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बुधवार, नवंबर 9

स्त्री भाषा



 

परग्रही की भांति

धरती पर नहीं समझी जाती

स्त्री की भाषा

भविष्य की संभावनाओं से परे 

किलकारी की गूँज के साथ ही 

बिखर जाते हैं उसके पिता के सपने

बहते आँसुओं के साथ 

सूखने लगता है

माँ की छाती का दूध

बेटी के बोझ से ज़मीन में एक हाथ 

धँस जाती हैं उनकी चारपाई 

दाई की फूटती नाराज़गी 

दायित्व से मुँह मोड़ता परिवार

माँ कोसने लगती हैं 

 अपनी कोख को 

उसके हिस्से की ज़मीन के साथ

छीन ली जाती है भाषा भी 

चुप्पी में भर दिए जाते हैं

मन-मुताबिक़ शब्द 

सुख-दुख की परिभाषा परिवर्तित कर  

जीभ काटकर

 रख दी जाती है उसकी हथेली पर 

चीख़ने-चिल्लाने के स्वर में उपजे

शब्दों के अर्थ बदल दिए जाते हैं

ता-उम्र  ढोई जाती है उनकी भाषा

एक-तरफ़ा प्रेम की तरह।


@अनीता सैनी 'दीप्ति'