धुँधलों से हरापन
✍️ अनीता सैनी
……..
अफ़सोस— उसने खाना छोड़ दिया,
भूख अब मर चुकी है।
उसने न सत्य निगला,
न अपनी कठोर आलोचना।
हाँ, निगल लिया उसने
कुछ और ही अजीब, उटपटांग—
हरेपन की हठ में
वृक्ष का सूखापन,
सुंदरता की ललक में
अपनी ही काया के काँटे।
वह यहाँ-वहाँ भटका,
अपने ही प्रतिबिंब से उलझता रहा।
प्रियतम विचारों को ठुकराता रहा।
पर बंजर नहीं हुआ—
पुराने बीज
नए अंकुरों की तरह उग आए।
सत्य को देखा उसने,
पर तिरछी, अजनबी नजरों से।
उसकी रोशनी
कभी पूरी तरह छू न सकी;
फिर भी उन्हीं धुँधलों ने
भीतर एक नया हरापन जगा दिया।
यह विस्मय ही था—
कि सबसे बदतर इरादों ने भी
उसका चेहरा उजला कर दिया;
मानो हर भूल ही
उसके प्रेम की गहराई का प्रमाण हो।
अब सब कुछ बीत चुका है—
न प्रमाण की प्यास,
न कसौटियों की तलाश।
बस बह रही है एक नदी—
देवता-सा समर्पण लिए,
तुम्हारे प्रेम के घेरे में
स्वेच्छा से बँधी;
जहाँ भीतर का शून्य
अनंत के आलिंगन से भर सके।
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