बहुत ही सुन्दर समीक्षा हेतु सस्नेह आभार आपका. आप का स्नेह और सानिध्य यूँ ही बना रहे.
      सादर

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  3. दोहन और संसाधनों का अनावश्यक उपयोग के साथ साथ मानुष का लालची मन हमारी धरोहर को छलनी किये जा रही है।
    सुंदर रचना।
    यहाँ स्वागत है 👉👉 कविता 

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीय रोहिताश जी उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.आप का मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहे.
      प्रणाम
      सादर

      हटाएं
  4. बेहतरीन और विचारणीय प्रस्तुति अनीता जी

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    उत्तर
    1. सादर नमन आदरणीया रितु दी जी.उत्साहवर्धक समीक्षा हेतु.
      आपका स्नेह,सानिध्य और मार्गदर्शन हमेशा यूँ ही बना रहे.

      हटाएं
  5. वाह!!सखी अनीता जी ,बेहतरीन सृजन !!अपनों के द्वारा अपनों को छला जाना ...,स्वार्थ में अंधा इंसान ,इंसानियत भूलकर स्वार्थ पूर्ति में जुटा...।

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    उत्तर
    1. सादर आभार आदरणीया शुभा बहन.रचना का मर्म स्पष्ट करती बहुत ही सुन्दर समीक्षा हेतु. आपका स्नेह और सानिध्य हमेशा बना रहे.
      सादर

      हटाएं
  6. दर्द धुआँ बन आँखों में
    धंसता गया
    निर्धन हुआ बेचैन
    वक़्त वहीं गया
    ठहर
    झगड़ता रहा
    मैं, मेरे का कारवां
    बिखर गये घरौंदे
    परिवेश में घुलता रहा
    ज़हर
    बहुत ही सुन्दर सार्थक चिन्तनपरक लाजवाब भावाभिव्यक्ति
    वाह!!!

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    उत्तर
    1. सादर आभार आपका आदरणीया सुधा दी जी. रचना पर चार चांद लगाती मनमोहक प्रतिक्रिया के लिये। आपका सानिध्य बना रहे।
      सादर स्नेह

      हटाएं
  7. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में शुक्रवार 01 नवम्बर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. सहृदय आभार आदरणीय पांच लिंकों के आनंद में स्थान देने हेतु.
      सादर

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  8. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-11-2019) को "यूं ही झुकते नहीं आसमान" (चर्चा अंक- 3506) " पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं….

    -अनीता लागुरी 'अनु'
    ---

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    उत्तर
    1. सस्नेह आभार प्रिय अनु चर्चामंच पर स्थान देने हेतु.
      सादर

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  9. प्राकृतिक और सामाजिक जीवन में आई कमियों पर बाखूबी कलम चली है आपकी अनीता जी । विषय चाहे कुछ भी हो आपकी लेखनी कुशलतापूर्वक भावों को सृजित करती है ।

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    1. सादर आभार आपका आदरणीया मीना दी सारगर्भित प्रतिक्रिया जो मेरे लेखन की दिशाबोध को स्पष्ट करती है। आपका साथ पाकर किसी भी ब्लॉगर को आत्मिक ख़ुशी मिलती है।
      सादर स्नेह

      हटाएं
  10. एक संवेदनशील कवि अपने आसपास हो रहे सामाजिक उथल-पुथल को एवं राजनीतिकप्रद कटु चालो से प्रभावित आम इंसान की व्यथा को बखूबी समझ सकता है ..!!...आपकी रचना धर्मिता ने प्राकृतिक एवं समाजिक दोनों में हो रहे ह्रास को सम्मिलित रूप से इस रचना के द्वारा प्रस्तुत किया.. वर्तमान परिपेक्ष में परिस्थितियां ऐसी बनती जा रही है कि हमारी संवेदनाएं स्वार्थपरक लोगों के द्वारा कुचली जा रही है.. रचना में निहित भाव स्वत: बता रहे कि एक कवि क्या महसूस करता है भाषा प्रवाह में दर्द है निराशा है तो कहीं क्रोध ,उत्तेजना भी है कि हम ऐसे क्यों बनते जा रहे हैं .. बहुत ही अच्छा लिखा आपने विचारों को जागृत करती हुई रचना..!!

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    1. ढेर सारा सस्नेह आभार प्रिय अनु। आपकी विस्तृत सारगर्भित व्याख्यात्मक टिप्पणी ने रचना का मर्म स्पष्ट किया है। आपकी प्रशंसा के लिये शब्द थोड़े हैं।
      सादर

      हटाएं
  11. गंभीर विषय -वस्तु ,साहेब को तो जगाना ही होगा ,चिंन्तनपरक रचना ,लाजबाब अनीता जी ,सादर स्नेह

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    उत्तर
    1. बहुत-बहुत आभार आदरणीया कामिनी जी रचना पर सारगर्भित प्रतिक्रिया के लिये।
      सादर

      हटाएं
  12. राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में जो विध्वंसक परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं वो सचमुच चिंताजनक है हर प्रबुद्ध रचनाकार इन संवेदनशील दुष्परिणामों से आहत हैं ,और चाहता है अपनी लेखनी से चेतना जगाए।
    आपकी कलम सदा ऐसे विषयों पर बहुत आत्म बल से चलती है
    और आप के शब्दों की गहनता आपके कोमल आहत मन को साकार उकेर देती है।
    बहुत गहन और संवेदनाओं का हस्ताक्षर हैं ये रचना।
    वाह्ह्ह्ह्ह्

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सादर आभार आपका आदरणीया कुसुम दी जी.आत्मबल बढ़ाने वाली मोहक प्रतिक्रिया के लिये।
      आपका स्नेह और आशीर्वाद मेरे साथ बना रहे। आपकी टिप्पणी रचना का मान बढ़ाने में सहायक है।

      हटाएं
  13. बिखर रहा है
    बंधुत्व का
    स्वप्न
    झुलस रहा है
    हिंद के दामन में
    प्रेम
    प्रकृति को रौंद रहे हैं
    दिन दहाड़े
    पग-पग पर हो रहा है
    भावनाओं का
    क़त्ल-ए-आम बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति सखी

    जवाब देंहटाएं