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गुरुवार, सितंबर 15

भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई


सांसों से उलझते भाव 

जीभ से लिपटते स्वर

होंठों का कंपन 

समय की कोख में सदियों ठहरा 

कितनी ही बोलियों ने गर्भ बदला 

असंख्य चोटें खाईं 

अभावों को भोग 

भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई 

अथाह गहराई हृदय की अकुलाहट 

हवा में तैरते मछलियों से शब्द 

एक-एक शब्द में प्राण फूँके 

टहलता जीवन, जीवन जो

स्वयं कहानी कहता है अपनी 

कहता है-

विरासत के भोगियों !

प्रेम है मुझसे!

तब ढूँढ़ लो उस ठठेरे को

भोगी जिसने प्रथम शब्द की प्रसव-पीड़ा 

गढ़ा जिसने पहला शब्द

ऊँ शब्द में पुकार 

माँ शब्द में दुनिया 

पिता शब्द में छाँव गढ़ी।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

24 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार 16 सितंबर 2022 को 'आप को फ़ुरसत कहाँ' (चर्चा अंक 4553) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है। 12:01 AM के बाद आपकी प्रस्तुति ब्लॉग 'चर्चामंच' पर उपलब्ध होगी।

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार सर मंच पर स्थान देने हेतु।

      हटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १६ सितंबर २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदय से आभार दी मंच पर स्थान देने हेतु।

      हटाएं
  3. वाह!प्रिय अनीता ,बहुत सुन्दर भाव !

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत गहरे भाव । सुंदर रचना ।

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह! अच्छी अभिव्यक्ति।

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  6. वाह अनीता ! हमारी आत्मा को, हमारे विवेक को, झकझोरने वाली बहुत सुन्दर विचारोत्तेजक कविता !
    आज हम अपनी मातृभाषा से, अपनी मातृभूमि से ही क्या, अपनी माँ से भी अपरिचित होते जा रहे हैं और इस कारण स्वयं अपनी पहचान मिटाते जा रहे हैं.

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार सर आपकी प्रतिक्रिया से विचारों को संबल मिला।
      स्नेह आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर प्रणाम

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  7. सत्य कहा। अति सुन्दर भाव सृजन।

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    1. हृदय से आभार आदरणीया अमृता दी जी।
      सादर स्नेह

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  8. कितनी ही बोलियों ने गर्भ बदला

    असंख्य चोटें खाईं

    अभावों को भोग

    भावों को जुटा हिंदी अधरों पर आई

    बहुत सटीक... एवं सारगर्भित
    लाजवाब सृजन
    हिंदी दिवस की अनंत शुभकामनाएं ।

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    1. हृदय से आभार मनोबल बढ़ाती प्रतिक्रिया हेतु।

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  9. उत्तर
    1. हृदय से आभार सर आपके आने से सृजन सार्थक हुआ।
      सादर

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  10. बहुत सुंदर सृजन अनिता आप का, थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कह रही है यह अभिव्यक्ति ।
    अभिनव भाव!!
    सच कितने रूप बदले कितनी भाषाओं के शब्द आकर मिले कितना दर्द सहा तब जाकर आज एक परिष्कृत रूप में हमारे सामने है, पर आज भी उचित सम्मान नहीं पा सकी।।

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    उत्तर
    1. हृदय से आभार कुसुम दी आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ।
      आशीर्वाद बनाए रखें।
      सादर स्नेह

      हटाएं
  11. बेनामी18/9/22, 12:20 pm

    बहुत ही सुन्दर रचना सखी

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