Powered By Blogger

रविवार, 31 जनवरी 2021

घटना


 मैं यह नहीं कहूँगी

कि उसकी समझ के पिलर

उखड़ चुके हैं और वह

जीवन से इतर भटक चुकी थी।  

कदाचित मन की नीरवता

रास्ते के छिछलेपन में उलझी 

भूख की खाई को भरते हुए 

समय के साथ ही विचर रही।  

इसलिए मैं यह कहूँगी

कि भय से अनभिज्ञ दौड़ते हुए 

वाकिया घटित होने पर 

ज़ख़्मी और हताश अवस्था में भी

इंतज़ार करती रही उपचार का 

ज़िंदगी में मिली बहुताए

 ठोकरों के उपरांत

 चोट खाने पर शाँत अवस्था में 

आँखों में मदद की गुहार लिए 

वह वहीं ज़मीन पर ही पड़ी रही।   

किसी की संपति नहीं होने पर

आवारापन की पीड़ा भोगते हुए 

 घटित घटना घायल हो घबराई नहीं 

कुछ नहीं थी मेरी अपनी हो गई।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 24 जनवरी 2021

समर्पण



 दुआ बन निखरुँ जीवन में 

रोळी-मौळी-सी सजूँ।

हँसी बन बिखरुँ होठों पर

बाती-सी जल धीर धरुँ।


लोकगीतों का गुलदस्ता

मधुर धुन की बाड़ मढूँ ।

आँगन में छिड़कूँ प्रीत पुष्प

सोनलिया पद छाप गढ़ूँ।


अपलक हँसती आँखों को

नमी से कोसों  दूर रखूँ ।

बुझे मन पर दीप्ति बन

थार अँजुरियों में बन स्रोत झरुँ।


लजाए पग समर्पण के 

डगर पर हौले-हौले धरुँ।

लहराऊँ स्वच्छंद गगन में 

अहाते में नभ के तारे भरुँ।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

दुछत्ती


 मन दुछत्ती पर अक्सर छिपाती हूँ 

 अनगिनत ऊँघती उमंगों की चहचाहट

 एहसास में भीगे सीले से कुछ भाव

 उड़े-से रंगो में लिपटी अनछुई-सी

  बेबसियों का अनकहा-सा ज़िक्र

  व्यर्थ की उपमा पहने दीमक लगे

  भाव विभोर अकुलाए-से कुछ प्रश्न

ढाढ़स के किवाड़ यवनिका का आवरण

कदाचित शालीनता के लिबास में 

ठिठके-से प्रपंचों से दूर शाँत दिखूँ

ऊँघते आत्मविश्वास का हाथ थामे

उत्साह की छोटी-छोटी सीढ़ियों के सहारे 

अनायास ही झाँक लेती हूँ बेमन से

कभी-कभार मन दुछत्ती के उस छोर पर

उकसाए विचार चेतना के ज्वार की सनक में 

स्वयं के अस्तित्त्व को टटोलने हेतु।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'

रविवार, 10 जनवरी 2021

बिछोह


बड़े दिनों बाद आवाज़ लगाई 
सूखे पत्तों से सजे आँगन ने
बाहें फैलाए  स्मृतियाँ 
स्वागत में प्रीत दीप जलाए 
वात्सल्य वीरानियों में
दहलीज़ पर सीलन अपनेपन की 
दीवारों की दरारों से झाँकता स्नेह
मन की आवाज़ में मैं बह चली
घर के सामने गली के नुकड़ पर
छोटा-सा नीम का पेड़ अब 
बड़ा हो अँग्रेज़ी बोलने लगा
विशाल टहनियाँ मुस्कुराती
कुछ कहकर लहराने लगतीं  
मैं उसकी यादों को छिपाती
दिखावे की व्यस्तता से
फुटकर हँसी सम्पन्नता के शृंगार से 
मन के दरीचों पर
आवरण करती यवनिका से
कि मन पटल पर बिछोह उभर न आए
फिर आज मन की आवाज़ में बह चली मैं?

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

सोमवार, 4 जनवरी 2021

यथार्थ

 आज-कल यथार्थ

लोकप्रियता के शिखर पर है 

सभी को यथार्थ बहुत प्रिय है 

जहाँ देखा वहीं

 यथार्थ के ही चर्चे हैं 

अँकुरित विचार हों  या 

कल्पना की उड़ान 

शब्दों की कोंपलों में 

 यथार्थ की ही गंध मिलती है

 मन-मस्तिष्क में उठते 

 भावों की तरंगें हों या

 क़ागज़ पर बिखरे शब्द

 यथार्थ ही कहते हैं

 हर कोई यथार्थ के चंगुलों में

 यथार्थ खाते हैं,यथार्थ पहनते हैं 

 यथार्थ संग सांसें लेते  हैं 

  यथार्थ के आग़ोश में बैठी 

  ज़िंदगियाँ हिपनोटाइज़ हैं 

 जिन्हें समझ पाना बहुत कठिन

 समझा पाना और भी कठिन है।

 

 @अनीता सैनी 'दीप्ति'