गुरुवार, 30 जुलाई 2020

ज़िंदगियाँ उलझन में हैं ...

                                           
ज़िंदगियाँ उलझन में हैं ...
परिवेश में नमी बेचैनी की है
ख़ेमे में बँटा इंसान 
मोम-सा पिंघलने लगा 
 मुँह पर बँधा है मास्क तभी
कुछ लोग 
आँखों पर सफ़ेद पट्टी बाँधने लगे
और कहने लगे 
देखना हम इतिहास रचेंगे
शोहरत के एक और
 पायदान पर क़दम रखेंगे
वे आत्ममुग्ध हैं यह देख
 अहंकार का पैमाना बढ़ने लगा
'मैं' का भाव बढ़ा 
सर्वोपरि सर्वज्ञाता सर्वशक्तिमान हुआ 
बच्चे बूढ़े जवान औरत पुरुष कुछेक की
रक्त वाहिनियों में 
ये ही भाव प्रवाहित होने लगा 
 दर्द कराहता रहा 
ग़रीब जन का जनपथ पर
 उसी की चीख़ के 
सभी सवाल शून्य होने लगे
 भव्यता सँजोते स्वप्नों में 
यथार्थ को स्वप्नरुपी पँख लगाने लगे 
 कुछ नुमाइंदे
 धर्म के नाम पर नफ़रत बाँटने लगे।

© अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 29 जुलाई 2020

तुम्हारे सिर्फ़ तुम्हारे लिए

                                          
पता नहीं कब?
कौन ?
किससे मिले...
भोर की वेला में 
या ढलती साँझ में मिले 
गड़रिए के लिबास में 
ओढ़े भावनाओं सरीखी
सजा अपनत्त्व का धरातल 
विचारों की गठरी लिए मिले ...
ठीक वहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ वहीं...देखना तुम
उभर आएगी
गंभीर वृक्ष की शीतल छाँव 
उसमें उलझी-सी टोह
फिर वही लताओं की डोर-सी लगेगी
कभी अनुभव-सिरों पर बैठी ठौर-सी मिलेगी...
यह सही है
उस समय तुम अकेले रहोगे
फ़ासले
चिलचिलाती तेज़ धूप-से लगेंगे
सब ओर फैला होगा 
अविश्वास का तपता रेगिस्तान
तब तुम तलाशना 
थार-से मरुस्थल में
सीपी-सा अटूट विश्वास...
वह जीवित है
चमक है उसकी आँखों में
समेट लेना तुम
गहरी अन्तःकरण की
तृषा-सी
ज्यों तारों भरा आसमान
 बैठा हो आँचल फैलाए
तुम्हारे सिर्फ़ तुम्हारे लिए ।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 26 जुलाई 2020

माटी के लाल


सैनिकों की प्रीत को परिमाण में न तोलना 
वे प्राणरुपी पुष्प देश को हैं सौंपतें।
स्वप्न नहीं देखतीं उनकी कोमल आँखें 
नींद की आहूति जीवन अग्नि में हैं झोंकते।

ऐंठन की शोथ सताती,चेतना गति करती।
ख़तरे के शंख उनके कानों में भी हैं बजते।
फिर भी दहलीज़ की पुकार अनसुनी कर 
दुराशा मिटाने को दर्द भरी घुटन हैं पीते।

वे गिलहरी-से कोटरों से नहीं झाँकतें 
नहीं तलाशते कंबल में संबल शीश पर आसमान लिए।
द्वेष की दुर्गंध से दूर मानवता महकाते 
ऐसे माटी के लाल मनमोही मन में हैं रम जाते।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

बरसात


कल आसमान साफ़ था 
फिर भी दिनभर पानी बरसता रहा।
बरसते पानी ने कहा बरसात नहीं है 
बरसात भिगोती है गलाती नहीं।

 सीली दीवारों पर चुप्पी की छाया थी 
न सूरज निकला न साँझ ढली।
 गरजे बादल चमकती रही बिजली 
न पक्षी चहके न घोंसले से निकले।

दौड़ते पानी से गलियाँ सिकुड़ी 
धुल गए वृक्ष झरते पानी के अनुराग से।
 धारा की शोभा सुशोभित हुई 
नव किसलय के शृंगार से।

मैं एकटक अपलक ताकती रिमझिम फुहार को 
भार बादलों का धरणी सहती रही।
रसोई से आँगन और बाज़ार की दूरी में मैं भीगती 
मुठ्ठीभर जीवन अँजुरी से रिसता रहा।

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 22 जुलाई 2020

क़लम से काग़ज़ पर उतरने से पहले कविता


क़लम से काग़ज़ पर उतरने से पहले
कविता लंबा  सफ़र तय करती है। 
 विचारों की गुत्थी पहले सुलझाती
बिताए प्रत्येक लम्हे से मिलती है। 
 समूचे जीवन को कुछ ही पलों में 
 खँगालती फिर सुकून से हर्षाती है। 

घर की चहल-पहल से इतर उसे
मायूस मन ख़ाली कोना है भाता। 
बग़ीचे में फैली हरियाली से नहीं
उसका सूखे नीम से है गहरा नाता। 
कोने में पड़ी टूटी बेंच की पीड़ा लिखती 
उस पर साया देखा-सा नज़र है आता। 

फूलों की माला-सा गूँथती दिन-पथ
साँझ ढले चुभन स्मृतियों में शूल-सी उभर आती है। 
झरते पारिजात का गूँजता अनहद नाद
हिचकी संग नम आँखों की सुर-लहरी बन जाता है। 
तारों की चमक अँजुरी में भरती
 बिखरकर धरा पर मुस्कुराने लगती है। 

उसके इंतज़ार का लिखती खलता ख़याल 
ज़िम्मेदारियाँ उसे उसी पल चुरा ले जातीं है। 
टूटती बिखरती लड़खड़ाती लेखनी
उम्मीद की गगरी में कविता के शब्द भर जाती है। 
क़लम से काग़ज़ पर उतरने से पहले
कविता लम्बा सफ़र तय करती है। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शनिवार, 18 जुलाई 2020

प्रार्थना


अनासक्त भाव से भर जाऊँ 
हे ! प्रभु ऐसी  भक्ति दो। 
कर्म-कष्ट सहूँ आजीवन बस 
मुझ में इतनी शक्ति दो। 

धूप द्वेष की न तृष्णा की साँझ 
समन्वय की भोर जगाए है। 
आरोह-अवरोह का अंत नहीं 
अंत समय तक मड़राए है। 
मन डिगे न मानवता से मेरा 
हे!प्रभु अंतस में ऐसी अनुरक्ति दो। 
कर्म-कष्ट सहूँ आजीवन बस 
मुझ में इतनी शक्ति दो। 

दैहिक दर्द बढ़े पल-पल 
 किंचित मुझ में क्षोभ न हो। 
 रोम-रोम पीड़ा से भर दो 
 यद्धपि मन में मेरे विक्षोभ न हो। 
 हतभाग्य विचार न छूए मन को 
हे!प्रभु ऐसी शुभ अभिव्यक्ति दो। 
 कर्म-कष्ट सहूँ आजीवन बस 
मुझ में इतनी शक्ति दो। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

आस की एक बूँद


आस की एक बूँद 
विश्वास की गगरी से छलकती है 
जीती है वह भी रोज़ थोड़ा-थोड़ा 
कभी अपनों कभी दूसरों के लिए 
 कि बना रहे अस्तित्त्व उसका भी। 

 मरती भी  है 'मैं' धरातल पर 
 जब उसके त्याग को अनदेखा कर 
उसकी धड़कनों को कुचला जाता है। 
 पेड़ों की टहनियों से झाँकती है
 कभी धूप कभी साँझ बनकर। 

पत्तों की कोर पर अटके विश्वास की 
 फिसलन से विचलित होती है वह भी 
 नाउम्मीदी के दलदल में  लिप्त होने से 
जीवन गलियारे के अदृश्य अँधेरे से। 

कभी-कभी समर्पण से प्रभावित होती है 
पानी की एक बूँद से जो बाँधे रखती है 
एकनिष्ठ अस्थि-पिंजर एक  ठूँठ से 
  जो कब का संवेदनारहित हो चुका है 
 जिसमें मर चुका है प्रेम वर्षों पहले 
 सूख चुका है जीवन जिसका एक अरसे से। 

 अनायास ही मिलना चाहती है मिट्टी में,
 उस मिट्टी में जो तपती है अहर्निश 
   धरती में जो पसीजती है जीवनभर 
  अनदेखेपन की तह में तपती निर्मोही-सी।  


©अनीता सैनी 'दीप्ति'

बुधवार, 15 जुलाई 2020

गूँगे-बहरों की दुनिया


दुःख  हो या सुख 
दोनों ही इस दौर में अकेले हैं।  
रोए तो स्वयं को 
सुनाने के लिए की दर्द भी है दर्द। 
हँसे भी तो स्वयं को
 बहलाने के लिए कि ख़ुशी भी है ख़ुशी। 

गधे हों या घोड़े 
 दोनों ही अस्तबल के मालिक हैं। 
दोनों एक ही दाम पर बिकते
 ख़रीद-फ़रोख़्त भी है जारी। 
ख़रीदार को सिर्फ़ और सिर्फ़  
संख्या का ख़्याल है रखना। 

 गूँगे-बहरों की दुनिया में 
 चिल्लाने का अभिनय है जारी।  
कुछ की बिख़रती मेहनत डोली 
दर्द उनका छलक पड़ा। 
 अपनी आवाज़ पहचानी उन्होंने ने 
कदाचित वह भी झिझक गए  
झिझकना ही गूँगापन है उनका। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 12 जुलाई 2020

धूप-सी दर्दभरी एक रेखा


बहुत देर अपलक हम ख़ामोशी से 
देखा करें एकटक उनके जीवन को। 
कंकड़-पत्थर कह उन्हें  फिर धीरे से कहें  
हाँ,लिख दी है जेठ में बरसती धूप को। 

पर्वत से अटल झुलसतें सुविचारों को 
 मिट्टी की मोहक ख़ुशबू को। 
 लिख दी है मन के कोने में मरती मानवता को 
 फिर लिख न सकेंगे मृत्यु के इस आलाप को। 

उनके जीवन को देख हम लिखा करेंगे 
धुँधली बस धुँधली-सी समय की एक रेखा। 
जो मूर्त स्मृतियों में बैठी स्वयं ही घट जाएगी 
नहीं घटेगी धूप-सी दर्दभरी एक रेखा। 

न घट पाई न मिट पाई संघर्षशील 
दर्द भरी शोषित शोषण की वह रेखा। 
आँखों से झलकती कलेजा में तड़पती 
मिट नहीं सकी समाज से भेदभरी वह रेखा। 

भाग्य संयोग सहज ही सब नहीं लिखता 
जीवन निर्वेद में है कुछ तो लिखता ही होगा। 
असुंदर अनिष्ट कहता मानव मानव को 
पथ प्रगति का कह दर्द भी रोता ही होगा। 

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

अकेलापन अभिशाप



वह ख़ुश थी,बहुत ही ख़ुश 
आँखों से झलकते पानी ने कहा। 
असीम आशीष से नवाज़ती रही 
लड़खड़ाती ज़बान कुछ शब्दों ने कहा।  

पुस्तक थमाई थी मैंने हाथ में उसके 
एक नब्ज़ से उसने एहसास को छू लिया। 
कहने को कुछ नहीं थी वह मेरी 
एक ही नज़र में  ज़िंदगी को छू लिया। 

परिवार एक पहेली समर्पण चाबी 
अनुभव की सौग़ात एक मुलाक़ात में थमा गई। 
पोंछ न सकी आँखों से पीड़ा उसकी 
 मन में लिए मलाल घर पर अपने आ गई। 

अकेलेपन की अलगनी में अटकी  सांसें 
जीवन के अंतिम पड़ाव का अनुभव करा गई। 
स्वाभिमान उसका समाज ने अहंकार कहा  
अपनों की बेरुख़ी से बूढ़ी देह कराह  गई। 

© अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 6 जुलाई 2020

सयानी सियासत


सयानी सियासत हद से निकल 
नगें पाँव दौड़ रही है सरहद की ओर।  
पैरों में बँधे हैं गुमान के घुँघुरु
खनक में मुग्ध हैं दिशाओं के छोर।  
नशा-सा छाया है नाम के उसका
परिवेश में गूँजता है शह-मात का शोर।   

मोहनी सूरत का मुखौटा,मंशा में है गांभीर्य 
शीश पर लालच के पिटारे का है भार।  
वाकचातुर्यता या शब्दों में मिश्री का है घोल 
ठगती मानव-मूल्य,करती क्लेश का भोर। 
भाषा,धर्म के नाम पर दिमाग़ से खेलती 
ज़हर भविष्य के पथ पर गहरा घोलती। 
ख़ामोशी में सिमटी क्यों मानवता है मौन ?
किसलय खिली हैं उपवन में रक्षा करेगा कौन ?

सफ़ेदपोशी के साथ आँख मिचोली के खेल में 
सेवानिवृत्त सैनिकों को तृष्णा में है उतारा।  
सरहद से थके-हारों  की धूमिल करती छवि 
क्लेश की कालिख पोतते वर्दी पर यह रवि। 
बिकाऊ मीडिया को कह हुड़दंग है मचाती 
सियासत के गलियारे से सीमा पर जा बैठी। 
सेना के सीने पर सियासती ज़हर का बखेरा 
सैनिकों के कफ़न पर कैसा नक़्शा है उकेरा?

©अनीता सैनी 'दीप्ति'

गुरुवार, 2 जुलाई 2020

सरहद



 स्वयं का नाम सुना होगा सरहद ने जब
  मोरनी-सी मन ही मन हर्षाई होगी।
अस्तित्त्व अदृश्य पानी की परत-सा पाया
भाग्य थाम अँजुली में इतराई होगी। 

मंशा मानव की झलकी होगी आँखों में जब
आँचल में लिपटी अपने बहुत रोई होगी।
आँसू पोंछें होंगे जब सैनिक ने उसके
प्रीत में बावरी दिन-रैन न सोई होगी। 

क़िस्से कहे होंगे सैनिक ने घर के अपने
सीने से लगकर अश्रु दोनों ने बहाए होंगे ।
कंकड़-पत्थर संग आघात सीसे-सा पाया
मटमैले स्वप्न दोनों ने नैनों में धोए होंगे।
 

अनीता सैनी 'दीप्ति '