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गुरुवार, 27 सितंबर 2018

भाल धरा का



प्रीत रंग फैला धरा पर 
हुई मुखरित नेह की छाँव 
रंग-बिरंगी घटाएँ उमड़ीं  
उमड़ रही गगन की प्रीत 
नेह रंग में बरसे बादल 
हुआ धरा का आँचल हरा 
हर रंग में  रंग चुकी 
नेह रंग लगा गहरा 
दुल्हन-सी सजी बैठी 
ओढ़े प्रीत रंग ओढ़नी 
मंद-मंद मुस्काती 
ख़ुशियाँ आँगन महकाती 
हर रंग फ़बता इस पर 
लगे रूप की देवी 
प्रीत रंग फैला धरा पर 
हुई मुखरित प्रीत की छाँव 
सजा आज रंगों का थाल 
जैसे हो धरा का भाल |

- अनीता सैनी 

बुधवार, 26 सितंबर 2018

तसव्वुर-ए-जहां


तसव्वुर ही कहें  ख़्वाहिशों  की शमशीर के शिकार बन बैठे
महफ़िल में  लगे  चार  चाँद  हम  ग़मों  के  पास  जा बैठे ।


ता-उम्र  मुहब्बत  तलाशते  रहे,बेरुख़ी   में  ग़ालिब  बन  बैठे
 मिली  तसव्वुर  की  सौग़ात ज़िदगी अल्फ़ाज़  में डुबो  बैठे।


तन्हाइयों के उल्फ़त से डरता रहा जहां, हम उनसे  मुहब्बत कर  बैठे
तसव्वुर में डूबे रहे  हर वक़्त,लोग हमें जाने क्या से क्या समझ  बैठे ।

अनीता सैनी 

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

बटोही

      
अबकी बार  गुज़रो,
उस राह से, 
ज़रा ठहर जाना,  
पीपल की छाँव में, 
तुम पलट जाना,  
उस मिट्टी के ढलान पर,  
बैठी है उम्मीद, 
साथ उस का निभा देना, 
तपती रेत पर डगमगाएँगे क़दम,  
तुम हाथ थाम लेना,  
उसकी ज़मीरी ने किया है, 
ख़्वाहिशों का क़त्ल, 
तुम दीप अरमानों का जला देना, 
ना-काम रही वो राह में,  
ना-उम्मीद तो नहीं, 
बटोही हो तुम राह के, 
मंज़िल तक  पहुँचा देना |

-अनीता सैनी 

सोमवार, 24 सितंबर 2018

समय का तख़्त


हवाओं ने लहराये  गुमनाम मँसूबे, 
हाथों  ने  फिर तेरा नाम सँवारा, 
भूल चुकी  इश्क़  का गलियारा, 
धड़कनों ने  फिर तेरा नाम पुकारा |


बेजान  साँसें  सुलग  उठी, 
मिला अरमानों को  सहारा, 
हाल -ए -दिल की सुनी दास्तां, 
समय के तख़्त ने फिर पुकारा |


मोहब्बत का  अंदेशा रहा हमें, 
ख़ैरियत लिख देते अल्फ़ाज़   में, 
 क्यों बंदिशें  लगा रखीं  धड़कनों पर, 
ख़ाली लिफ़ाफ़ा भेज देते याद  में |

          - अनीता सैनी 

शनिवार, 22 सितंबर 2018

तृष्णा

पल -पल  बहती,
हर  पल  कहती,
ज़हन  में  मचलती,
साँसों  में  सुलगती,
प्रज्ञा   को   दबाती,
कोई  और   नहीं,
मानव   की  तृष्णा,
उसे  सताती।

नैतिकता को दूर  बिठाती,
कृत्य-अकृत्य सब करवाती,
राह सुगम  और
जल्द  पहूँचाये,
इसी   सोच  को  गले  लगाती,
कोई  और  नहीं,
यही  तृष्णा  मानव  को  नचाती ।

लालायित  मन  दौड़  लगाता,
सुकूं की छाँव कभी न पाता,
ऐसी   विपदा,
 हार  न   पाती,
थक जाता,
लड़खड़ाता जाता,
कोई और नहीं,
यही तृष्णा,
आँचल  थामे  ख़ूब लुभाती ।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

ज़िंदगी


दहलीज़   का  सन्नाटा,
आँगन  की  ख़ामोशी,
मासूम निःशब्द निगाहें,
तलाश  रही   हर  पल,
आहट  ज़िंदगी   में  ।

असुवन में समा गयी, 
साँसों संग बह गयी
कुछ  क़दम चली,
राह  में  रह  गयी  ।

बेख़बर हुयी   या,
 बिखर गयी ,
कुछ कदम चली,
 लड़खड़ा  गयी,
वहीं दहलीज़  पर,
 सिमट कर रह गयी ।
तुम्हारे इंतज़ार में,
 ज़िंदगी चलना  भूल  गयी ।

# अनीता सैनी 

सोमवार, 17 सितंबर 2018

लौट आते तुम

   लौट आते तुम 
एहसास  के  समुंदर  में,
डूब  रहा  मन,
लौट आते   तुम,
अपनेपन की कश्ती पर।

ज़िंदगी  के भँवर  में,
उलझ न जायें, 
यही सोच फटकार रही  तुम्हें,
कलेजा तड़पता  रहा,
क़दमों को मंजिल मिले,
यही सोच दौड़ाती  रही   तुम्हें। 

वही  आँगन,
वही  द्वार,
पहूँची न  दिल तक,
एक माँ की पुकार,
शब्दों की रही  तक़रार,
दिल में  उफ़न रहा
 स्नेह का सागर  ,
समझ  न  पाया  बेटा,
एक माँ का प्यार। 

इंतज़ार  में  साँसें   छूटी,
यादें  वहीं  खूँटी   पर  टूटीं 
बेटे  के  इंतजार में 
माँ  भी  संसार से छूटी ।

# अनीता सैनी 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

सायली छंद




सभ्यता
मायूस हुई
दहलीज़  पर बैठी
तोड़  रही
 दम ।


परिवार
बिखर  रहें
फैल  गया  अकेलापन
बेचैन  मनुष्य
सिमटा ।


बेख़बर
बिलखता  इंसान
इंसानियत  खो  रहा
बन  बैठा
हैवान  ।


ख़्वाब
दिल  के
आँखों  में  सँजोये
काजल  से
छुपाये ।


शब्दों
में   संजोई
बिखर  रही  ज़िंदगी
फिर  एक
हुई।

बुधवार, 12 सितंबर 2018

तलब मंज़िल की



सीने  में  सिसक रही,
शिद्दत उसे पाने  की,
क़दम लड़खड़ा  रहे,
चाहत रही  गले लगाने  की,
हौसले  कब  डगमगाये  ?
रफ़्तार  रही ,
आसमा  को  छूने  की।

न मंज़िल  के निशां होते,
न  क़दमों में मक़ाम होता,
गर  राहों में काँटे न होते,
न  मिलती तपती धूप,
न क़दमों को गति मिलती,
न मंजिल की तलब होती।

गर मिल जाती सुकूँ  की छाँव,
बहता शीतल जल,
मिल जाता सफ़र में ठाव ,
न होती यह महफ़िल,
न थिरकते  ये  पाँव।

#अनीता सैनी 

शनिवार, 8 सितंबर 2018

कह मुकरियाँ छंद

                           

प्रथम प्रयास...त्रुटि हेतु माफ़ी। 



     छिपे   राज़  करे  उजागर,
     कर्म   पथ    उसे   दिखाकर ।
     हर   मानव   को   राह   दिखाय।।
     ऐ ! सखी  सूरज ,ना  सखी  समय।


     देख   मनुष्य  खूब   ललचाये,
     साथ  रहने    को   वह   तिलमिलाये।
     आये   द्वार  पर  खोये  मति।।
      ऐ ! सखी  साजन, ना सखी सम्पत्ति।


    याद  में  उसकी  नैना  बरसे,
    सुबह-सवेरे  दिल  ये  तरसे।
     प्रीत   में  उसकी  सुध-बुध  खोयी ।।
     ऐ ! सखी साजन, ना  सखी भाई।


   अपनी  तपन  किसे  बताये ?
   ज्योंति  ज्ञान  की  वह  जलाये।
    सूरज-सा   उजियारा    धरुँ ।।
   ऐ ! सखी  दीपक ?  ना सखी गुरु।

          #अनीता सैनी