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शुक्रवार, जुलाई 10

अकेलापन अभिशाप



वह ख़ुश थी,बहुत ही ख़ुश 
आँखों से झलकते पानी ने कहा। 
असीम आशीष से नवाज़ती रही 
लड़खड़ाती ज़बान कुछ शब्दों ने कहा।  

पुस्तक थमाई थी मैंने हाथ में उसके 
एक नब्ज़ से उसने एहसास को छू लिया। 
कहने को कुछ नहीं थी वह मेरी 
एक ही नज़र में  ज़िंदगी को छू लिया। 

परिवार एक पहेली समर्पण चाबी 
अनुभव की सौग़ात एक मुलाक़ात में थमा गई। 
पोंछ न सकी आँखों से पीड़ा उसकी 
 मन में लिए मलाल घर पर अपने आ गई। 

अकेलेपन की अलगनी में अटकी  सांसें 
जीवन के अंतिम पड़ाव का अनुभव करा गई। 
स्वाभिमान उसका समाज ने अहंकार कहा  
अपनों की बेरुख़ी से बूढ़ी देह कराह  गई। 

© अनीता सैनी 'दीप्ति'